Gayatri Panchamukhi

पंचकोशों का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक स्वरूप शास्त्रों और उपनिषदों (जैसे पैंगलोपनिषद् और तैत्तिरीयोपनिषद्) के अनुसार, मानव शरीर और चेतना पाँच परतों (कोशों) में विभाजित है । जो साधक इन पाँच आवरणों को पार कर लेता है, वह परब्रह्म और अनन्त आनन्द को प्राप्त कर लेता है । आधुनिक विज्ञान (जैसे आइंस्टीन का सापेक्षता सिद्धांत और किर्लियान फोटोग्राफी) भी स्थूल जगत से परे चेतना के इन सूक्ष्म आयामों (चतुर्थ और पंचम आयाम) की पुष्टि की दिशा में बढ़ रहा है । इन पाँच कोशों का विस्तृत विवरण इस प्रकार है: 1. अन्नमय कोश (स्थूल शरीर) परिचय: अन्न से बनने और बढ़ने वाला यह हमारा भौतिक शरीर (Physical Body) है । मानव देह का मुख्य भाग अन्न से ही विकसित होता है और पृथ्वी तत्व में ही विलीन हो जाता है । साधना और लाभ: इसकी साधना का मुख्य उद्देश्य शरीर को स्वस्थ और नीरोग बनाना है । इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम इन्द्रिय निग्रह है, विशेषकर 'स्वाद' पर नियंत्रण रखना । इसके लिए अस्वाद व्रत (सप्ताह में एक दिन बिना नमक और शक्कर का सादा भोजन करना), उपवास और ब्रह्मचर्य का पालन इसकी मुख्य साधनाएँ हैं । इसके शुद्ध होने से शारीरिक रोग मिटते हैं और दीर्घायु की प्राप्ति होती है । 2. प्राणमय कोश (प्राण शरीर) परिचय: यह पाँच प्राण और पाँच कर्मेन्द्रियों से मिलकर बनता है । यह शरीर के भीतर व्याप्त चेतन ऊर्जा (Live Energy) है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में विद्युत रासायनिक प्रक्रियाओं (Bio-electricity) द्वारा संचालित माना जाता है । साधना और लाभ: प्राणमय कोश की शुद्धि और विकास के लिए प्राणायाम (जैसे उज्जाई, नाड़ी शोधन, अनुलोम-विलोम आदि) का अभ्यास किया जाता है । इसके जागरण से व्यक्ति के व्यक्तित्व में चुंबकीय आकर्षण, साहस, शौर्य, और प्रभाव बढ़ता है । 3. मनोमय कोश (मानसिक शरीर) परिचय: यह पाँच ज्ञानेन्द्रियों और मन के मिलने से बनता है । मनुष्य की संकल्प शक्ति, कल्पना, स्मरण शक्ति, भावनाएँ और विचार इसी क्षेत्र से संचालित होते हैं । साधना और लाभ: मनोमय कोश को सुविकसित करने के लिए स्वाध्याय, सत्संग और मनन-चिन्तन की परम आवश्यकता होती है । अचेतन मन (Subconscious mind) की प्रवृत्तियों को नियंत्रित करके मन पर विजय प्राप्त करना इसका लक्ष्य है, जिससे मानसिक चमत्कार, चारित्रिक उत्कृष्टता और प्रखर संकल्प शक्ति का उदय होता है । 4. विज्ञानमय कोश (अतीन्द्रिय शरीर) परिचय: पाँच ज्ञानेन्द्रियों और बुद्धि के मिलन से यह कोश बनता है, जिसे सूक्ष्म शरीर भी कहते हैं । यह चेतना का चतुर्थ आयाम है जो सीधे सूक्ष्म जगत और अतीन्द्रिय क्षमताओं से जुड़ता है । साधना और लाभ: इसी कोश के माध्यम से अतीन्द्रिय ज्ञान (Extrasensory Perception), भविष्य ज्ञान, दिव्य दृष्टि और दूर-श्रवण जैसी सिद्धियाँ अनायास ही जाग्रत हो जाती हैं । वैज्ञानिकों और दार्शनिकों को मिलने वाली अंतर्दृष्टि (Intuition) इसी कोश के जागरण का परिणाम है । इसके परिष्कार से मनुष्य के जीवन का कायाकल्प हो जाता है और वह 'महामानव' के स्तर तक पहुँच जाता है । 5. आनन्दमय कोश (कारण शरीर) परिचय: जिसके कारण ज्ञान होता है, वह आनन्दमय कोश है। इसे 'अमृत कलश' भी कहा गया है । यह जीवात्मा पर चढ़ा अंतिम आवरण है और इसका सर्वोच्च केंद्र मस्तिष्क में 'सहस्रार चक्र' (Brahmarandhra) है । साधना और लाभ: इसकी साधना के दो मुख्य मार्ग हैं—ब्रह्मरंध्र में प्रकाश ज्योति (अखण्ड ज्योति) का ध्यान करना और 'खेचरी मुद्रा' के द्वारा तालु से टपकने वाले दिव्य अमृत रस (सोम-रस) का पान करना । इसके जागरण से जीव और ब्रह्म का मिलन होता है, भव-बन्धनों से मुक्ति (मोक्ष) मिलती है, और साधक परमानन्द तथा आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करता है । निष्कर्ष: गायत्री की पंचमुखी साधना वास्तव में इन्हीं पाँच कोशों के अनावरण की साधना है । जैसे-जैसे साधक एक-एक कोश रूपी आवरण को हटाता जाता है, उसके भीतर देव शक्तियों का अवतरण होता है और वह पूर्णता एवं ब्रह्मानन्द के लक्ष्य तक पहुँच जाता है ।