"श्रीमद्भागवत गीता"भारतीय मनोविज्ञान शास्त्र है !
अष्टांग योग - योग के आठ अंग! महर्षि पतंजलि ने योग को 'चित्त की वृत्तियों के निरोध' के रूप में परिभाषित किया है। योगसूत्र में उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आठ अंगों वाले योग का एक मार्ग विस्तार से बताया है। अष्टांग, आठ अंगों वाले, योग को आठ अलग-अलग चरणों वाला मार्ग नहीं समझना चाहिए; यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। योग के ये आठ अंग हैं: १. यम :- (क) अहिंसा - शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को हानि नहीं पहुँचाना (ख) सत्य - विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना (ग) अस्तेय - चोर-प्रवृति का न होना (घ) ब्रह्मचर्य - मन -बुद्धि को * चेतना-ब्रह्म [अंतरात्मा ] में स्थिर करना! ब्रह्मणी चरति इति ब्रह्मचारी! जिनका मन[बुद्धि]एक ब्रह्म में चरित हो ,सम्पूर्ण चराचर में तत्व [ब्रह्म ]दर्शन हो वो तब ब्रह्मचर्य है ! (च) अपरिग्रह - आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना २. नियम: पाँच व्यक्तिगत नैतिकता (क) शौच - शरीर और मन की शुद्धि (ख) संतोष - संतुष्ट और प्रसन्न रहना (ग) तप - स्वयं से अनुशासित रहना (घ) स्वाध्याय - आत्मचिंतन करना (च) ईश्वर-प्रणिधान - ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा ३. आसन: योगासनों द्वारा शारीरिक नियंत्रण ४. प्राणायाम: श्वास-लेने सम्बन्धी खास तकनीकों द्वारा प्राण पर नियंत्रण ५. प्रत्याहार: इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना, इन्द्रियों का अपने वश में होना ६. धारणा: एकाग्रचित्त होना [ मन में सर्वत्र -घट -घट में विराज मान ब्रह्म जो सबसे निकट आत्म रूप में हमारे भीतर विराजमान एक ब्रह्म को धारण करना ] ७. ध्यान: निरंतर ध्यान ८. समाधि: आत्मा से जुड़ना, शब्दों से परे परम-चैतन्य की अवस्था,धी नाम बुद्धि का आत्मा में समाहित हो जाना ,बुध्धि को आत्मा से समाधान प्राप्त होना ! ----------------------------------- नोट ---योग अर्थात बुद्धि का आत्मयोग [आत्मा में समाहित होना ,मिलना ] ही समाधि है ,योग है ! इस स्थिति में मन सहित इंद्रिय अपने वश में होता है,व बुद्धि आत्मा के समाधान [निर्देशन ] से कार्य करती है ! जिससे यम= [ अहिंसा ,सत्य ,अस्तेय ,ब्रह्मचारी ,अपरिग्रह ] ! नियम = [ शौच ,संतोष ,तप ,स्वध्याय , ईश्वर प्रणिधान ] ! प्राणायाम , प्रत्याहार ! ये सब सहज व्यवहार [आचरण ] में आ जाता है ! इसीलिए पूर्ण ज्ञानी सद्गुरु साधक को यम -नियम-आसन-प्राणायाम से पहले सीधा प्रत्याहार -धारणा ध्यान से समाधि [आत्मयोग] कराते है ! इसी को एक ही साधे सब सधै कहा गया है --

कुंडलिनी जागरण में सद्गुरु की भूमिका

! गुरु-तत्व ! पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥26॥ स एषा पूर्वेषम्-अपि गुरुः कालेन-अनवच्छेदत्---

18वीं सदी का काशी और सारनाथ की खोज। बाबू जगत सिंह। Discovery of Sarnath।Varanasi।Babu Jagat Singh

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संधि में ही ईश्वर है----

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