रामानंद सागर कृत श्री कृष्ण भाग 35 - राधा ने श्री कृष्ण को मथुरा जाने से रोका
Watch This New Song Bhaj Govindam By Adi Shankaracharya : • श्री आदि शंकराचार्य कृत भज गोविन्दम् | प्र... तिलक की नवीन प्रस्तुति "श्री आदि शंकराचार्य कृत भज गोविन्दम्" अभी देखें : • श्री आदि शंकराचार्य कृत भज गोविन्दम् | प्र... _________________________________________________________________________________________________ बजरंग बाण | पाठ करै बजरंग बाण की हनुमत रक्षा करै प्राण की | जय श्री हनुमान | तिलक प्रस्तुति 🙏 Watch the video song of ''Darshan Do Bhagwaan'' here - • दर्शन दो भगवान | Darshan Do Bhagwaan | Sur... Ramanand Sagar's Shree Krishna Episode 36 - Shri Krishna gave the vision to Akrur in its true form श्रीकृष्ण बलराम संग मथुरा को प्रस्थान करते हैं किन्तु गोपिकाएं उनके रथ के आगे लेटकर उनका मार्ग रोक लेती हैं। वे श्रीकृष्ण के लाख समझाने पर भी नहीं मानती हैं। तब कृष्ण उन्हें प्रेम का वास्तविक अर्थ समझाते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम जिस तरह मार्ग में लेटकर प्रदर्शन कर रही हो, वह प्रेम नहीं, मोह है। कृष्ण गोपिकाओं से कहते हैं कि तुम मुझे कर्तव्य पथ पर जाने से रोककर अपने प्रेम की विजय मान रही हो तो तुम प्रेम का अर्थ ही नहीं जानती हो। और यदि तुम्हें प्रेम का अर्थ नहीं पता है तो तुम प्रेम क्या करोगी। श्रीकृष्ण एक-एक गोपिका को अपने हाथ का सहारा देकर उठाते हैं, अपने हाथों से उनके अश्रु पोंछते हैं। कृष्ण गोपिकाओं से कहते हैं कि मैं तो तुम्हारा निश्चल प्रेम को अपने हृदय में भरकर मथुरा के महलों में यह सोचकर ले जा रहा था कि जब राजनीति के मिथ्या वातावरण में मेरा जी घबड़ायेगा, मैं अपने हृदय में झाँक कर, तुम सबके निस्वार्थ और निश्चल प्रेम की झाँकी को देखकर अपना मन शीतल कर लिया करूँगा, जिससे जीवन की सुन्दरता के प्रति मेरा विश्वास हर पल दृढ़ होता रहे। कृष्ण क्षोभ व्यक्त करते हैं कि मैंने उन गोपिकाओं से प्रेम किया जो प्रेम का अर्थ भी नहीं जानती हैं। गोपियां कृष्ण को जाने देने के लिये राजी होती हैं। कृष्ण एक बार पुनः आने का वचन देकर उनसे विदा लेते हैं। राधा पहाड़ी पर चढ़कर जाते हुए कृष्ण को अश्रुपूरित नेत्रों से अन्तिम क्षण तक देखती हैं। मार्ग में अक्रूर श्रीकृष्ण को बताते हैं कि कंस के सैनिक हमला कर आपकी हत्या कर सकते हैं इसलिये मैंने तीन दस्तों का गठन किया है। एक साथ चल रहा है, दूसरा नदी के तट पर और तीसरा पहाड़ी के उस पार तैनात है। श्रीकृष्ण अक्रूर के रणनीतिक कौशल की प्रशंसा करते हैं किन्तु यह भी कहते हैं कि मैं अपने पिता वसुदेव का वचन झूठा नहीं होने दूँगा इसलिये आप मुझे कंस के सुपुर्द कर दें। इस पर अक्रूर कहते हैं कि आपकी रक्षा के लिये यादववीर अपना रक्त बहाने को तैयार हैं। रथ मथुरा की सीमा से पहले यमुना किनारे पहुँचता है। यमुना के दूसरी तरफ अक्रूर की दूसरी टुकड़ी तैनात है। उन्हें संकेत देने के लिये अक्रूर को यमुना के जल में चार डुबकियाँ लगाने उतरते हैं। अक्रूर की भक्ति देखकर बलराम श्रीकृष्ण से कहते हैं कि हमें अक्रूर को अपनी वास्तविकता से परिचित करा देना चाहिये अन्यथा वह हमारी सुरक्षा को लेकर चिन्तित होते रहेंगे। अक्रूर जब यमुना में डुबकी लगाते हैं तो उन्हें जल के भीतर कृष्ण और बलराम दिखायी पड़ते हैं। वह बाहर आकर देखते हैं तो वे दोनों उन्हें अपने रथ पर दिखायी पड़ते हैं। अक्रूर को हर डुबकी में बारम्बार वही दृश्य दिखता है। वह भ्रमित हो जाते हैं। अन्त में उनके भ्रम को दूर करने के लिये श्रीकृष्ण यमुना के जल के भीतर शेषशैया पर विराजमान होकर अपने साक्षात विष्णु स्वरूप में उन्हें दर्शन देते हैं। अक्रूर को सतयुग से द्वापर युग तक के समस्त विष्णु अवतारों के दर्शन भी होते हैं। इनमें मत्स्य अवतार, कूर्मावतार, वराह अवतार, नरसिंह अवतार, वामन अवतार, परशुराम अवतार, राम अवतार और वर्तमान के कृष्ण अवतार शामिल होते हैं। शेष नाग में उन्हें बलराम की छवि के दर्शन होते हैं। कृष्ण अक्रूर से कहते हैं कि मेरी सुरक्षा को लेकर आपके हृदय में मेरा निरन्तर वास बना रहा है। इसलिये मैं आपको अपनी चिर भक्ति का वरदान प्रदान करता हूँ। अक्रूर हरि दर्शन से अभिभूत होकर यमुना से बाहर आते हैं। अक्रूर के सैनिक उनसे कहते हैं कि आप चौथी डुबकी लगाना भूल गये हैं। तब अक्रूर कहते हैं कि अब इसकी जरूरत नहीं रह गयी है। मैं जान चुका हूँ कि मैं जिनकी सुरक्षा को लेकर चिन्तित था, वह तो स्वयं तीनों लोकों के रक्षक हैं। अक्रूर रथ पर सवार कृष्ण के चरणों पर गिरकर उन्हें न पहचान पाने के लिये क्षमा माँगते हैं। उधर मथुरा में कंस को कृष्ण और बलराम के गोकुल से निकल पड़ने की सूचना मिलती है। वह अपने मंत्री चाणुर को निर्देश देता है कि नगर में प्रवेश करते ही कृष्ण की जीवनलीला समाप्त कर दी जाये। चाणुर कहता है कि मथुरावासी जान चुके हैं कि कृष्ण यशोदा का नहीं, देवकी का पुत्र है। इस बात पर मथुरावासी प्रसन्नचित्त हैं कि उनका पालनहार आने वाला है। इसलिये जनविद्रोह टालने के लिये कृष्ण को शान्ति से मथुरा में प्रवेश होने दिया जाये, उसका राजकीय अतिथि के रूप में स्वागत किया जाये। इससे मथुरावासी निश्चिन्त होकर अपने घरों में जब सोने चले जायें, तब दूसरे तरीकों से कृष्ण का अन्त किया जाये। In association with Divo - our YouTube Partner #SriKrishna #SriKrishnaonYouTube

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