भजन:प्यारे गफ़लत की नींद भगा तो सही/रचयिता:जैन दिवाकर पू.श्री चौथमलजी मसा/गायक:सुरेन्द्र मारू, इंदौर

🕉️जय गुरु जैन दिवाकर🕉️ रचनाकार : जैन दिवाकर पूज्य गुरुदेव श्री चौथमलजी म.सा. साभार: जैन सुबोध गुटका स्वर : सुरेन्द्र मारू, इंदौर +919826026001 सावधान हो। (तर्ज: स्वामी चरणों का दास बना लो मुझे) प्यारे गफलत की नींद भगा तो सही, जरा प्रभु से लोह को लगा तो सही।। टेर ।। साथ वाले चल बसे, और तूं भी अब मिजवान है। किस ऐश में भूला फिरे, तेरा किधर को ध्यान है। तेने साथ क्या लिना -बता तो सही।।1।। हुस्न तो दिन चार का, आखिर में यह ढल जायेगा। जालिम बुढापा आय के, तेरे जिस्म पै छायेगा। लेगा किसका तूं शरना- जिता तो सही।।2।। सर पर कजा यह घूमती, जिसकी तुझे खबर नहीं। बद काम में उमर गई, अब तक तुझे सबर नहीं। तेरे दिल से गरुर- हटा तो सही।।3।। नेकी करले ऐ दिला, तारीफ यहां रह जायेगा। चौथमल कहे नेकी से, आराम हर जां पायगा। मिले मोक्ष हवीस- मिटा तो सही।।4।। एक कोशिश, एक प्रयास... पूज्य गुरूदेव जैन दिवाकर जी के गीत/ग़ज़ल/भजन को गुरुभक्तों तक पहुंचाने की YouTube Channel @surendramaroo9655 पर गुरुदेव के भजनों की माला की कड़ी का यह मेरा 1️⃣0️⃣2️⃣वा गीत/ ग़ज़ल/भजन गुरुदेव के आशीर्वाद और आप सभी के स्नेह और प्यार से शीघ्र ही आगे के पायदान की और कदम..... केसाथ आपके समक्ष प्रस्तुति: Please Like Share subscribe 🙏 भावार्थ सहित पद व्याख्या प्यारे गफलत की नींद भगा तो सही, जरा प्रभु से लोह को लगा तो सही।। टेर ।। इस पंक्ति में "लोह" का अर्थ 'लौ' (लगन/प्रेम) से है। हे मानव! तू सांसारिक मोह-माया और गफलत (अज्ञानता या लापरवाही) की नींद से जाग जा। इस नश्वर संसार में व्यर्थ समय गँवाने के बजाय, अपने मन और चित्त को सच्चे प्रभु की भक्ति में लगा ले। जीवन का हर क्षण अमूल्य है, इसलिए मोह को त्याग कर प्रभु से सच्ची प्रीत जोड़नी चाहिए।"हे प्यारे! इस संसार के मोह-माया और गफलत (अज्ञान) की नींद से अब तो जाग जा। इस व्यर्थ के जीवन को छोड़कर, अपनी सच्ची लगन और प्रेम को परमात्मा (प्रभु) से लगा तो सही।"कवि मनुष्य को जगाते हुए कह रहे हैं कि यह जीवन बहुत अनमोल है, लेकिन इंसान सांसारिक सुखों, ऐशो-आराम और झूठी शान में इस कदर खोया हुआ है मानो वह गहरी नींद में हो।अज्ञानता को त्याग कर यदि कोई सच्चे मन से प्रभु की भक्ति में लीन हो जाए, तो उसका जीवन सफल हो सकता है।सांसारिक सुखों, अहंकार और अज्ञान की उस गहरी नींद से जागो, जो आपको वास्तविक सत्य और ईश्वर से दूर कर रही है। अपने मन, चित्त और प्रेम रूपी डोर (लौ) को संसार से हटाकर सच्चे प्रभु (परमात्मा) में लीन करो। साथ वाले चल बसे, और तूं भी अब मिजवान है। किस ऐश में भूला फिरे, तेरा किधर को ध्यान है। तेने साथ क्या लिना -बता तो सही।।1।। इस संसार से तुम्हारे कितने ही प्रियजन और संगी-साथी विदा हो चुके हैं।अब तुम भी उम्र के उस पड़ाव पर (मेहमान की तरह) पहुँच गए हो, जहाँ से तुम्हें भी एक दिन प्रस्थान करना है।तुम सांसारिक सुखों,ऐशो-आराम और व्यर्थ के मोह में क्यों मदहोश घूम रहे हो?तुम्हारा असल ध्यान परमात्मा और अपनी भलाई से कहीं भटक गया है? सत्य यह है कि यहाँ से कुछ साथ नहीं जाना। इसलिए सोच-समझकर बताओ कि अंत में तुम अपने साथ क्या ले जाओगे?(अर्थात, केवल अच्छे कर्म और प्रभु-भक्ति ही अंत में जीवात्मा के साथ जाते हैं)।जीवन क्षणभंगुर है, इसे व्यर्थ के प्रलोभनों में न गंवाकर सार्थक बनाएं।सभी को अंततः खाली हाथ जाना है, इसलिए सांसारिक सुखों में खोए रहने के बजाय वास्तविकता को समझना चाहिए। यह रचना हमें अच्छे कर्म करने और मृत्यु की अटल सच्चाई को स्वीकार करने की प्रेरणा देती है।जीवन की क्षणभंगुरता और बुढ़ापे की सच्चाई को दर्शाते हुए सांसारिक सुखों को त्यागने की सीख दी गई है। हुस्न तो दिन चार का, आखिर में यह ढल जायेगा। जालिम बुढापा आय के, तेरे जिस्म पै छायेगा। लेगा किसका तूं शरना-जिता तो सही।।2।। -जवानी और शारीरिक सुंदरता केवल कुछ ही दिनों (चार दिन) के लिए है।उम्र बीतने के साथ यह निश्चित रूप से समाप्त हो जाएगी।बुढ़ापा बहुत निर्मम होता है। जब यह आता है,तो शरीर के पूरे सौंदर्य और जवानी को अपने प्रभाव में ले लेता है (कमजोरी और झुर्रियां आ जाती हैं)।जब बुढ़ापा और मृत्यु आ जाएंगे, तब तू किसका सहारा लेगा? इसलिए समय रहते यानी होश में रहते हुए (जिता तो सही) उस परमपिता परमेश्वर की शरण में आ जाना चाहिए। सर पर कजा यह घूमती, जिसकी तुझे खबर नहीं। बद काम में उमर गई, अब तक तुझे सबर नहीं। तेरे दिल से गरुर- हटा तो सही।।3।। -कजा' का अर्थ होता है मौत या अंत समय।कवि कहते हैं कि मौत हमेशा सिर पर मंडरा रही है (यानी जीवन का कोई भरोसा नहीं),लेकिन इस सच्चाई से तुम बिल्कुल बेखबर और अनजान हो।तेरी पूरी जिंदगी बुरे कर्मों या पाप करने में ही बीत गई और आज भी तुम्हारी इच्छाएं खत्म नहीं हुई हैं,अभी तक तुम्हें संतोष (सबर) नहीं मिला है।अतः अभी भी समय है,अपने अहंकार (गरूर) को मन से बाहर निकाल दो, ईश्वर को याद करो और अच्छे कर्मों की ओर लौटो। नेकी करले ऐ दिला, तारीफ यहां रह जायेगा। "चौथमल" कहे नेकी से, आराम हर जां पायगा। मिले मोक्ष हवीस- मिटा तो सही।।4।। -इंसान को भलाई या अच्छे कर्म करते रहना चाहिए। दुनिया में लोग आपकी तारीफ तब तक ही करेंगे, जब तक आप उनके सामने मौजूद हैं। आपके अच्छे कर्म (नेकी) ही ऐसे होते हैं जो हमेशा याद रखे जाते हैं और यही आपके साथ जाते हैं।जब तक आप अच्छे काम करेंगे, लोग आपकी प्रशंसा करेंगे।लेकिन यह तारीफ,मान-सम्मान और शोहरत सिर्फ इसी दुनिया तक सीमित हैं। आपके जाने के बाद ये चीजें यहीं छूट जाएंगी। भलाई करके उसे भूल जाओ और बदले में किसी से भी फल या तारीफ की आशा मत रखो।यदि तुम सचमुच मोक्ष (मुक्ति) चाहते हो, तो पहले अपनी वासना,तृष्णा या इच्छाओं (हवीस) को पूरी तरह से मिटाओ।मोक्ष= जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति या ईश्वर की प्राप्ति।हवीस=(हविष/हवस): इच्छा, वासना, लालसा। मन से इन विकारों और लालच को समाप्त करो।

गीत:गौतम सुन लीजे,कहे वीर स्वयं उच्चार/रचयिता:जैन दिवाकर पू.श्री चौथमलजी मसा/गायक:सुरेन्द्र मारू
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