Bhakti Series- बाबा कुंदन दास गाथा (भारतीय ज्ञान परंपरा)
“शब्द ब्रह्म स्टूडियो” सिद्ध संत बाबा कुंदनदास के जीवन, उनके तप और जनकल्याण के कुछ किस्से आपके समक्ष लेकर आया है। ये विवरण महाशय मीरसिंह यादव की बाबा पर लिखी पुस्तक, अपने बड़ों और ग्राम हाड़ाहेड़ी के आसपास प्रचलित बाबा की कहानियों और कुछ गुनीजनों से चर्चा के आधार पर प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका उद्देश्य किसी प्रकार की प्रसिद्धि पान बिल्कुल भी नहीं है। ये तो एक अदना सा प्रयास है उस भारतीय ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने का जिसने सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म का अमूल्य उपहार दिया। आने वाली पीढ़ियाँ इससे अवगत हो जाए और हम अपनी ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाए, बस इतना ही हेतु है। बाबा की कृपा के बिना ये काम असंभव था, अतः उनका ध्यान करके आइए सुनते हैं उनके जन्म से जुड़ा ये किस्सा और उसी पर तइया एक भजन। भारतीय उपमहाद्वीप में अनेक सिद्ध साधु हुए हैं। इनका मूल उद्देश्य केवल चमत्कार या अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के एकत्व का अनुभव है। गोरखनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, कबीर, रविदास, तुलसीदास और सूरदास जैसे महान आत्माओं ने अपने ज्ञान, साधना और भक्ति से समाज को नई दिशा प्रदान की। यह परंपरा त्याग, सेवा, करुणा, सत्य, अहिंसा और आत्मसंयम जैसे जीवन मूल्यों पर आधारित है। भारत की तपोभूमि में आज भी अनेक सिद्ध संत और साधु अपनी साधना के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना का प्रकाश प्रसारित कर रहे हैं। हमारी संस्कृति, योग, दर्शन और भक्ति की जीवंत धारा के रूप में सिद्ध साधु परंपरा मानवता को आत्मोन्नति और सार्वभौमिक कल्याण का संदेश देती है। राजस्थान के मुण्डावर क्षेत्र के ग्राम सिहाली कलाँ में जो खानपुर अहीर रेलवे स्टेशन से लगभग दो किलोमीटर दूर है, उसमें ऐसे ही एक परम संत एवं गौरक्षक महात्मा श्री श्री कुंदनदास जी महाराज का जन्म लगभग 1880–85 के बीच श्री रुग्घासिंह चौहान के घर हुआ। उनके जन्म से जुड़ा एक अद्भुत प्रसंग संत-वाणी की सत्यता का प्रमाण माना जाता है। गाँव के मंदिर में निवास करने वाले एक सिद्ध महात्मा ने ब्रह्ममुहूर्त में पहुँचे रुग्घासिंह को पाँच जौ के दाने देकर आशीर्वाद दिया कि उनके पाँच पुत्र होंगे। बाद में ज्ञात हुआ कि यह आशीर्वाद किसी अन्य सेवक के लिए था, किंतु महात्मा ने कहा कि संत का वचन कभी असत्य नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ये वरदान छल से प्राप्त किया गया है टो इस वरदान के कारण उसके पाँचों पुत्र साधु बनेंगे और घर में कोई नहीं रहेगा। समय आने पर रुग्घासिंह के पाँच पुत्र हुए और महात्मा के वचनों के अनुसार सभी एक-एक कर गृहत्याग कर संन्यासी बन गए। उनमें से बाबा कुंदनदास जी का जीवन लोककल्याण, गौ-सेवा, तप और वैराग्य के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध हुआ, जबकि उनके अन्य चार भाइयों के जीवन का विस्तृत विवरण इतिहास में उपलब्ध नहीं है। यह प्रसंग संत-वाणी की अटल सत्यता, त्याग और आध्यात्मिक जीवन की महान परंपरा का प्रेरक उदाहरण है। जय बाबा कुंदन दास की।

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