क्या 1950 और 1956 के बीच जोगेंद्रनाथ और बाबासाहेब अंबेडकर के बीच कोई संपर्क या संबंध था?

क्या 1950 और 1956 के बीच जोगेंद्रनाथ और बाबासाहेब अंबेडकर के बीच कोई संपर्क या संबंध था? इतिहास क्या कहता है? Was there any contact or relationship between Jogendranath and Babasaheb Ambedkar between 1950 and 1956? What does history say? सबसे पहले यह याद रखना आवश्यक है कि उस समय दोनों में से कोई भी किसी सरकारी पद पर आसीन नहीं थे। इसलिए उनके पारस्परिक संपर्कों से संबंधित सरकारी अभिलेख या प्रशासनिक दस्तावेज़ स्वाभाविक रूप से बहुत कम उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त जीवन के उस दौर में दोनों ही व्यक्तिगत, राजनीतिक और संगठनात्मक अनेक चुनौतियों से गुजर रहे थे। इसलिए केवल लिखित संपर्कों की कमी के आधार पर उनके संबंधों अथवा आपसी सम्मान पर प्रश्न उठाना इतिहास के प्रति न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। भारत के शोषित, वंचित और समाज के हाशिये पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों की स्थापना के इतिहास में जोगेन्द्रनाथ मंडल और डॉ. आंबेडकर का नाम अविभाज्य रूप से जुड़ा हुआ है। जीवनभर संघर्ष करते हुए उन्होंने अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा समाज के सभी पिछड़े वर्गों के संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के आंदोलन का नेतृत्व किया। साथ ही महिलाओं के सामाजिक और संवैधानिक अधिकारों की स्थापना में भी उनका योगदान इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में दर्ज है। किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण रूप से आज उनके महान योगदान को चर्चा का केंद्र बनाने के बजाय यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि जीवन के अंतिम समय में वे नियमित रूप से संपर्क में क्यों नहीं रहे। अनेक लोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि जानबूझकर इस प्रश्न को आगे लाकर इन दोनों महापुरुषों के ऐतिहासिक योगदान को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि इतिहास का मूल्यांकन उनके कार्यों, संघर्षों और उपलब्धियों के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी एक पृथक घटना के आधार पर। इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण जानकारी सदानंद विश्वास द्वारा लिखित पुस्तक ‘महाप्राण जोगेन्द्रनाथ, बंग-भंग और अन्य प्रसंग’ के पृष्ठ संख्या 6 और 7 में मिलती है। पिछली शताब्दी के पचास के दशक के मध्य में प्रसिद्ध समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने देश के शोषित और उपेक्षित लोगों की मुक्ति तथा उनके राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकारों की स्थापना के उद्देश्य से एक व्यापक एकता स्थापित करने की पहल की। इस विषय पर उन्होंने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के साथ पत्राचार द्वारा चर्चा प्रारंभ की तथा इस पहल के संबंध में जोगेन्द्रनाथ मंडल को भी अवगत कराया गया। डॉ. लोहिया का सपना था कि देश के विभिन्न भागों में वंचित लोगों के हित में कार्य करने वाले संगठनों और राजनीतिक शक्तियों को डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में एक संयुक्त मंच पर लाया जाए। इसी उद्देश्य को लेकर वर्ष 1956 के अंत में बिहार के पटना में एक तैयारी बैठक का आयोजन किया गया। महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल उसमें उपस्थित थे और उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। किन्तु शारीरिक अस्वस्थता के कारण डॉ. आंबेडकर उस बैठक में उपस्थित नहीं हो सके। परिणामस्वरूप उस सभा की अध्यक्षता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने की। इससे पहले भी कई बार प्रयास करने के बावजूद जोगेन्द्रनाथ मंडल डॉ. आंबेडकर से प्रत्यक्ष भेंट नहीं कर सके। बाबासाहेब के व्यस्त कार्यक्रम और अस्वस्थ स्वास्थ्य के कारण यह अवसर बार-बार टलता रहा। इसलिए उन्हें आशा थी कि पटना के इस सम्मेलन में दोनों के बीच विस्तृत चर्चा होगी और भविष्य की कार्ययोजना के लिए उन्हें आवश्यक मार्गदर्शन प्राप्त होगा। उल्लेखनीय है कि देश विभाजन के बाद अनुसूचित फेडरेशन का केंद्रीय कार्यालय तथा संगठनात्मक संसाधन ढाका स्थानांतरित हो गए थे। संगठन के अधिकांश समर्थक पूर्वी पाकिस्तान के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में रह जाने के कारण स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल में फेडरेशन की गतिविधियाँ लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुँच गई थीं। ऐसी जटिल परिस्थितियों में संगठन के पुनर्गठन और भविष्य की योजनाओं को लेकर डॉ. आंबेडकर के साथ विचार-विमर्श करना जोगेन्द्रनाथ मंडल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। किन्तु नियति को कुछ और ही स्वीकार था। अचानक डॉ. आंबेडकर की स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ गई और लंबे समय से अपेक्षित वह चर्चा संभव नहीं हो सकी। पटना के कार्यक्रम को संक्षिप्त करके जोगेन्द्रनाथ मंडल अपने प्रिय नेता और आजीवन संघर्ष के साथी से मिलने के लिए शीघ्र ही दिल्ली पहुँचे। दिल्ली पहुँचकर जब उन्होंने डॉ. आंबेडकर की शारीरिक स्थिति देखी तो वे अत्यंत दुःखी हो गए। उन्होंने महसूस कर लिया था कि अब समय बहुत कम बचा है। और वास्तव में कुछ ही दिनों बाद 6 दिसंबर 1956 की रात्रि में निद्रा अवस्था में भारत के शोषित और वंचित लोगों की मुक्ति के महानायक बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस संसार को सदैव के लिए अलविदा कह दिया। इस समाचार से महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल गहरे शोक में डूब गए। कई दिनों तक उनकी रातें जागते हुए बीतीं। कोलकाता के 64 नंबर सुल्तान आलम रोड स्थित उनके निवास पर उनके अनुयायियों ने उनकी अध्यक्षता में एक शोकसभा आयोजित की। किन्तु उस सभा में शोकाकुल जोगेन्द्रनाथ मंडल एक शब्द भी नहीं बोल सके। उनका गला भर आया था। अपने प्रिय नेता, संघर्ष के सहयात्री और शोषित समाज की मुक्ति के एक महान वृक्ष को खोने का दुःख व्यक्त करने की शक्ति उनमें नहीं थी। अतः उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों से स्पष्ट होता है कि अंतिम जीवनकाल में दोनों के बीच संपर्क पूरी तरह समाप्त हो गया था—ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। बल्कि अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद जोगेन्द्रनाथ मंडल डॉ. आंबेडकर से संपर्क और परामर्श करने का प्रयास करते रहे। उनके संबंधों का वास्तविक मूल्यांकन करने के लिए किसी सीमित विवाद पर नहीं, बल्कि शोषित एवं वंचित लोगों के अधिकारों की स्थापना हेतु उनके आजीवन संघर्ष और संयुक्त ऐतिहासिक योगदान पर ध्यान देना अधिक आवश्यक है।

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