श्री दक्षेश्वर महादेव मंदिर | भगवान शिव का ससुराल | प्राचीन मंदिर | हरिद्वार | 4K | दर्शन 🙏

हर हर महादेव, आप सभी का हमारे कार्यक्रम दर्शन में हार्दिक अभिनन्दन, भक्तों हमारे देश में विभिन्न प्राचीन एवं पौराणिक धार्मिक स्थलों की कोई न कोई कथा है, कोई न कोई रहस्य है. जिसकी वजह से दूर दूर से लाखों लोग इन स्थलों के दर्शन करने जाते हैं. इन्ही स्थलों में एक ऐसा पौराणिक एवं पवित्र स्थल है जिसको देवी सती का जन्म स्थान एवं भगवान् भोलेनाथ की ससुराल के रूप में जाना जाता है. जहाँ से जुडी हुई कथा हम सबने सुनी है.वो स्थान जहाँ माता सती ने अपने पति भगवान् शिव का अपमान देख यग्य की अग्नि में प्रवेश कर गयीं. वो स्थान जहाँ भगवान् शिव ने क्रोध में दक्ष प्रजापति को उनके अहंकार का भयानक दंड दिया, तत्पश्चात उनको माफ़ कर स्वयं वहां दक्ष के ईश्वर के रूप में विराजमान भी हुए और हर श्रावण मास में यहाँ अपने आगमन का वचन भी दिया. भक्तों आज हम आपको दर्शन करवाने जा रहे हैं पवित्र पौराणिक स्थल हरिद्वार में स्थित “दक्षेश्वर महादेव मंदिर “ के. मंदिर के बारे में: भक्तों, उत्तराखंड के हरिद्वार जिले से ४ किलोमीटर दूर कनखल में स्थित ""दक्षेश्वर महादेव"" मंदिर महादेव को समर्पित हरिद्वार क्षेत्र के प्राचीनतम मंदिरो में से एक है। इस मंदिर से जुडी एक पौराणिक कथा है, जिसका वर्णन हमारे कई पुराणों में है, भक्तो यहाँ भगवान शिव प्रजापति दक्ष के ईश्वर के रूप में विराजते हैं, इसीलिए इन्हे दक्षेश्वर महादेव कहते हैं. मंदिर का निर्माण एवं मंदिर से जुडी कथा: भक्तो, दक्षेश्वर महादेव अति प्राचीन मंदिर है, कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 1810 में रानी धनकौर ने नागरा शैली में करवाया था। तथा मंदिर का पुर्निर्माण 1962 में किया गया, भक्तो, दक्षेश्वर मंदिर से जुडी एक पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष प्रजापति की कन्या देवी सती जी ने भगवान् शिव जी से विवाह किया था, पर दक्ष शिव जी से घृणा करते थे, एक बार दक्ष ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया पर अपनी पुत्री सती और शिव जी को यज्ञ का निमंत्रण नहीं दिया, पर देवी सती भगवान् शिव जी के मना करने पर भी अपने पिता दक्ष के यज्ञ में चली गई, और वहां पिता दक्ष द्वारा अपने पति भगवान् शिव की शिव जी की निंदा वो सह न सही और यज्ञ मंडप में ही सती जी ने अपनी आहुति दे दी, जब महादेव शिव जी को ये ज्ञात हुआ तो उन्होंने अपने प्रमुख गण वीरभद्र को अन्य गणो के साथ दक्ष का सर्वनाश करने भेज दिया , शिव जी के गणो ने यज्ञ सहित सब तहस-नहस कर दिया, और प्रजापति दक्ष की गर्दन काटकर उन्हें मार दिया, परन्तु ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के निवेदन करने पर भगवान् शिव जी ने दक्ष को बकरे का सिर लगाकर पुनः जीवित कर दिया, दक्ष को जीवन दान मिलते ही उसने भगवान शिव की स्तुति की और अपनी भूल का पश्चाताप किया, और फिर भक्तवत्सल भगवान शिव ने दक्ष को क्षमा कर दिया और जहाँ यज्ञ किया गया था वहीँ पर अपना स्वरूप दक्ष के ईश्वर यानि दक्षेस्वर महादेव के रूप में प्रकट किया। भक्तो ये वही स्थान है जो ""दक्षेश्वर महादेव"" मंदिर के रूप में विख्यात हैं। इसके बाद देवी सती जी पर्वत हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्मी और फिर घोर तपस्या एवं परीक्षाओं के बाद भगवान् शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त किया. मंदिर परिसर: भक्तो ""दक्षेश्वर महादेव"" बहुत ही सुन्दर एवं प्राचीन मंदिर है, मन्दिर का प्रवेश द्वार बहुत ही आकर्षक है, प्रवेश के बाद मंदिर का प्रांगण भी दिव्य प्रतीत होता है, यहाँ प्रवेश के बाद भगवान् शिव जी एवं माता सती की एक बहुत ही सुंदर एवं भाव विभोर कर देनी वाली प्रतिमा दिखाई देती है... मंदिर के पास ही भोग प्रसाद व पूजा सामग्री की बहुत सी दुकाने बनी हुईं हैं. भक्तो मंदिर का निर्माण उत्तर भारतीय शैली में ही हुआ है, इस मंदिर का विशाल आकर्षक शिखर बहुत दूर से ही दिख जाता है। मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश करने पर सामने शेर की दो प्रतिमाएं भी स्थापित की गयीं हैं. दक्षेश्वर महादेव मंदिर की दीवारों पर रंगो का बहुत ही सुन्दर प्रयोग किया गया है, रंगो के सही चुनाव एवं सुंदर कलाकृतियों के कारण मंदिर की सुन्दरता में मानो चार चाँद लग गए हैं। यहाँ मुख्य मंदिर श्री दक्षेश्वर मंदिर के आस-पास कई अन्य मंदिर भी स्थित हैं। मंदिर परिसर में एक विशाल बरगद का वृक्ष है, जिस पर मनोकामना की पूर्ति के लिए श्रद्धालु धागे बांधते हैं तथा मंदिर परिसर में ही गंगा माता का मंदिर, ब्रह्मेश्वर महादेव मंदिर, श्री शनिदेव मंदिर, श्री राम दरबार मंदिर, श्री वैष्णो माता मंदिर, श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर भी बना हुआ है, मंदिर परिसर में दक्ष यग्य कुंड भी है तथा एक छोटा सा देवी सती कुंड के नाम से भी स्थान है. माना जाता है इसी कुंड में देवी सती ने अपने शरीर की आहूति दी थी. दक्षेस्वर महादेव मंदिर के पास ही दस महा विद्या मंदिर भी है जो महाविद्या को समर्पित है, मंदिर के पास ही दक्ष घाट है माँ गंगा के तट पर स्थित इस घाट पर प्रभु श्री नारायण के पदचिन्ह के दर्शन भी होते हैं. मंदिर के समीप ही नीलेश्वर महादेव मंदिर भी है। श्रावण मास में दक्ष घाट पर स्नान करने से पुण्यो में वृद्धि होती है। मंदिर परिसर में इच्छाप्रद हनुमान जी का भी बहुत ही सुंदर मंदिर है जिसमे हनुमान जी के साथ, भगवान् गणेश एवं श्री काल भैरव की प्रतिमा भी विराजमान हैं. श्रेय: लेखक - याचना अवस्थी Disclaimer: यहाँ मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहाँ यह बताना जरूरी है कि तिलक किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. #devotional #hinduism #dakshkeshwarmahadevmandir #bholenath #uttrakhand #tilak #travel #vlogs

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