आचार्य धर्मकीर्ति कृत न्यायबिंदु बौद्ध तर्कशास्त्र और ज्ञानमीमांसा ( buddhist epistemology )
धर्मकीर्ति का न्यायबिंदु बौद्ध तर्कशास्त्र और ज्ञानमीमांसा (एपिस्टेमोलॉजी) की वह अनुपम कृति है, जो न केवल बौद्ध दर्शन की प्रमाण-व्यवस्था को सुसंबद्ध रूप में प्रस्तुत करती है, बल्कि भारतीय दार्शनिक परंपरा में तर्क-तक्र के शिखर का प्रतिनिधित्व करती है। इस ग्रंथ का मूल प्रयोजन यह स्थापित करना है कि *सम्यक् ज्ञान* ही सफल मानव-क्रिया (व्यावहारिक सफलता) का आधार है, और वह ज्ञान केवल दो ही प्रमाणों से उत्पन्न होता है—**प्रत्यक्ष** (प्रत्यक्ष अनुभव) और *अनुमान* (तार्किक निगमन)। धर्मकीर्ति प्रत्यक्ष की परिभाषा अत्यंत कठोर शब्दों में करते हैं—वह *कल्पना-रहित* (निर्विकल्पक) ज्ञान है, जो इंद्रियों के सीधे संपर्क से उत्पन्न होता है और उसमें किसी भी प्रकार की सांकेतिक या भाषिक अर्थ-योजना (अधिक्षेप) नहीं होती; यह केवल *स्वलक्षण* (अद्वितीय विशेषता-युक्त क्षणिक सत्ता) को ग्रहण करता है, जो पूर्णतः व्यक्तिवाचक और अतीन्द्रिय नहीं, बल्कि इंद्रिय-गम्य है। दूसरी ओर, अनुमान *सामान्य लक्षण* (जाति या सामान्य धर्म) पर आधारित है और वह *त्रिरूप लिंग* (तीन रूपों वाला लिंग या हेतु) के द्वारा कार्य करता है—अर्थात हेतु को साध्य में अवश्य होना चाहिए, हेतु का अस्तित्व पक्ष (धर्मी) में होना चाहिए, और हेतु व्याप्ति (व्यापक संबंध) द्वारा साध्य से बद्ध होना चाहिए। इस त्रिरूप हेतु के बिना कोई भी अनुमान प्रमाण नहीं बन सकता। इस ग्रंथ में धर्मकीर्ति अनुमान का *दो स्तरों* पर विभाजन करते हैं—**स्वार्थानुमान** (जो केवल स्वयं के निश्चय के लिए होता है, उसमें मौखिक अभिव्यक्ति की आवश्यकता नहीं) और *परार्थानुमान* (जो दूसरों को विश्वास दिलाने के लिए होता है, और उसमें पाँच अवयवों—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन—वाली पद्धति का प्रयोग किया जाता है)। परार्थानुमान को प्रस्तुत करने के लिए धर्मकीर्ति *वाद-संरचना* का कड़ा अनुशासन बताते हैं, जिसमें *पक्ष* (जिसके बारे में कुछ सिद्ध करना है), *साध्य* (जिसे सिद्ध करना है) और *हेतु* (तर्क) का स्पष्ट निर्धारण आवश्यक है। इसके साथ ही, वे *हेत्वाभासों* (तार्किक दोषों) की विस्तृत सूची देते हैं—जैसे असिद्ध, विरुद्ध, अनैकांतिक, बाधित, आदि—ताकि साधक झूठे या छद्म तर्कों को पहचान सके और उनसे बच सके। यह त्रुटि-विज्ञान न केवल वाद-प्रतिवाद को निष्पक्ष बनाता है, बल्कि अनुमान की वैधता को भी कसौटी पर परखता है। अंततः, न्यायबिंदु का *लक्ष्य* केवल औपचारिक तर्क-कौशल सिखाना नहीं, बल्कि *परमार्थ सत्ता* का बोध कराना है—जो बौद्ध दृष्टि से *क्षणिक* और *प्रतिबद्ध* (कार्य-कारण शृंखला में बंधी) विशेषताओं वाला है। धर्मकीर्ति के अनुसार, प्रत्येक सत्ता अपने उत्पादन-क्षमता (अर्थक्रियाकारित्व) द्वारा परिभाषित होती है, और इसी अर्थक्रिया के आधार पर हम कार्य-कारण संबंध को जान सकते हैं। जब कोई वस्तु किसी विशिष्ट कार्य को करने में समर्थ होती है, तभी वह *स्वलक्षण* (ultimate reality) के रूप में सिद्ध होती है; बाकी सब कुछ सामान्यीकरण, कल्पना या भाषिक निर्माण मात्र है, जो व्यावहारिक दृष्टि से उपयोगी तो हो सकता है, परंतु परमार्थतः असत्य है। इस प्रकार, न्यायबिंदु एक ऐसा दर्पण है जो तर्क, अनुभव और सत्ता-तत्व को एक सूत्र में पिरोता है, और साधक को संसार के व्यावहारिक जीवन से लेकर निर्वाण की परम अनुभूति तक की यात्रा में *वैध ज्ञान* का अटूट आधार प्रदान करता है।

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