मीरा और राणा का संवाद

मीरा और राणा का संवाद (राणा) मीरा सुन ले मेरी बात, क्यों करती साधुओं का साथ? राजमहल की रानी होकर, क्यों छोड़ दिया कुल का मान? (मीरा) राणा जी मैं सत्य कहूँ, गुरु चरणों में सुख मैं लहूँ। जग का वैभव झूठा सारा, सतगुरु नाम है सच्चा सहारा। (राणा) राजपाट सब तेरे आगे, सोना-चाँदी, हीरे-मोती। फिर भी तुझको चैन न आया, क्या है साधु की ऐसी ज्योति? (मीरा) गुरु रविदास मिले जब मुझको, खुल गए अंतर के द्वार। ज्ञान भक्ति का दीप जलाया, पार किया भवसागर पार। (राणा) कौन रविदास जिसे तू माने? जिसकी महिमा गाती जाए। राजवंश से बढ़कर क्या है? क्यों उसका गुणगान सुनाए? (मीरा) राणा तुम क्या जानो महिमा, मेरे गुरु हैं जग उजियारा। जात-पात का भेद मिटाकर, सबको दिया प्रेम का धारा। (कोरस) जय-जय गुरु रविदास पुकारे, मीरा प्रेम दिवानी रे। गुरु चरणों की धूल लगाकर, पाई अमर कहानी रे। (राणा) विष का प्याला भेजा मैंने, फिर भी तेरा कुछ न बिगड़ा। साँप भेजे, संकट भेजे, हर बार मेरा अभिमान ही हारा। (मीरा) गुरु कृपा की ढाल मिली है, कैसे कोई हानि करे। जिस पर रविदास की कृपा हो, उसका कौन अहित करे। (अंतरा) मीरा बोले सुनो रे जग में, गुरु बिना ना पार उतारा। सतगुरु रविदास कृपा से, मिला मुझे गिरधर प्यारा। (समापन) राणा का अभिमान झुका फिर, सत्य की महिमा पहचान। मीरा गावे गुरु रविदासा, सदा रहे उनका गुणगान।।