स्नानयात्रा-ज्येष्ठाभिषेकः (सुवर्णघर्मानुवाक्+पुरुषसूक्तम्)स्वर-गो.प्रशान्तकुमार(बृहन्मन्दिर-मुम्बई)
पुष्टिमार्गीय सेवाक्रम में चार यात्रा मनायी जाती हैं। जिसमें, ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को, ज्येष्ठा नक्षत्र में स्नान यात्रा होती है। "मङ्गला जेष्ठ जेष्ठा पूनम जेष्ठ मास जेष्ठान। पूरनमास पूर तिथि जेष्ठमास जेष्ठा में करत स्नान।।" गोपीजनों के मनोरथ को पूर्ण करने के लिए श्रीयमुनाजी ने श्रीकृष्ण को तथा गोपीजन को एकत्रित किया और ज्येष्ठमास की पूर्णिमा के दिन जलक्रीड़ा हुई। गोपीजनों ने श्रीकृष्ण को घेर लिया और अपनी अञ्जली में जल भर कर कृष्ण पर उछालने लगी। यह लीला श्रीमद्भागवत में इस प्रकार वर्णित है :--- सोऽम्भस्यलं युवतिभिः परिषिच्यमानः प्रेम्णेक्षितः प्रहसतीभिरितस्ततोऽङ्ग । वैमानिकैः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानो रेमे स्वयं स्वरतिरत्र गजेन्द्रलीलः ॥ भा.१०/३३/२४ अर्थ:--- यमुनाजल में गोपियों ने भगवान् को प्रेमभरी चितवन से देखकर, हँस-हँस कर अञ्जली में जल भर कर सब ऒर से जल छिड़क कर खूब नहलाया। विमानों पर सवार देवता पुष्पवृष्टि करके उनकी स्तुति करने लगे। इस प्रकार यमुनाजल में श्रीकृष्ण ने गजराज के समान जलविहार किया। "करत गोपाल यमुनाजल क्रीड़ा। सुर नर असुर थकित भये देखत, बिसर गयी तन-मन जिय पीड़ा।।" हम सेवाक्रम में इस उत्सव को बड़े ही हर्षोल्लास से मनाते हैं। उत्सव से पूर्व सन्ध्या, शयनभोग धर के, सुन्दर कलश में जल भर के एक पात्र में खलाते हैं। इस जल में खस एवं गुलाब का इत्र, केसर, कर्पूर, अरगजा इत्यादि सुगन्धित पदार्थ पधराते हैं। पुष्प भी पधराते हैं यथा, गुलाब, मोगरा, कदम्ब, कमल, जूही, रायवेल, तुलसी, निवारा की कली (इनमें से जो उपलब्ध हो)। जल में थोड़ा यमुनाजल, गुलाबजल आदि पधराकर, जल का अधिवासन करते हैं। इस समय इन पदों का गान होता है:--- "यमुना घट भर चली चन्द्रावल नार।" और "हों जल को गयी री सुघट नेह भर लायी, परी है चटपटी दरस की।" पूर्णिमा (जिस दिन ज्येष्ठा नक्षत्र हो) की प्रातःकाल, ब्राह्ममुहूर्त में ठाकुरजी को उपर्युक्त सभी सुगन्धित पदार्थों से युक्त जल से वेदमन्त्रों सहित (सुवर्णघर्मानुवाक्, महापुरुषविद्या, पुरुषसूक्त, राजनादि सामगान) अभिषेक कराते हैं। अत एव, इस सेवा को ज्येष्ठाभिषेक कहा जाता है। चन्दनोशीरकर्पूर कुङ्कुमागुरुवासितैः । सलिलैः स्नापयेन्मन्त्रैः नित्यदा विभवे सति ॥ स्वर्णघर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया । पौरुषेणापि सूक्तेन सामभी राजनादिभिः ॥ भा. ११-२७-३०/३१ ये वचन के अनुसार नित्य इस प्रकार से स्नान का वर्णन है किन्तु, अपने (वल्लभ) सम्प्रदाय में इस प्रकार से अभिषेक केवल सुवर्णघर्मानुवाक् और पुरुषसूक्त से एक ही दिन होता है। • स्नानयात्रा-ज्येष्ठाभिषेकः (सुवर्णघर्मानुव... गो. प्रशान्तकुमार बृहन्मन्दिर-मुम्बई Audio Link Jyeshthabhishek Sampurna - (Suvarnagharmanuvak + Purushasuktam) https://chirb.it/vCJhxC

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Glories of Srila Santana Goswami | Jewel of Gaudiya Vaishnavism

Siddhant Rahasyam (Preface) सिद्धान्तरहस्य - भूमिका पू.गो.श्रीप्रशान्तकुमारजी महाराज

ShriSarvottam Stotram (श्रीसर्वोत्तम स्तोत्रम्) recited by Goswami Prashant Kumarji (BrihanMandir)

ज्येष्ठाभिषेक: | सुवर्णधर्मानुवाक + पुरुषसूक्त | पाठ कर्ता:- प्रशांत गोस्वामी | Pushti Pragyan

VRAJMANGLA

गो.श्रीप्रशान्तकुमारजी द्वारा बड़े मन्दिर (मुम्बई) की रीत अनुसार श्री.....को खिलायवे को क्रम

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