Ye Kaliyug ke Mahabharat ka udghosh hai.... || Narayan Chiranjeevi Samvaad by Deepankur Bhardwaj

This is again a poem about how Chiranjeevi feel about today's Modern era and it's a brief description of Narayan and Chiranjeevi's conversation about Kaliyug.... Jai Shree Krishna ❤️❤️❤️ Instagram Link :   / deepankurbhardwajpoetry   Twitter Link :   / devildeep7   Mahabharat Bori Critical Edition Link : https://drive.google.com/file/d/1bJIe... Lyrics: स्वयं नारायणके नेत्र भर आए घड़ी कुछ ऐसी आई है, मृत्युलोक पर अधर्म का चक्र चला है प्रचण्ड विनाशलीला छाई है। क्रोध में भरकर नारायण गरुड़ को आवाज़ लगाते हैं, वाहन पर अपने आरूढ़ होकर तद्नांतर मृत्युलोक को आते हैं। अंधकार में खोया मनुज कलि के वश में ऐसा आया था, सामने खड़े नारायण को भी पहचान कोई ना पाया था। भगवन सोच रहे मन ही मन मृत्युलोक में कैसा कोहराम छाया है, पूछता हूं चिरंजीवियों से उन्होंने मनुज को अधर्म से क्यों नहीं बचाया है। भगवन तनिक गंभीर हुए विचार एक मन में आया था, और मन के भीतर से आवाज़ लगाकर चिरंजीवियों को बुलाया था। बलि, विभीषण, अश्वत्थामा संग विष्णु समक्ष खड़े जमदगनेय थे, व्यास और कृपा भी साथ में थे और गदा लिए अंजनेय थे। सभी ने नारायण को प्रणाम किया पर पवनपुत्र हनुमान गले से लगकर रो दिए, नारायण में देख छवि प्रभु श्री राम की चरण नारायण के बजरंग बली ने अपने अश्रुओ से धो दिए। गले से लगकर बोले हनुमन क्यों बचाऊं मनुज को प्रभु ये मनुज बड़ा ही धूर्त हुआ है तुमको छलिया बताता है, तुमको है पक्षपाती कहता और हृदय मेरा छलनी हो जाता है। मेरे हृदय में आता है कि इन अधर्मियों के लिए निश्चित ऐसा दंड करूं, इन अधर्मियों पर गदा उठाऊं मस्तक इनका खण्ड-खंड करूं। व्यास भी क्रोध मे भरकर बोले अधर्मियों के महिमामंडन को मनुज ने रचे ना जाने कितने ही उपन्यास है, अरे रामायण महाभारत के अधर्मियों को श्रेष्ठ दिखाकर खुद को समझते वेद व्यास हैं। अर्जुन के रथ पर विश्वकर्मा रचित दिव्य कपि को हनुमान ये बताते हैं, अरे करुणा और भक्ति की मूरत बजरंगी को भी पक्षपाती ठहराते है। सदा ही जिसने परमार्थ किया उस अर्जुन को नीचा ये दिखाते हैं, और ग्रंथों में झूठे श्लोक मिलाकर अधर्मी को वृषा बताते हैं। अरे वृषा तो है जो धर्म को समझे और सदा से ही सत्यवक्तता है, जिस कर्ण ने झूठ बोलकर ही शिक्षा और सब कुछ प्राप्त किया था उसे हमारा कृष्ण वृषा कैसे कह सकता है। अब अश्वत्थामा भी क्रोध में बोले इस मनुज की क्यों रक्षा करूं मेरे पिता को कटु वचन ये सुनाते हैं, सनातन धर्म को गलत दिखाने हेतु ग्रंथों में जातिवाद दिखाते हैं। हां मैंने जघन्य अपराध किया था जिसका फल भी मैंने भोगा है, पर मेरे पूज्य पिता को झूठ बोलकर क्यों पहनाया अधर्म का चोगा है। सूतपुत्र कर्ण को नीची जाति बताकर सहानुभूति कमाते हैं, और जातिवाद से लोगों को आपस में लड़वाकर राजनीति खेल जाते हैं। कृपाचार्य को भी ताँव चढ़ा और बोले दुर्योधन-कर्ण को आदर्श मानकर ये समाज भी बन चुका अधर्मी है, आज भी द्रौपदी नही है सुरक्षित मनुष्य हो चला दुष्कर्मी है। हाथ जोड़ फिर बोले विभीषण धर्म की खातिर विरुद्ध हुआ भाई के फिर भी ना मिला मुझको सम्मान है, इस मनुज की मैं क्यों रक्षा करूं जो कुलद्रोही कहकर करते मेरा अपमान हैं। रावण का सम्मान ये करते कहते मैया सीता को कभी ना हाथ लगाया था, नही बताते अप्सरा से दुष्कर्म के कारण श्राप उसने ये पाया था। श्राप था यदि किसी स्त्री को रावण उसकी इच्छा के विरूद्ध हाथ लगाएगा, ऐसा घिनौना अपराध करते ही उसका मस्तक खंड खंड हो जाएगा। रावण बनने की चाह में ये मनुज अपने अहंकार में ऐंठा है, उसके जितना ज्ञान तो प्राप्त कर सकता नही था बस उसकी भांति दुष्कर्मी बन बैठा है। हनुमान बोले हे प्रभु मैं तो आपकी प्रतीक्षा में ये अधर्म सहता हूं, पर जितने भी यहां राम और कृष्ण भक्त है उनकी रक्षा के लिए तत्पर रहता हूं। नारायण ने फिर मौन को तोड़ा और बोले कुछ क्षण ठहरो मैं कल्कि बनकर आऊंगा, कलि पुरुष की इस अधर्मी सेना में भीषण विध्वंस मचाऊंगा। और धर्मयोद्धाओं में भी संदेश भेज दो दुष्कर्मियों की छाती पर तन जाओ तुम, इनके अधर्मी जीवन को कालभैरव बन खा जाओ तुम। अभी कुछ समय है ये तुम्हारी जिम्मेदारी कहीं ना कोई दुराचार हो, निर्भया और आसिफा के आगे मानवता फिर से ना अब शर्मसार हो। जो सही मार्ग पर आ जाएगा वो फिर से स्वर्णयुग में जाएगा, और जो अधर्म में ही खोया रहेगा वो काल की भेंट चढ़ जाएगा। अरे कह दो जाकर दुनिया से अब कल्कि आने वाले हैं, अधर्मियों के उपर संकट के बादल फिर से छाने वाले हैं। कल्कि का संदेश यही है कलि के दिखाए बुरे स्वप्न को तोड़ दो और ये नीच अधर्मियों को आदर्श बनाकर जबरदस्ती धर्मात्मा दिखाना अब छोड़ दो। द्वापर से भी महाभयंकर महाभारत अब हो जाएगा, और कह दो सबसे अधर्म का साथ छोड़ दें वरना गेहूं के साथ घुन भी अब पिस जाएगा। जाकर कह दो सबसे अब जरा विवेक का इस्तेमाल करो, अधर्मियों का महिमामंडन करके ना तैयार अपना काल करो। कहदो जाकर अधर्म के भक्तों से कोई कर्ण आज भी दुर्योधन को नहीं बचा पाएगा, दुःशासन से भी बुरी मौत दुष्कर्मियों को विष्णु का कल्कि रुप दिखलाएगा। ये मेरी कविता नहीं ये है चेतावनी अब अधर्मियों पर उतरना धर्म का रोष है, कान खोल कर सुनो अधर्मियों ये कलयुग के महाभारत का उद्घोष है।

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