अंतर कैलाश मानसरोवर स्तुति Female Voice | शीश में कैलाश, हृदय में मानसरोवर | Shiv Stuti 🎵
#shivbhajan #ShivStuti #kailashmansarovar 01. शुष्कचित्तभूमिषु प्रसन्नभावसागरम्, हृदयस्थमानसे विलोल प्रेमसरोवरम्। शिरोऽचलस्थ कैलासशांतध्यानगोचरम्, भजे भजे शिवात्मकं मनोहरं निरंतरम्॥ अर्थ: सूखे हुए मन की भूमि में जब प्रसन्नता का सागर भर जाता है, तब हृदय में प्रेम का मानसरोवर प्रकट होता है। सिर के सबसे ऊंचे स्थान पर अचल कैलाश जैसा शांत ध्यान स्थित है। मैं उस शिवमय सुंदर चेतना को बार-बार प्रणाम करता हूँ। 02. प्रशांतशीर्षकैलसं निरीहभावमंदिरम्, करुणामयान्तरोदयं विमलप्रेमसागरम्। विचारधूलिनाशकं विकारतापहारकम्, भजे हृदि शिवालयं परं सुखप्रदायकम्॥ अर्थ: शांत सिर ही कैलाश है, निष्काम भाव ही मंदिर है। भीतर करुणा का उदय होता है और निर्मल प्रेम का सागर भर जाता है। यह विचारों की धूल को मिटाता है और विकारों की गर्मी को शांत करता है। मैं हृदय के उस शिवालय को प्रणाम करता हूँ, जो परम सुख देने वाला है। 03. श्वसच्छ्वसन्मुखे सदा प्रणादनादगुंजनम्, ओमित्यनाहतं महत् प्रवाहितं निरंजनम्। प्राणवायुचालितं शरीरतीर्थपावनम्, भजे शिवं स्वदेहगे प्रकाशरूपभावनम्॥ अर्थ: हर आती-जाती श्वास में प्राण का नाद गूंजता है। उसमें “ॐ” जैसा अनाहत, महान और पवित्र स्वर प्रवाहित होता है। प्राण-वायु से चलने वाला यह शरीर एक तीर्थ बन जाता है। मैं अपने ही शरीर में स्थित प्रकाशस्वरूप शिव का ध्यान करता हूँ। 04. तनुर्ममास्ति मंदिरं मनो मदीयदीपकम्, प्राण एष पुजारीव प्रेमपुष्पहारकम्। हृदम्बुधौ निमज्जितं समस्तदुःखनाशकम्, भजे शिवं कृपानिधिं चिदानंदप्रकाशकम्॥ अर्थ: मेरा तन मंदिर है, मेरा मन दीपक है, प्राण पुजारी की तरह हैं और प्रेम पूजा के फूलों जैसा है। जब यह सब हृदय-सरोवर में डूबता है, तो सारे दुख मिट जाते हैं। मैं कृपा के भंडार, चिदानंद रूप शिव को प्रणाम करता हूँ। 05. यदा शिरः कैलासवत् स्थिरं निरंतरं भवेत्, यदा हृदं सरोवरं दयामृतैः पूर्यते। तदा मनो मलक्षयं, तदा विकारभंजनम्, तदा स्वयं प्रकाशितं शिवं भजे निरंजनम्॥ अर्थ: जब सिर कैलाश की तरह स्थिर हो जाता है और हृदय दया के अमृत से भरकर सरोवर बन जाता है, तब मन का मैल मिटता है और विकार नष्ट होते हैं। तब भीतर स्वयं शिव का प्रकाश प्रकट होता है। 06. जो पर्वत-सा मौन हो, वही शिवधाम पाता है, जो जल-सा निर्मल बने, वही प्रकाश गाता है। जिसने भीतर झांककर स्वयं को जान लिया, उसने अपने देह में कैलाश पहचान लिया॥ अर्थ: जो पर्वत की तरह मौन और स्थिर हो जाता है, वही शिवधाम को प्राप्त करता है। जो जल की तरह निर्मल बनता है, वही प्रकाश का अनुभव करता है। जिसने अपने भीतर झांककर स्वयं को जान लिया, उसने अपने शरीर में ही कैलाश को पहचान लिया। 07. श्वास-श्वास में ॐ बहे, धड़कन-धड़कन नाम, तन मंदिर, मन दीप है, भीतर चारों धाम। शीश कैलाश अचल रहे, हृदय रहे नीर, मानसरोवर जागते मिट जाए भव-पीर॥ अर्थ: हर श्वास में ॐ बहे और हर धड़कन में शिव-नाम हो। तन मंदिर है, मन दीपक है और भीतर ही चारों धाम हैं। यदि सिर कैलाश की तरह अचल रहे और हृदय जल की तरह निर्मल रहे, तो भीतर मानसरोवर जागता है और संसार का दुख मिट जाता है। 08. विकारदाहहारिणं विचारधूलिनाशनम्, प्रसन्नभाववर्धनं करुणाप्रेमपोषणम्। शरीरमंदिरस्थितं समाधिशांतिदायकम्, भजे शिवं भजे शिवं भजे शिवं निरामयम्॥ अर्थ: जो विकारों की जलन को दूर करता है, विचारों की धूल मिटाता है, प्रसन्नता को बढ़ाता है और करुणा-प्रेम को पोषित करता है; जो शरीर-रूपी मंदिर में स्थित होकर समाधि की शांति देता है, मैं उस निरोग, पावन शिव को प्रणाम करता हूँ। 09. सूखे पड़े इस मन को जब मिल जाए सरोवर, भीतर ही बन जाएगा पावन मानसरोवर। शीश बने कैलाश जब, हृदय बने प्रेम-जल, मानव-देह में जागे तब शिव का सच्चा स्थल॥ अर्थ: जब सूखे हुए मन को प्रेम और करुणा का सरोवर मिल जाता है, तब भीतर ही पवित्र मानसरोवर बन जाता है। जब सिर कैलाश जैसा स्थिर हो और हृदय प्रेम से भर जाए, तब मानव-देह में शिव का सच्चा स्थान जागता है। 10. ओंकारश्वाससंभवं महाध्यानप्रकाशकम्, करुणासरोवरस्थितं भवदुःखविनाशकम्। कैलासमस्तके स्थितं हृदन्तरे महेश्वरम्, भजे भजे शिवात्मकं मनोहरं निरंतरम्॥ अर्थ: श्वासों में उत्पन्न ओंकार महान ध्यान का प्रकाश करता है। करुणा के सरोवर में स्थित वह भाव संसार के दुखों को मिटाता है। मस्तक में कैलाश और हृदय में महेश्वर विराजमान हैं। मैं उस शिवमय सुंदर चेतना को निरंतर प्रणाम करता हूँ। 11. जयत्वचेतनाचलं जयत्वहृद्सरोवरम्, जयत्वश्वासगुंजनं जयत्वशिवमंदिरम्। जयत्वमानवाकृतौ महेशभावदर्शनम्, जयत्व अंतरात्मनि प्रबुद्ध शिवचिंतनम्॥ अर्थ: चेतना के अचल पर्वत की जय हो। हृदय के सरोवर की जय हो। श्वासों के गुंजन की जय हो। शिव-मंदिर रूप शरीर की जय हो। मानव-आकृति में महेश्वर-भाव के दर्शन की जय हो। अंतरात्मा में जागे हुए शिवचिंतन की जय हो। 12. इमं हि भावमंगलं पठेन्नरो निरंतरम्, स्मरेत् शिवं स्वदेहगे हृदिस्थमानसागरे। विमुक्तदुःखदुर्मतिः प्रसन्नचित्तनिर्मलः, लभेत् स शंभुभक्तिमान् परं सुखं निरामयम्॥ अर्थ: जो मनुष्य इस मंगलमय भाव को निरंतर पढ़ता, स्मरण करता और अपने शरीर में स्थित शिव का ध्यान करता है, जो हृदय के मानस-सागर में शिव को देखता है, वह दुख और दूषित बुद्धि से मुक्त होकर प्रसन्न, निर्मल और शांत हो जाता है। वह शंभु की भक्ति और परम सुख को प्राप्त करता है। #अंतरकैलाशमानसरोवर #ShivStuti #KailashMansarovar #HarHarMahadev #OmNamahShivaya #ShivBhajan #ShivMantra #HindiDevotional #MeditationMusic #spiritualvideo

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