प्रवचनसार #046,047 | तीर्थंकर अरिहंत भगवान की विशेषताएँ | Tirthankar Arihant Bhagwaan Ki Visheshtaye
पुण्णफला अरहंता तेसिं किरिया पुणो हि ओदइया। मोहादीहिं विरहिदा तम्हा सा खाइगं त्ति मदा॥ ४६॥ अन्वयार्थ - (अरहंता) अरहन्त भगवान (पुण्णफला) पुण्य फल वाले हैं (पुणो हि) और (तेसिं किरिया) उनकी क्रिया (ओदइया) औदयिकी है, (मोहादीहिं विरहिदा) मोहादि से रहित है, (तम्हा) इसलिये (सा) वह (खाइगं) क्षायिकी (त्ति मदा) मानी गई है। जदि सो सुहो व असूहो ण हवदि आदा सयं सहावेण। संसारो वि ण विज्जदि सव्वेसिं जीवकायाणं ॥ ४७ ॥ अन्वयार्थ - (जदि) यदि (यह माना जाये कि) (सो आदा) आत्मा (सयं) स्वयं (सहावेण) स्वभाव से (सुहो व असुहो) शुभ या अशुभ (ण हवदि) नहीं होता (शुभाशुभ भाव में परिणमित ही नहीं होता) (सव्वेसिं जीवकायाणं) तो समस्त जीव निकायों के (संसारो वि) संसार भी (ण विज्ञदि) विद्यमान नहीं है, (ऐसा सिद्ध होगा)। तीर्थंकर अरिहंत भगवान की विशेषताएँ पूज्य मुनि श्री इस गाथा 046 के माध्यम से बताते हैं कि तीर्थंकर अरिहंत भगवान की सारी क्रियाएँ स्वभाव से होती हैं जिसके कारण उन्हें कर्म बंध नहीं होता है। यह तीर्थंकर भगवान के उत्कृष्ट पुण्य का फल होता है कि औदायिक भाव होने पर भी वह बंध का कारण नहीं बनता। मुनि श्री सामान्य केवली और तीर्थंकर केवली में अंतर समझाते हुए तीर्थंकर भगवान के पुण्य का वर्णन कर रहे हैं। अतः पुण्य हेय नहीं है। पुण्य के फल से ही केवलज्ञान प्राप्त करने के उपरांत उनका तीर्थ चलता है। उनका सम्पूर्ण वैभव से सुशोभित होना, आकाश में गमन करना आदि क्रियाएँ उनके पुण्य से होती है। वे अहं और मम भाव से रहित होते हैं। गाथा 048 में मुनि श्री बताते हैं कि यदि हम यह नहीं मानेंगे कि स्वभाव से संसारि आत्मा का परिणमन शुभ और अशुभ भावों से चलता है, तो वह आत्मा तो मुक्त ही कहलाएगा । यदि भीतर आत्मा शुद्ध है तो मोक्ष जाने की ज़रूरत क्या है ? Contributed by: Aashna Jain, New Delhi Date: 2018-08-23 Gatha: 046-047 Granth: Pravachansar Pravachan: Muni Shri Pranamya Sagar ji

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