द्रव्यसंग्रह # 08, 09 | जीव की कर्तृत्व | मुनि श्री प्रणम्य सागर जी
मुनि श्री प्रणम्य सागर जी द्वारा द्रव्यसंग्रह , की वाचना गाथा नंबर # 08, 09 8 जीव की कर्तृत्व पोंग्गलकम्मादीणं कत्ता ववहारदो दु णिच्छयदो । चेदणकम्माणादा सुद्धणया सुद्धभावाणं ॥ 8 ॥ गाथा भावार्थ - आत्मा व्यवहारनय से पुद्गल कर्म ( ज्ञानावरणादि कर्मों ) का कर्ता है , ( अशुद्ध ) निश्चयनय से चेतन कर्म ( रागादि ) का कर्ता है और शुद्धनिश्चयनय से शुद्ध भावों का कर्ता है । 8 . From the empirical point of view ( uyavahāra naya ) , the soul is said to be the producer of karmic matter ( like knowledge obscuring karma ) ; from the impure transcendental point of views ( asuddha niscaya naya ) , the soul is responsible for its psychic dispositions ( like attachment and aversion ) ; but from the pure transcendental point of view ( suddha niscaya naya ) , the soul is | consciousness - pure perception and knowledge . 9 जीव का भोक्तृत्त्व ववहारा सुहदुक्खं पुग्गलकम्मप्फलं पभुंजेदि । आदा णिच्छयणयदो चेदणभावं खु आदस्स ॥ 9 ॥ गाथा भावार्थ - आत्मा व्यवहारनय से सुख - दु:ख रूप पुद्गल कर्मों के फल को भोगता है और निश्चयनय से आत्मा चेतन स्वभाव ( शुद्ध ज्ञान व दर्शन ) को भोगता है । 9 . From the empirical point of view ( vyavahāra naya ) , the soul is said to be the enjoyer of the fruits of karmas in the form of pleasure and pain , but from the transcendental point of view ( niscaya naya ) , the soul experiences only consciousness ( cetana ) , concomitant with perception ( darsana ) and knowledge ( jnana ) . Date : 2019-10-20 Gatha : 08-09 Granth : Dravyasangreh Pravachan : Muni Shri Pranamya Sagar Ji

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