रामानंद सागर कृत श्री कृष्ण भाग 98 - श्री कृष्ण ने तोड़ा सत्यभामा का अहंकार

Watch This New Song Bhaj Govindam By Adi Shankaracharya :    • श्री आदि शंकराचार्य कृत भज गोविन्दम् | प्र...   तिलक की नवीन प्रस्तुति "श्री आदि शंकराचार्य कृत भज गोविन्दम्" अभी देखें :    • श्री आदि शंकराचार्य कृत भज गोविन्दम् | प्र...   _________________________________________________________________________________________________ बजरंग बाण | पाठ करै बजरंग बाण की हनुमत रक्षा करै प्राण की | जय श्री हनुमान | तिलक प्रस्तुति 🙏 Watch the video song of ''Darshan Do Bhagwaan'' here -    • दर्शन दो भगवान | Darshan Do Bhagwaan | Sur...   Ramanand Sagar's Shree Krishna Episode 98 - Shri Krishna Ne Toda Satyabhama Ka Ahankaar. सत्यभामा अपने पुण्यक व्रत का आयोजन कराने के लिये देवर्षि नारद को अपना पुरोहित बनाती हैं। नारद जी ने सत्यभामा से दक्षिणा में अपनी सबसे प्रिय वस्तु दान करने को कहा तो उन्होंने अपने पति श्रीकृष्ण को अपना सबसे प्रिय बताते हुए उनका दान कर देती है। इस प्रकार श्रीकृष्ण नारद मुनि के दास बन जाते हैं। वस्तुतः सत्यभामा का अहंकार तोड़ने के लिये श्रीकृष्ण ने नारद के साथ मिलकर यह नाटक रचाया था। नारद श्रीकृष्ण से रसोई में दास की भाँति कार्य कराते हैं। सत्यभामा पति की इस दशा पर दुखी होती हैं। वह नारदजी से दान वापस माँगती हैं। नारदजी श्रीकृष्ण को लौटाने से साफ मना कर देते हैं और उन्हें खींच कर रसोई घर में ले जाते हैं। सत्यभामा रोते हुए रुक्मिणी से परिस्थिति को सम्भालने का निवेदन करती हैं। तीनों रानियां रसोईघर में जाती हैं जहाँ धरती पर बैठे श्रीकृष्ण चटनी पीस रहे हैं। रुक्मिणी श्रीकृष्ण के समीप बैठ कर उनसे पूछती हैं कि आप ये क्या कर रहे हैं, प्रभु। द्वारिकाधीश होकर चटनी पीस रहे हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि अब वे द्वारिकाधीश नहीं, देवर्षि नारद के एक सेवक हैं। मेरी पत्नी ने मुझे दान में दे दिया है। रुक्मिणी कहती हैं कि मैंने तो आपको दान में नहीं दिया है। तब नारद कहते हैं कि सत्यभामा ने इन्हें दान में दिया है। रुक्मिणी अब कूटनीति से काम लेते हुए नारद जी से पूछती हैं कि मुझे इससे कोई सरोकार नहीं। मैं श्रीकृष्ण की पत्नी हूँ और ऋषिवर, आप मेरी अनुज्ञा लिये बिना मेरे पति दास बनाकर कैसे ले आये हैं? मैं अपने पति को अपने साथ ले जा रही हूँ। रुक्मिणी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ कर ले जाने लगती हैं। श्रीकृष्ण को अपने हाथ से यूँ निकलता देखकर नारद उन्हें रोकते हैं और कहते हैं कि ब्राह्मण से इस प्रकार धोखा नहीं होने दूँगा, देवियों। यदि श्रीकृष्ण में आप तीनों का हिस्सा है। तो सत्यभामा केवल अपने अधिकार वाला कृष्ण मुझे दे दें और आप दोनों अपने हिस्से वाले कृष्ण को ले जायें। सत्यभामा का अहंकार टूटने लगता है। वह कहती हैं कि मैं नहीं जानती कि श्रीकृष्ण पर मेरा कितना अधिकार है। वे त्रिलोक के समस्त प्राणियों के एकमात्र आधार हैं। सत्यभामा नारदमुनि के चरणों पर झुककर कहती हैं कि मैं अपने स्वामी को अपने वचन से मुक्त कराने के लिये प्रायश्चित स्वरूप अपने प्राण न्यौछावर करने के लिये भी तैयार हूँ। श्रीकृष्ण आँखों से नारद जी को नाटक जारी रखने का संकेत देते हैं। नारदजी कहते हैं कि आप इनके बदले में कोई अन्य मूल्यवान वस्तु दे दें तो मैं इन्हें मुक्त कर दूँगा। नारद जी की बात सुनकर सत्यभामा के भीतर छुपा अहंकार फिर जागृत होता है। वह कहती हैं कि श्रीकृष्ण के बदले मैं आपको इतना दूँगी, जितना आज तक किसी ने आपको न दिया होगा। नारद कहते हैं कि शास्त्र कहता है कि ब्राह्मण को लोभी नहीं होना चाहिये। आप केवल श्रीकृष्ण के तौल के बराबर कोई भी पदार्थ दे दीजिये, प्रायश्चित स्वीकार हो जायेगा। तौल में आप अन्न, चावल या फूल पत्ते आदि कुछ भी दे दीजिये, मुझे स्वीकार होगा। सत्यभामा दर्प से कहती हैं कि यदि सत्यभामा अपने पति का तुलादान करेगी तो स्वर्ण और हीरे माणिक से करेगी। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ तुलादान प्रारम्भ होता है। तराजू के एक पलड़े में श्रीकृष्ण बैठते हैं और दूसरे पलड़े में सत्यभामा अपना सभी सोना, चाँदी, हीरे मोती माणिक रख देती हैं। किन्तु श्रीकृष्ण जी का पलड़ा भारी ही बना रहता है। श्रीकृष्ण सत्यभामा को सही मार्ग दिखाने का मानस सन्देश रुक्मिणी को भेजते हैं। रुक्मिणी सत्यभामा के समीप जाती हैं और उनसे कहती हैं कि आभूषण तो स्त्री के बाहरी अलंकरण होते हैं। इनके सहारे तुम श्रीकृष्ण को तौलने चली थीं। परन्तु देख लिया तुमने इसका परिणाम। इन्हें तुम अपने अनुराग से तौलो, एक पत्नी की भावना से तौलो। रुक्मिणी सत्यभामा की उँगली में पहनी हुई एक छोटी सी अँगूठी को उतारती हैं और उसमें तुलसी का एक पत्ता पिरोती हैं। वह इसे सत्यभामा को देते हुए कहती हैं कि लो अब इस मुद्रिका को भक्तिभाव से चढ़ा दो, निश्चित ही जीत तुम्हारी होगी। प्रभु तो तुलसी के पत्ते से भी रीझ जाते हैं। सत्यभामा अँगूठी को श्रद्धाभाव से इसे तराजू के पलड़े पर रखती हैं। एक चमत्कार होता है। श्रीकृष्ण का पलड़ा हलका होकर ऊपर उठ जाता है और अंगूठी वाला पलड़ा भारी होकर नीचे आ जाता है। सत्यभामा के मन से सब अहंकार मिट जाता है। द्वारिका के राजमहल में तीनों रानियां सुखपूर्वक दिन व्यतीत करने लगती हैं। कुछ दिन पश्चात सुभद्रा के गर्भवती होने का सुसमाचार आता है। बलराम अपनी बहन की गोद भराई के लिये वस्त्र और आभूषण इन्द्रप्रस्थ भिजवाते हैं। In association with Divo - our YouTube Partner #SriKrishna #SriKrishnaonYouTube

रामानंद सागर कृत श्री कृष्ण भाग 99 - श्री कृष्ण के परम भक्त सुदामा की कथा
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श्री कृष्ण भाग 98 - श्री कृष्ण ने तोड़ा सत्यभामा का अहंकार । रामानंद सागर कृत
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Sri Krishna EP 99 - श्री कृष्ण के परम भक्त सुदामा की कथा | HQ WIDE SCREEN | English Subtitles
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