VARAH PURAN BIGBANG

*श्री वराह पुराण* 18 महापुराणों में से एक प्रमुख और सात्त्विक पुराण है। इसकी कथा की शुरुआत तब होती है जब प्रलयकाल में पृथ्वी को जलमग्न देखकर भगवान विष्णु ने 'वराह' (विशालकाय सूकर) अवतार धारण किया और अपनी दाढ़ों पर रखकर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला। पृथ्वी के मन में सृष्टि की रचना और ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई, जिसके उत्तर में स्वयं भगवान वराह ने उन्हें यह दिव्य ज्ञान दिया। दिए गए स्रोतों के आधार पर वराह पुराण के मुख्य विषयों और कथाओं का विस्तृत विवरण इस प्रकार है: *1. सृष्टि की उत्पत्ति और 'नारायण' का अर्थ* पुराण की शुरुआत में भगवान वराह ब्रह्मांड की उत्पत्ति (सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित) का दार्शनिक वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि सर्वप्रथम परमात्मा से प्रकृति (महत्तत्त्व), अहंकार और पंचतन्मात्राओं की उत्पत्ति हुई। भगवान कहते हैं कि जल को 'नार' कहा जाता है, और जल ही जिनका प्रथम अयन (निवास) था, इसीलिए परब्रह्म परमात्मा को 'नारायण' कहा जाता है। *2. दशावतार और द्वादशी व्रत* इस पुराण में भगवान विष्णु के दस अवतारों—मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि—की सुंदर स्तुति की गई है। इन अवतारों की कृपा प्राप्त करने के लिए विशेष *'द्वादशी व्रतों'* का विधान बताया गया है; जैसे मत्स्य-द्वादशी, कूर्म-द्वादशी, वराह-द्वादशी, वामन-द्वादशी और कल्कि-द्वादशी। इन व्रतों में उपवास रखकर भगवान के विभिन्न स्वरूपों की स्वर्णिम मूर्तियों को जल से भरे कलश पर स्थापित कर उनकी पूजा और दान का विधान है। *3. राजा दुर्जय और महर्षि गौरमुख की कथा* इसमें सत्ययुग के परम पराक्रमी राजा दुर्जय की कथा है। राजा दुर्जय जब महर्षि गौरमुख के आश्रम पहुँचे, तो महर्षि ने भगवान नारायण से प्राप्त 'चिन्तामणि' नामक दिव्य रत्न के प्रभाव से राजा और उनकी विशाल सेना का छप्पन भोगों और महलों से अद्भुत सत्कार किया। यह ऐश्वर्य देखकर राजा के मन में लालच आ गया और उसने बलपूर्वक वह मणि छीनने का प्रयास किया। तब भगवान नारायण के सुदर्शन चक्र ने प्रकट होकर राजा दुर्जय और उसकी संपूर्ण राक्षसी सेना को क्षण भर में भस्म कर दिया। *4. त्रिशक्ति महिमा और महिषासुर वध* वराह पुराण में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की शक्तियों के रूप में प्रकट हुई 'त्रिशक्ति'—ब्राह्मी (सरस्वती), वैष्णवी (लक्ष्मी/दुर्गा) और रौद्री (पार्वती/काली)—का अत्यंत विस्तृत आख्यान है। जब महिषासुर नामक भयानक दैत्य ने त्रिलोकी पर अधिकार कर लिया था, तब भगवती वैष्णवी ने असंख्य देवियों (मातृकाओं) की सेना के साथ महासंग्राम किया और अंततः अपने चक्र और त्रिशूल से महिषासुर का सिर धड़ से अलग कर देवताओं की रक्षा की। इसी प्रसंग के साथ सती के बाद हिमालय के घर देवी गौरी (पार्वती) के रूप में जन्म लेने, भगवान शिव के साथ उनके विवाह, और देवताओं के सेनापति भगवान कार्तिकेय (स्कन्द) तथा भगवान गणेश के प्राकट्य की कथाएँ भी वर्णित हैं। *5. भूगोल और खगोल विज्ञान (भुवन-कोश)* यह पुराण ब्रह्मांडीय भूगोल का एक बड़ा विश्वकोश है। इसमें पृथ्वी के सात द्वीपों, जम्बूद्वीप के नौ खंडों (वर्षों), और 84 हजार योजन ऊंचे 'सुमेरु' (मेरु) पर्वत का अत्यंत सूक्ष्म वर्णन है। इसके अतिरिक्त, भारतवर्ष के सात कुल पर्वतों और गंगा, सिंधु, सरस्वती, गोदावरी, कावेरी जैसी सैकड़ों पवित्र नदियों के उद्गम और उनके भौगोलिक क्षेत्रों का विस्तार से उल्लेख किया गया है। *6. श्राद्ध कल्प और पितृ महिमा* महर्षि मार्कण्डेय द्वारा श्राद्ध (पितरों की पूजा) की अत्यंत सूक्ष्म विधियों का वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि श्राद्ध के लिए कौन से ब्राह्मण योग्य हैं और कौन से अयोग्य (निंदित) हैं। श्राद्ध का उचित काल (जैसे अमावस्या, ग्रहण, और विशेष नक्षत्र) तथा पवित्र 'गया' तीर्थ में पिण्डदान करने से पितरों को मिलने वाली अक्षय तृप्ति और मोक्ष का विस्तार से वर्णन है। *7. अद्वितीय 'धेनु दान' (गायों का दान)* वराह पुराण दान-धर्म के लिए बहुत प्रसिद्ध है। इसमें 'कपिला गौ' (सर्वोत्तम गाय) के दान के साथ-साथ प्रतीकात्मक रूप से बनाई गई विभिन्न प्रकार की गायों के दान का अद्भुत विधान है। जैसे— *जल-धेनु:* जल के घड़े से बनी गाय। *गुड़-धेनु:* गुड़ से बनी गाय। *तिल-धेनु:* तिलों से बनी गाय। इसके अलावा रस-धेनु, शर्करा-धेनु (चीनी की गाय), क्षीर-धेनु (दूध की गाय), दधि-धेनु (दही की गाय), स्वर्ण-धेनु और धान-धेनु का वर्णन है। इन प्रतीकात्मक गायों का दान करने से मनुष्य हर प्रकार के भयंकर पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त करता है। *8. भगवान की सेवा के 32 अपराध (सेवापराध)* पुराण के अंत में उन 32 कार्यों की सूची दी गई है, जिन्हें भगवान विष्णु की पूजा में 'महान अपराध' माना जाता है। इनमें बिना स्नान किए या अपवित्र वस्त्र पहनकर भगवान को स्पर्श करना, क्रोध की अवस्था में पूजा करना, निषिद्ध या अपवित्र भोजन का भोग लगाना, श्मशान से आकर बिना स्नान किये आराधना करना आदि शामिल हैं। निष्कर्षतः, वराह पुराण भक्ति, ज्ञान, भूगोल, कर्मकांड (श्राद्ध व दान) और शक्ति (देवी) उपासना का एक अत्यंत समृद्ध और जीवनोपयोगी ग्रंथ है।