माया क्या है और इससे बचना इतना कठिन क्यों ? वक्ता : राजन स्वामी जी।।@SPJIN @spritualsecrets

स्वामी जी इस चर्चा में माया के स्वरूप को स्पष्ट करते हैं और बताते हैं कि यह किस प्रकार जीवन को प्रभावित कर बंधन में डालती है। यह मानना कि केवल घर-द्वार और समाज छोड़ने से माया से मुक्ति मिल जाएगी, एक भ्रम है। माया इतनी सूक्ष्म और शक्तिशाली है कि वह हर स्थान पर विद्यमान रहती है। यदि भगवान आदिनारायण भी माया से पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकते, तो साधारण मनुष्य कैसे बच सकता है? माया पाँच तत्वों के पाँच गुणों द्वारा हमें वशीभूत कर देती है: हमारी इंद्रियाँ इन विषयों से अत्यधिक प्रभावित होती हैं। कान मधुर ध्वनि, आँखें सुंदर रूप, त्वचा कोमल स्पर्श, जीभ स्वाद और नाक सुगंध से मोहित हो जाती है। माया इतनी शक्तिशाली है कि एक ही इंद्रिय के वश में आकर प्राणी मृत्यु को आमंत्रित कर सकते हैं। • पतंगा प्रकाश में जलकर मर जाता है। • हिरण मधुर ध्वनि सुनकर शिकारी के जाल में फँसता है। • मछली स्वाद के लोभ में कांटे में फँस जाती है। • हाथी स्पर्श के कारण शिकारी द्वारा पकड़ा जाता है। • मधुमक्खी सुगंध में फँसकर समाप्त हो जाती है। जब इतने शक्तिशाली जीव एक इंद्रिय के कारण नष्ट हो सकते हैं, तो मनुष्य, जो पाँचों इंद्रियों का गुलाम है, माया से कैसे बच सकता है? मनुष्य धन, ऐश्वर्य और शक्ति की चाह में माया के जाल में फँसता है। यहाँ तक कि ऋषि-मुनि भी इससे अछूते नहीं। योगेश्वरानंद जी बारह वर्षों की तपस्या के बावजूद अमृतसर में जलेबियों को देखकर अपनी तृष्णा रोक नहीं पाए। माया को दबाने से वह और प्रबल हो जाती है, इसलिए इसे नियंत्रित करना आवश्यक है: • बुद्धि का विवेकपूर्ण उपयोग – समझें कि भौतिक सुख क्षणिक हैं और आत्मिक शांति ही वास्तविक सुख है। • इंद्रियों पर नियंत्रण – इंद्रियों के अधीन रहकर माया से मुक्ति संभव नहीं। • आध्यात्मिक ज्ञान – परमात्मा की भक्ति और ज्ञान से ही माया का प्रभाव कम हो सकता है। बाहरी रूप से विषयों का त्याग करने से कोई मुक्त नहीं होता, जब तक कि सूक्ष्म वासनाओं से भी मुक्ति न मिले। एक महात्मा 65 वर्ष की उम्र में 16 वर्ष की किशोरी पर आसक्त हो सकते हैं, क्योंकि पूर्व जन्म के संस्कार जागृत हो जाते हैं। माया से मुक्ति कठिन है, पर असंभव नहीं। जो अपने मन को वश में कर लेता है, वही सच्चा विजेता होता है। संसार का सबसे बड़ा सम्राट वह नहीं, जिसके पास अपार संपत्ति हो, बल्कि वह है जिसने अपने मन को जीत लिया हो। "जो अपने मन को जीत लेता है, वही सच्चा विजेता है।" जब तक मनुष्य विषय भोगों के पीछे भागता रहेगा, उसकी तृष्णा कभी समाप्त नहीं होगी। वास्तविक आनंद आत्मा के भीतर है, जहाँ परमात्मा का निवास है। परमात्मा की भक्ति और ध्यान से ही माया के प्रभाव से मुक्त होकर सच्चे आनंद का अनुभव किया जा सकता है। श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ के मुख्य उद्देश्य - ज्ञान, शिक्षा, उच्च आदर्श, पावन चरित्र व भारतीय संस्कृति का समाज में प्रचार करना तथा वैज्ञानिक सिद्धांतो पर आधारित आध्यात्मिक मूल्य द्वारा मानव को महामानव बनाना और श्री प्राणनाथ जी की ब्रम्हवाणी के द्वारा समाज में फ़ैल रही अंध-परम्पराओं को समाप्त करके सबको एक अक्षरातीत की पहचान कराना। अति महत्वपूर्ण नोट :- यह पंचभौतिक शरीर हमेशा रहने वाला नहीं है। प्रियतम परब्रह्म को पाने के लिये यह सुनहरा अवसर है। अतः बिना समय गवाएं उस अक्षरातीत पाने के लिये प्रयास करना चाहिये। नोट: कृपया हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें । आध्यात्मिक चर्चा, भजन - कीर्तन के इस अपार सागर रुपी चैनल के द्वारा आत्मा - परमात्मा, सतगुरु, मानव जीवन के परम लक्ष्य, ध्यान - समाधि, नैतिक मूल्यों आदि विषयों में अपना ज्ञान और बढ़ाएं । यहाँ पर नए वीडियो नियमित रूप से अपलोड होते रहते हैं । तो देखते रहिये , सीखते रहिये व दूसरों के साथ शेयर भी करते रहिये । प्रणाम जी । आत्मिक दृष्टि से परमधाम, युगल स्वरुप तथा अपनी परआत्म को देखना ही चितवनि (ध्यान) है। चितवनि के बिना आत्म जागृति संभव नहीं है। संसार की अब तक की प्रचलित सभी ध्यान पद्धतियाँ निराकार-बेहद से आगे नहीं जाती हैं। तारतम ज्ञान के प्रकाश में मात्र निजानन्द योग ही परमधाम ले जा सकता है। प्रियतम अक्षरातीत की चितवनि में इतना आनन्द है कि उसके सामने संसार के सभी सुख मिलकर भी कहीं नहीं ठहरते। यही कारण है कि ध्यान का आनन्द पाने के लिये ही राजकुमार सिद्धार्थ, महावीर, भर्तृहरि आदि ने अपने राज-पाट को छोड़ दिया और वनों में ध्यानमग्न रहे। बेहद मण्डल - इस प्राकृतिक जगत् से परे वह बेहद मण्डल है, जिसे योगमाया का ब्रह्माण्ड कहते हैं। चारों वेदों में इसे चतुष्पाद विभूति के रूप में वर्णित किया गया है। इस मण्डल में अक्षर ब्रह्म के चारों अन्तःकरण (मन, चित, बुद्धि तथा अहंकार) की लीला होती है, जिन्हें क्रमशः अव्याकृत, सबलिक, केवल और सत्स्वरूप कहते हैं। परमधाम - बेहद मण्डल से परे वह स्वलीला अद्वैत परमधाम है, जिसके कण-कण में सच्चिदानन्द परब्रह्म की लीला होती है। यह अनादि है, अनन्त है और सच्चिदानन्दमय है। जिस प्रकार सागर अपनी लहरों से तथा चन्द्रमा अपनी किरणों लीला करता है, उसी प्रकार अक्षरातीत भी अपनी अभिन्न स्वरूपा अंगरूपा आत्माओं के साथ अद्वैत लीला करते हैं, जो अनादि है और इसमें कभी अलगाव नहीं होता है। वेदों ने इसी परमधाम के सम्बन्ध में “त्रिपादुर्ध्व उदैत्पुरुष” अर्थात् परब्रह्म योगमाया से परे है, कहकर मौन धारण कर लिया। मुण्डकोपनिषद् ने भी 'दिव्य ब्रह्मपुर' शब्द का प्रयोग तो किया, किन्तु उसे बेहद मण्डल (केवल ब्रह्म) में मान लिया। कुरआन में मेयराज के वर्णन के द्वारा संकेत किये जाने पर भी मुस्लिम जगत अभी इसकी वास्तविकता से बहुत दूर है। श्री प्राणनाथजी की अलौकिक तारतम वाणी में इस परमधाम की शोभा, लीला एवं आनन्द का विशद रूप में वर्णन किया गया है, जिसका सुख किसी सौभाग्यशाली को ही प्राप्त होता है।

गीता में वर्णित तीन पुरुष—क्षर, अक्षर और उत्तम पुरुष कौन हैं ? वक्ता : राजन स्वामी जी।।@SPJIN
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जीवन बीतता जाता है, पर हम जग क्यों नहीं पाते ? ।। वक्ता- राजन स्वामी जी ।। @SPJIN
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जीवन बीतता जाता है, पर हम जग क्यों नहीं पाते ? ।। वक्ता- राजन स्वामी जी ।। @SPJIN

Parmatma Ka Sandesh - घर वापसी का समय हो चुका है | Shri Rajan Swami Ji Pravachan | SPJIN - Paramdham
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Parmatma Ka Sandesh - घर वापसी का समय हो चुका है | Shri Rajan Swami Ji Pravachan | SPJIN - Paramdham

11 जून |स्तुति  प्रार्थना|उमा भवन,भटार रोड,सूरत |प्रातः -5:00 से 6:30|संत श्रीहरिकृष्णदासजी महाराज|
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11 जून |स्तुति प्रार्थना|उमा भवन,भटार रोड,सूरत |प्रातः -5:00 से 6:30|संत श्रीहरिकृष्णदासजी महाराज|

There Is Nothing Left To Know After This : प्रभु श्री सत्संग
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श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर जयपुर से जगद्गुरु आचार्य श्री 108 सूर्यनारायण दास महाराज जी #दिन - 2 भाग -2
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श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर जयपुर से जगद्गुरु आचार्य श्री 108 सूर्यनारायण दास महाराज जी #दिन - 2 भाग -2

कैसे बनाएं ध्यान को अटूट | सुरता क्यों टूटती है?  @shrirajanswami @SPJIN
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कैसे बनाएं ध्यान को अटूट | सुरता क्यों टूटती है? @shrirajanswami @SPJIN

देखिये कैसे स्वामी जी ने इन के सारे सवालों का जवाब दिया है अब उन महाराज की बलि बंद होगई है
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देखिये कैसे स्वामी जी ने इन के सारे सवालों का जवाब दिया है अब उन महाराज की बलि बंद होगई है

प्रेम करने योग्य केवल एक परमात्मा।। ब्रह्मवाणी चर्चा।। वक्ता:- श्री राजन स्वामी जी।।@SPJIN
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प्रेम करने योग्य केवल एक परमात्मा।। ब्रह्मवाणी चर्चा।। वक्ता:- श्री राजन स्वामी जी।।@SPJIN

वाणी समझने का तरीका । आचार्य अशोक जी   SPJIN 1080p, h264
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वाणी समझने का तरीका । आचार्य अशोक जी SPJIN 1080p, h264

I can't get rid of any tension, what should I do? A short application, Ch. 1
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I can't get rid of any tension, what should I do? A short application, Ch. 1

परमात्मा हमारे अंदर है या हम परमात्मा के अंदर हैं | Vani Charcha - Shri Rajan Swami Ji | Jagni Yatra
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परमात्मा हमारे अंदर है या हम परमात्मा के अंदर हैं | Vani Charcha - Shri Rajan Swami Ji | Jagni Yatra

सच्चा आनंद—कैसे पाएँ ?।।वक्ता: श्री राजन स्वामी जी।।@SPJIN @spritualsecrets @spjinmusic
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सच्चा आनंद—कैसे पाएँ ?।।वक्ता: श्री राजन स्वामी जी।।@SPJIN @spritualsecrets @spjinmusic

पाप, पुण्य, पूजा, भक्ति और मुक्ति | जीवन का वास्तविक सत्य |@shrirajanswami @SPJIN
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पाप, पुण्य, पूजा, भक्ति और मुक्ति | जीवन का वास्तविक सत्य |@shrirajanswami @SPJIN

तारतम मंत्र के विवाद पर शांति और एकता का संदेश । #shrirajanswamiji #spjin @amanpranami633
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"ब्रह्म" ज्ञान का विषय क्यों नहीं है ? |  Why is "Brahma" not the subject of knowledge ?
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"ब्रह्म" ज्ञान का विषय क्यों नहीं है ? | Why is "Brahma" not the subject of knowledge ?

माया के कष्टों से कौन बचा सकता है ? ।। ब्रह्मवाणी चर्चा।। वक्ता :- श्री राजन स्वामी जी।। @SPJIN
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माया के कष्टों से कौन बचा सकता है ? ।। ब्रह्मवाणी चर्चा।। वक्ता :- श्री राजन स्वामी जी।। @SPJIN

Fer Fer Sarup Jo Nirkhiye | Vani Charcha | Shri Rajan Swami Ji | Jagni Yatra 2022 | Surat
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Fer Fer Sarup Jo Nirkhiye | Vani Charcha | Shri Rajan Swami Ji | Jagni Yatra 2022 | Surat

क्या स्थान और व्यक्तिवाद ने हमें सत्य से दूर कर दिया है? @shrirajanswami @SPJIN
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क्या स्थान और व्यक्तिवाद ने हमें सत्य से दूर कर दिया है? @shrirajanswami @SPJIN

Eliminate Vices, Embrace Virtues; Victory Comes Through Humility || Shri Rajan Swami Ji🧘🍃|#spjin ...
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