अमरूद की बाग़वानी की पूरी जानकारी, Complete information about guava gardening ​⁠@Jaihindnursery

‪@Jaihindnursery‬ अमरूद में शाखा- बँकन द्वारा बहार-नियंत्रण डॉ. दीपा सामंत एवं डॉ. कुंदन किशोर भा.कृ.अनु.प. भा. बा.अं.सं केंद्रीय बागवानी परीक्षण केंद्र आईगिनिया, भुवनेश्वर 159019, ओडिशा - भारत वर्ष में फल वृक्षों की बागवानी में अमरूद का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के 2014-15 के बागवानी आंकड़ों के मुताबिक देश में उत्पादित की जाने वाली फलदार फसलों में इसका स्थान क्षेत्रफल तथा उत्पादन दोनों की दृष्टि से पाँचवीं है। अमरूद के वृक्ष में फूल लगने को बहार आना कहा जाता है तथा उत्पादक क्षेत्र की जलवायु के अनुसार इसमें साल भर में एक से अधिक बार बहारें आती है गरम एवं नम जलवायु वाले पूर्वी भारत के तटीय राज्यओडिशा में दो बहार पायी जाती हैं। बसंत ऋतु (मार्च-अप्रैल) में आने वाली बहार कोअंबे बहार तथा वर्षा ऋतु (जुलाई-अगस्त) में आने वाली बहार को मृग बहार के नाम से जाना जाता है । अंबे बहार से वर्षा कालीन फसल प्राप्त होती है जबकि मृग बहार से शीत कालीन शीत कालीन फसल की पैदावार / उपज वर्षा कालीन फसल कम होती है क्योंकि पादप खाद्य भण्डार का मुख्य हिस्सा अंबे बहार की प्रक्रिया में उपयोगित हो जाता है तथा मृग बहार के लिए खाद्य भंडार बहुत कम मात्रा में उपलब्ध हो पाता है। शीतकालीन फसल की फलत / उपज कम होने के बावजूद भी इसे वर्षा कालीन फसल से ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है तथा पसंद किया जाता है क्योंकि स्वाद एवं पौष्टिकता की दृष्टि से यह फसलवर्षा कालीन फसल की तुलना में उत्कृष्ट गुणवत्तावाली होती है तथा इसे बेहतर बाजार भाव भीमिलता है । इसलिए अमरुद की व्यावसायिक बागवानी में शीत कालीन फसल देने वाली मृग बहार को वांछनीय माना गया है तथा वह प्रक्रिया जिसके जरिये एक वृक्ष को बांछनीय बहार अधिक मात्रा में देने के लिए बाध्य किया जाता है को बहार नियंत्रण कहा जाता है। बहार- नियंत्रण के तरीके: अमरूद की बागवानी में उत्कृष्ट गुणवत्ता वाली शीतकालीन फलत को निम्नप्रकार से बढ़ाया जा सकता है- 1. वर्षाकालीन फसल को न लेकर अथवा कम करके ताकि अधिक से अधिक पादप-खादद्य भंडार मृग बहार की प्रक्रिया के लिए उपलब्ध हो सके। 2. वर्षा ऋतु में अधिक से अधिक नए प्ररोहों को निकलने के लिए प्रेरित करके, क्योंकि अमरूद में फूल नए प्ररोहों में लगते हैं । वर्षाकालीन फसल में कमी लाने के लिए अंबे बहार के फूलों तथा छोटे-छोटे फलों को गिराना आवश्यक है। यह कार्य कटाई-छंटाई द्वारा अथवा कृषि रसायनों एवं वृद्धि नियामकों, उदाहरणार्थ यूरिया (10-15%), ईथेल (1000 पी.पी.एम.). एन.ए.ए. (400-600 पी.पी.एम.) इत्यादि के छिड़काव द्वारा किया जा सकता है। मई माह में छँटाई तथा शाखा वकन (ब्रांच बैन्डिंग) करने से वर्षा ऋतु में नए प्ररोह अधिक संख्या में निकलते हैं जिससे मृग बहार में इजाफा होता है शाखा-वंकन का सिद्धांत :- शाखाओं के अग्र / शीर्ष भाग पर बनने वाले पादप हॉर्मोन ऑक्सिन का संचरण पौधे में नीचे की तरफ होता है। ऑक्सिन का पार्श्व कलिकाओं पर निरोधात्मक प्रभाव शीर्ष प्रभुत्व (एपिकल डोमिनेंस) कहलाता है। ऊपर की ओर बढ़ने वाली सीधी शाखाओं पर यह प्रभाव काफी प्रबल रहता है। ऐसी शाखाओं को नीचे की ओर झुकाने पर यह प्रभाव कम हो जाता है, जिससे शाखा के निचले हिस्से में पायी जाने वाली निष्क्रिय पार्श्व कलिकाएं सक्रिय हो जाती हैं तथा अधिक संख्या में नए प्ररोह निकलने लगते है। शाखाओं को झुकाने से उनमें खिंचाव उत्पन्न होता है, जिसके कारण उनमें निकलने वाले नए प्ररोहों से अन्य पादप हिस्सों में होने वाला, प्रकाश संश्लेषित उत्पाद / खाद्य - स्थानांतरण अवरोधित हो जाता है अर्थात कम हो जाता है । फलस्वरूप प्ररोहों में कार्बनः नत्रजन का अनुपात बढ़ जाता है । बढ़ा हुआ कार्बनः नत्रजन का अनुपात फूल तथा फल लगने की प्रकिया को बढ़ाता है । इसके अतिरिक्त शाखा- वंकन की प्रक्रिया के दौरान शाखा को झुकाने, पतली एवं छोटी शाखाओं तथा पत्तियों को निकाल देने के कारण अमरूद वृक्ष आघात / तनाव की स्थिति में आ जाता है तथा प्रोलीन नामक एमिनो एसिड बनाने लगता है, जो फूल लगने की प्रक्रिया को प्रेरित करता है । शाखा-वंकन की पद्धति :- शाखा-वंकन, बहार नियंत्रण का एक बहुत ही सरल एवं आसान तरीका है, जिसे पंरपरागत पद्धति से 5 मी. x 5 मी. या अधिक की दूरी पर लगाये गये अमरूद के बाग में अपनाया जा सकता है । सघन बागवानी में इसको अपनाना संभव नहीं है, क्योंकि शाखाओं को झुकाने में अधिक जगह चाहिए । इसके अतिरिक्त शाखा - वंकन से वृक्ष की प्रवृत्ति फैलने वाली हो जाती है। यह तकनीक 2 से 8 वर्ष की आयु वाले बागों में आसानी से अपनायी जा सकती है। अधिक आयु वाले बागों में यह व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि वृक्ष की आयु बढ़ने के साथ उसकी शाखाओं का लचीलापन कम होने लगता है, जिसके कारण शाखाओं को झुकाने से उनके टूटने की संभावना अधिक हो जाती है। शाखा- वंकन करने का तरीका बिन्दुवार नीचे दिया जा रहा है:- 1. शाखा के अग्र भाग पर 10-12 जोड़ी पत्तियों को छोड़कर अन्य सभी छोटी एवं पतली शाखाओं, पत्तियों, फूलों तथा फलों को शाखा से अलग कर दें । 2. शाखा को जमीन की ओर झुकाएं। इसके लिये दबाव शाखा के निचले हिस्से से शुरू करते हुए धीरे-धीरे ऊपरी हिस्से की ओर जाएं । तत्पश्चात शाखा के अग्र भाग को जमीन में लगी खूटियों से सुतली या रस्सी की मदद से बाँध दें । 3. शाखा - वंकन के 15-20 दिन बाद शाखाओं में नए प्ररोहों का निकलना शुरू हो जाता है तथा यह प्रक्रिया करीब 20-25 दिन तक चलती रहती है । जब जए प्ररोहों का निकलना बंद हो जाए अर्थात शाखा वंकन के 40-45 दिन बाद, इन झुकी शाखाओं के बंधन काट दें। ऐसा करने से शाखाएं अपने मूल स्थान में आ जायेंगी । शाखा - वंकन करने का समय:- अमरूद की फसल, शाखा - वंकन करने के करीबन साढ़े छह से सात महीने बाद तुड़ाई की अवस्था में आ जाती है । इसलिए शीतकालीन फसल पाने के लिये इस तकनीक का प्रयोग मई में करना चाहिए । जय हिन्द नर्सरी

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