प्रवचनसार #048,049 | क्षायिक ज्ञान और केवलज्ञान | Kshayik Gyan Aur Kewal Gyan | मुनि प्रणम्य सागर

जं तक्कालियमिदरं जाणदि जुगवं समंतदो सव्वं। इत्थं विचित्तविसमं तं णाणं खाइयं भणिदं ॥ ४८ ॥ अन्वयार्थ - (जं) जो (जुगवं) एक ही साथ (समंतदो) सर्वतः (सर्वआत्मप्रदेशों से) (तक्कालियं) तात्कालिक (इदरं) या अतात्कालिक, (विचित्तविसमं) विचित्र और विषम (मूर्त अमूर्त आदि असमान जाति के) (सव्वं इत्थं) समस्त पदार्थों को इस प्रकार (जाणदि) जानता है (तं णाणं) उन ज्ञान को (खाइयं भणिदं) क्षायिक कहा है। जो ण विजाणदि जुगवं अत्थे तेक्कालिगे तिहुवणट्ठे। णादुं तस्स ण सक्कं सपज्जयं दव्वमेक्कं वा॥४९॥ अन्वयार्थ - (जो) जो (जुगवं) एक ही साथ (तेक्कालिगे तिहुवणट्ठे) त्रैकालिक त्रिभुवनस्थ (तीनों काल के और तीनों लोक के) (अत्थे) पदार्थों को (ण विजाणदि) नहीं जानता, (तस्स) उसे (सपज्जयं) पर्याय सहित (दव्वमेक्कं) एक द्रव्य भी (णादुं ण सक्कं) जानना शक्य नहीं है। 🔳48, यहाँ आचार्य कैवल्यज्ञान ज्ञान में ही क्षायिक ज्ञान की सिद्धि बता रहे हैं,,केवल ज्ञान और क्षायिक ज्ञान को एक ही मानना चाहिए ,क्योकि क्षायिक ज्ञान भी तात्कालिक,भूतकालिक,व भविष्य तीनो को एक साथ (युगपथ)सब ओर से जानता हैं 🔳लोक में ज्ञेय अनंत है ,विचित्र और विषम हैं ,विचित्रता मतलब भिन्न्ता, इसको एक साथ सभी ओर से जानना ही क्षायिक ज्ञान है 🔳49- जो तीन लोक के समस्त पदार्थ को नहीं जानता या जानने में समर्थ नही हैं ,तो वह एक भी द्रव्य जानने योग्य नही होगा ,वह कैसे? उसको समझाने को आचार्य कहते हैं कि अगर कोई एक द्रव्य को जान लेगा तो वह सब को जान लेगा क्योकि एक द्रव्य में अनंत पर्याय हैं,, और जो सबको जान लेगा वह स्वयं को भी जान लेगा ,अतः जो आत्मज्ञ है वही सर्वज्ञ है,जो सर्वज्ञ है वही आत्मज्ञ हैं। Contributed by: Rakhi Jain, Delhi Date: 2018-08-24 Gatha: 048-049 Granth: Pravachansar Pravachan: Muni Shri Pranamya Sagar ji

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