Shiva Mahimna Stotra || शिवमहिम्न स्तोत्र || Dr. Vijaya Godbole || डॉ. विजया गोडबोले
Shiv Mahimna Stotra is a powerful hymn describing the greatness of Lord Shiva, who is the destroyer of the Worlds. This Stotram was composed by a Gandharva named 'Pushpadanta'. When Puspadanta unknowingly steps on bilva-patra / bel-patra leaves (a sacred offering to Lord Shiva) in the garden of King Chitraratha, an infuriated Lord Shiva punishes Pushapadanta by taking away his divine powers. Seeking forgiveness, Pushpadanta composed the Shiv Mahimna stotra in which he elaborates on Lord Shiva’s greatness. Consequently, a pleased Lord Shiva returns his divine powers. It is said that anyone who recites this stotra with devotion will be blessed with fame, wealth, long life, and good children in this life, and will attain Kailasa after death. Composed and performed by Dr. (Mrs.) Vijaya Godbole in Dehra Dun, Uttarakhand Originally created by Pushpadanta Background score and arrangement by Mr. Sandeep Singh Graphics by Sarang Godbole, Adv. HC शिवमहिम्न स्तोत्र | भावार्थ :- ||1|| हे हर! यदि आपकी अपार महिमा का पार न पाने वालों के द्वारा की गई आपकी स्तुति अनुचित है तो ब्रह्मादि की भी वाणी आपकी महिमा के वर्णन योग्य नहीं है, अत: अपनी अपनी मति के अनुसार आपका गुणगान करने वाले किसी को भी बुरा नहीं कहना चाहिए। इसलिए मैं भी आपकी स्तुति करने का प्रयास कर रहा हूँ। ||2|| आप की महिमा वाणी और मन से परे है। वेद भी आश्चर्यचकित होकर 'नेति' 'नेति' कहते हैं, उसकी स्तुति कौन कर सकता है? उसके गुण कैसे हैं? वह कैसे समझा जा सकता है। (अर्थात् आपका वर्णन कोई नहीं कर सकता।) आपके नवीन साकार रूप में किसका मन नहीं आकृष्ट होता? किसकी वाणी आकृष्ट नहीं होती? ||3|| हे ब्रह्मस्वरूप! आप अत्यन्त माधुर्ययुक्त अमृतरूपी वेदवाणी के निर्माता हैं! क्या आपको सुरगुरु बृहस्पति की भी वाणी विस्मित कर सकती है? हे पुरमथन, मैंने तो अपनी इस वाणी को आपके गुणकथन के पुण्य से पवित्र करने के लिए बुद्धि लगाई है। ||4|| हे वर देने वाले प्रभो! सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार करने वाला, वेदों द्वारा प्रतिपाद्य, सत्त्व-रजस् तम गुणों के भेद से ब्रह्मा-विष्णु-शंकर रूप तीन शरीरों में व्याप्त जो यह आपका ऐश्वर्य है, उसका खण्डन करने के लिए कुछ कुण्ठित बुद्धि के नास्तिक लोग आपके ऐश्वर्य के विषय में मन्दबुद्धि लोगों को प्रिय लगने वाले अनुचित शब्द-प्रयोग करते रहते ||5|| वह ब्रह्मा किस इच्छा के वशीभूत होकर किस शरीर से, किस विधि से, किस आधार में अधिष्ठित होकर व किस समवायिकारण से तीनों लोकों की उत्पत्ति करता है - इस प्रकार का कुतर्क कल्पनातीत ऐश्वर्य वाले आपके विषय में रहस्य न पाकर अस्थिर होते हुए भी संसार को भ्रम में डालने के लिए कुछ बुद्धिहीन लोगों को वाचाल बनाता है। ||6|| हे देवों में श्रेष्ठ! ये पृथ्वी आदि लोक अवयवी होने पर भी क्या जन्म-रहित हो सकते हैं? क्या सृष्टि की उत्पत्ति कर्ता के विना हो सकती है? ईश्वर से भिन्न यदि कोई मनुष्य, आदि इसका कर्ता है तो भू आदि लोगों की रचना करने के लिए उसके पास क्या सामग्री है? क्योंकि वे मन्दबुद्धि हैं इसलिए आपके विषय में संशय किया करते हैं। ||7|| वेद, सांख्यशास्त्र, योगशास्त्र, शैवशास्त्र, वैष्णवशास्त्र इत्यादि विभिन्न मार्गों में "यह (हमारा) मत श्रेष्ठ है, वह (दूसरे का) मत श्रेष्ठ नहीं" इस प्रकार की रुचियों में भेद होने से सीधे-टेढ़े, अनेक मार्गों के अनुसार चलनेवाले मनुष्यों द्वारा प्राप्त करने योग्य वैसे ही आप एक हैं जैसे नदियों द्वारा प्राप्त करने योग्य समुद्र । ||8|| हे प्रभो! बैल, खाट का पाया, फरसा, मृगचर्म, भस्म, सर्प और खप्पर यही सब आपके व्यवहारोपयोगी साधन हैं। परन्तु (आप दाता हैं, अतः) देवता लोग भिन्न-भिन्न ऋद्धियों को आपकी कृपा कटाक्ष से धारण करते हैं। (आप स्वयं उपभोग नहीं करते) क्योंकि आत्मा में रमण करने वाले को सांसारिक विषयों की मृगतृष्णा भ्रम में नहीं डाल सकती। ||9|| हे त्रिपुरासुर का विनाश करने वाले! कोई इस सम्पूर्ण जगत् को नित्य बताता है, अन्य कोई इसे अनित्य बताता है, तथा अन्य कोई जगत् में नित्य और अनित्य दोनों प्रकार के पदार्थ मानते हैं। ऐसा होने पर आश्चर्य में पड़ा हुआ सा भी आपकी स्तुति करता हुआ, मैं लज्जित नहीं हो रहा हूँ। वस्तुतः वाचालता ही ढीठ होती है। ||10|| हे कैलासवासी ! अग्निस्तम्भ के समान आपकी तेजोमयी मूर्ति का जो पार पाने के लिए ब्रह्माजी ऊपर की ओर, विष्णुजी नीचे की ओर प्रयत्नपूर्वक गये, वह पार न पा सके। बाद में भक्ति और श्रद्धा से अवनत होकर स्तुति करते हुए उन दोनों के समक्ष आप स्थिर हो गए। आपके अनुसरण से क्या फल नहीं मिलता ? ||11|| हे त्रिपुर-संहारक! अपने मस्तकरूपी कमलों की पंक्ति को आपके चरणकमलों में समर्पित करके की गई आपकी निश्चल भक्ति का यह प्रताप है कि दशग्रीव रावण ने तीनों लोकों को अनायास ही पूर्णतया निर्वैर बनाकर युद्ध के लिए खुजलाने वाली भुजाओं को धारण किया। ||12|| आपकी सेवा से प्राप्त शक्तिवाली अपनी भुजाओं से आपके निवासस्थान कैलासपर्वत पर भी हठपूर्वक पराक्रम दिखाने वाले उस रावण को आपके द्वारा अंगूठे के अग्रभाग से हल्का सा दबाये जाने पर पाताल में भी शरण नहीं मिली; क्योंकि समृद्धि प्राप्त करके दुष्ट अवश्य ही मोह में फंस जाता है।

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