Bhrigu kamandal and Dhuni Paani - Amarkantak

भृगु कमण्डल : आश्चर्यजनक! 12 माह चट्टान में रहता है पानी अमरकंटक के जंगल में, ऊंचे पहाड़ पर एक चट्टान ऐसी है, जिसमें 12 महीने पानी रहता है। चट्टान में एक छेद है, उसमें हाथ डाल कर अंजुली भर जल निकाल सकते हैं। इस आश्चर्यजनक चट्टान को भृगु का कमंडल कहा जाता है। माँ नर्मदा मंदिर से लगभग 4 किमी दूर घने जंगल और ऊंचे पहाड़ पर भृगु कमंडल स्थित है। भृगु कमंडल तक पहुँचना कठिन तो नहीं है, लेकिन बाकी स्थानों की अपेक्षा यहाँ पहुँचने में थोड़ा अधिक समय और श्रम तो लगता ही है। कुछ दूरी तक आप मोटरसाइकिल या चारपहिया वाहन से जा सकते हैं, परंतु आगे का रास्ता पैदल ही तय करना होता है। भृगु कमंडल के लिए जाते समय आप एक और नैसर्गिक पर्यटन स्थल धूनी-पानी पर प्रकृति का स्नेह प्राप्त कर सकते हैं। यह स्थान रास्ते में ही पड़ता है। घने जंगल के बीच स्थित भृगु कमंडल तक पहुँचने के लिए पहले पहाड़ उतरकर धूनी-पानी पहुँचे और फिर वहाँ से आगे जंगल में कीटों और पक्षियों का संगीत सुनते हुए पहाड़ चढ़ते गए। अमरकंटक के जंगलों में पेड़ों पर एक कीट सिकोड़ा पाया जाता है, जो एक विशेष प्रकार से टी-टी जैसी ध्वनि निकालता रहता है। शांत वन में पेड़ों पर झुंड में रहने वाले सिकोड़ा कीट जब टी-टी का सामुहिक उच्चार करते हैं तब विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है। बहरहाल, घने जंगल और पहाड़ों से होकर हम भृगु कमण्डल तक पहुँच गए। ऊंचे पहाड़ पर यह एक निर्जन स्थान है। यहाँ कम ही लोग आते हैं। ध्यान-साधना करने वाले साधुओं का यह प्रिय स्थान है। यहाँ एक बड़ी चट्टान है, जिसे भृगु ऋषि का कमण्डल कहा जाता है। कमण्डल की आकृति की इस चट्टान में एक छेद है, जिसमें हाथ डाल श्रद्धालु पानी निकालते हैं और पास ही प्रतिष्ठित शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस स्थान पर भृगु ऋषि ने कठोर तप किया था, जिसके कारण उनके कमण्डल से एक नदी निकली, जिसे करा कमण्डल भी कहा जाता है। कहते यह भी भृगु ऋषि धूनी-पानी स्थान पर तप करते थे। बारिश के दिनों में वहाँ धूनी जलाना मुश्किल हो जाता था, तब भृगु ऋषि उस स्थान पर आए जिसे आज भृगु कमण्डल कहते हैं। जब ऋषि भृगु यहाँ आए तब उनके सामने जल का संकट खड़ा हो गया। उनकी प्रार्थना पर ही माँ नर्मदा उनके कमंडल में प्रकट हुईं। यहाँ एक सुरंग है, जिसे भृगु गुफा कहा गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि बड़ी-बड़ी चट्टानों के मेल से यह गुफा बनी है। आज भी धार्मिक पर्यटक और श्रद्धालु गुफा में एक ओर से प्रवेश करते हैं और दूसरी ओर से निकलते हैं। बारिश के मौसम में इसी गुफा में ऋषि भृगु धूनी रमा कर तप करते थे। अमरकंटक के ‘धूनी-पानी’ की कहानी भी बड़ी रोचक है। स्वाभाविक ही किसी स्थान के नाम में‘धूनी’ से आभास होता है कि यह कोई ऐसा स्थल है जहाँ साधु-संन्यासी धूनी रमाते होंगे। ‘पानी’ बताता है कि वहाँ जल का विशेष स्रोत होगा। धूनी और पानी दोनों से मिलकर ही ‘धूनी-पानी’ नामकरण हुआ होगा। श्री नर्मदा मंदिर से श्री नर्मदा मंदिर से दक्षिण दिशा की ओर लगभग 5 किमी की दूरी तय करने पर हम इस स्थान पर पहुँच चुके हैं। यह स्थान चारों ओर से ऊंचे सरई, आम, जामुन और कटहल के पेड़ों से घिरा हुआ है। यहाँ नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य पूर्णता के साथ उपस्थित है। शांत-सुरम्य वन के बीच में हमें एक छोटा-सा दोमंजिला मंदिरनुमा भवन दिखाई दिया। आज इसी भवन में ‘धूनी’ रमा कर साधु बैठते हैं। पूर्व में कभी आसमान के नीचे साधु खुले में धूनी रमाते रहे होंगे, बाद में बारिश से बचने के लिए भवन बना लिया। पास में ही यहाँ जलकुण्ड दिखाई देते हैं, जो यहाँ के साधुओं के लिए ‘पानी’ के स्रोत हैं। नर्मदा परिक्रमावासियों के लिए भी यहाँ स्थान बना हुआ है। जहाँ वे ठहर सकते हैं और भोजन इत्यादि बना-खा सकते हैं। माँ नर्मदा की परिक्रमा के दौरान परिक्रमावासी यहाँ आते ही हैं। उन दिनों इस स्थान पर विशेष चहल-पहल रहती है। सामान्य दिनों में भी यहाँ बैठ कर प्रकृति के सान्निध्य और उसके ममत्व से उत्पन्न आनंद की सहज अनुभूति की जा सकती है। उन्होंने ही बताया कि किसी समय में भृगु ऋषि ने यहाँ धूनी रमा कर तपस्या की थी। यहाँ पानी का स्रोत नहीं था। उन्हें पानी लेने के लिए थोड़ी ही दूर स्थित ‘चिलम पानी’ जाना पड़ता था। पानी लेने जाने में संभवत: उन्हें कष्ट नहीं भी होता होगा किंतु जंगल के जीव-जन्तु जो भृगु ऋषि के साथी भी थे, उन्हें भी पानी के लिए भटकना पड़ता था। अपने साथियों की सुविधा के लिए उन्होंने जल स्रोत के लिए माँ नर्मदा से प्रार्थना की, तब ‘धूनी’ के समीप ही पाँच जल स्रोत फूट पड़े। यह भारतीय संस्कृति का आधार है कि यहाँ सिर्फ अपने बारे में विचार नहीं किया जाता, बल्कि प्राणी मात्र की चिंता रहती है। आज भी यहाँ पानी के वे कुण्ड हैं। भवन के दाहिनी ओर अमृत कुण्ड और बांई ओर सरस्वती कुण्ड है। इन दोनों कुण्डों के अलावा तीन छोटे कुण्ड भी हैं- भृगु कुण्ड, नारद कुण्ड और मोहान कुण्ड। माँ नर्मदा की कृपा से धूनी के समीप पाँच जलस्रोत के प्रकट होने के कारण ही इस स्थान का नाम धूनी-पानी पड़ गया। यहाँ फलों-फूल के पेड़ों से समृद्ध बगीचा भी है। संत रामदासजी महाराज ने उस दिन हमें खूब सारे मीठे आम दिए, जो यहीं के पेड़ो से टपके थे। धूनी-पानी के संबंध में एक और महत्व की बात है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ अनेक ऋषि-मुनियों ने यज्ञ किये थे, इसलिए आज भी यहाँ जमीन की खुदाई करने पर राख जैसी मिट्टी निकलने लगती है। धूनी-पानी धार्मिक तपस्थली ही नहीं, अपितु प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण स्थान भी है। निश्चित ही प्रकृति प्रेमियों को यहाँ आना सुख देगा। उनके लिए यह स्थान अत्यधिक आनंददायक है। शांत चित्त से यहाँ बैठकर अच्छा समय बिताया जा सकता है। Source : https://apnapanchoo.blogspot.com

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