मुद्गल ऋषिऔर नेवले की कथा_सच्चा दान महाभारत की सीख
अकाल और ब्राह्मण परिवार एक समय भयंकर अकाल पड़ा। एक निर्धन ब्राह्मण परिवार रहता था, जिसे कई दिनों तक भोजन नहीं मिला। बड़ी कठिनाई से उन्हें थोड़ा-सा सत्तू (जौ का आटा) प्राप्त हुआ। परिवार में पति, पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू थे। जब वे भोजन करने बैठे, तभी एक अतिथि उनके द्वार पर आया। भारतीय परंपरा में अतिथि को देवता माना जाता है। अतिथि भूख से व्याकुल था। ब्राह्मण ने अपना हिस्सा अतिथि को दे दिया, लेकिन उसकी भूख नहीं मिटी। तब पत्नी ने अपना हिस्सा दे दिया। फिर पुत्र और पुत्रवधू ने भी अपना-अपना भोजन अतिथि को अर्पित कर दिया। अतिथि वास्तव में धर्मदेव थे, जो उनकी परीक्षा लेने आए थे। परिवार स्वयं भूखा रहा, लेकिन अतिथि को तृप्त कर दिया। उनके इस अद्वितीय त्याग से प्रसन्न होकर धर्मदेव ने उन्हें दिव्य लोक की प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। आधा स्वर्णिम नेवला उस भोजन के कुछ कण भूमि पर गिर गए थे। एक नेवला वहाँ आया और उन कणों पर लोटने लगा। आश्चर्यजनक रूप से उसके शरीर का आधा भाग स्वर्ण के समान चमकने लगा। नेवले ने सोचा कि शायद किसी और महान यज्ञ या दान के स्थान पर लोटने से उसका शेष शरीर भी स्वर्णिम हो जाएगा। युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ में बाद में Yudhishthira ने भव्य Ashvamedha Yajna का आयोजन किया। वहाँ असंख्य ब्राह्मणों को दान दिया गया, सोना-चाँदी वितरित हुआ और विशाल यज्ञ सम्पन्न हुआ। उसी समय वह नेवला वहाँ पहुँचा और यज्ञभूमि में लोटने लगा। परन्तु उसके शरीर का शेष भाग स्वर्णिम नहीं हुआ। तब नेवले ने कहा— "यह महान यज्ञ भी उस निर्धन ब्राह्मण परिवार के त्याग के समान नहीं है। उन्होंने अपनी प्राणरक्षा के लिए रखा हुआ अंतिम भोजन भी अतिथि को दे दिया था। वह दान सच्चे त्याग और धर्म से युक्त था।" कथा का संदेश दान का मूल्य उसकी मात्रा से नहीं, त्याग की भावना से आँका जाता है। भूखे रहकर भी अतिथि को भोजन देना सर्वोच्च धर्म माना गया है। सच्ची भक्ति और त्याग बड़े-बड़े यज्ञों से भी श्रेष्ठ हो सकते हैं। धर्म का आधार निष्काम भावना है, प्रदर्शन नहीं। इस कथा में जिस ब्राह्मण परिवार का वर्णन है, अनेक परंपराओं में उन्हें मुद्गल ऋषि का परिवार माना जाता है, जबकि कुछ संस्करणों में उन्हें केवल एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवार बताया गया है। कथा का मुख्य संदेश त्याग, अतिथि-सत्कार और निष्काम दान की महिमा है।

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