100 साल पहले कौन कौन बनना चाहते थे क्षत्रिय-ब्राह्मण? 1931 की जाति जनगणना का काला सच ।
The 100-Year-Old Reverse History: When Castes Fought to Become 'Upper Caste'! हमाम में नंगे हो जाएंगे आरक्षण के पुरोधा! ।विस्तार से बता रहे हैं सीनियर जर्नलिस्ट Dr. Harish C. Lakhera । डा. हरीश चंद्र लखेड़ा का विश्लेषण। Email- [email protected] । 1931 की भारतीय जनगणना का इतिहास सामाजिक बदलाव का एक ऐसा आईना है, जो आज की जातिगत राजनीति और आरक्षण आंदोलनों को गहराई से समझने का मौका देता है। आज जब हम समाचारों में देखते हैं कि कई मजबूत और प्रभावशाली जातियां आरक्षण का लाभ पाने के लिए खुद को 'पिछड़ी' या आरक्षित श्रेणियों में शामिल कराने के लिए संघर्ष कर रही हैं, तो इतिहास का यह पन्ना हमें हैरान कर देता है। ठीक 100 साल पहले भारत का सामाजिक माहौल इसके बिल्कुल उलट था। 1920 और 1930 के दशकों में ब्रिटिश सरकार द्वारा जातियों को उनकी 'सामाजिक प्राथमिकता' (Social Precedence) के आधार पर सूचीबद्ध करने की नीति के कारण देश में एक अभूतपूर्व होड़ मच गई थी। उस दौर में यादव, कुर्मी, लोध, गुर्जर और विश्वकर्मा जैसी दर्जनों जातियों ने ब्रिटिश जनगणना कमिश्नरों के सामने हजारों आवेदन और ऐतिहासिक दावे पेश किए। उनका मुख्य उद्देश्य खुद को पिछड़ा साबित करना नहीं, बल्कि सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए खुद को आधिकारिक रिकॉर्ड में 'ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य' के रूप में दर्ज कराना था। अंग्रेजों के लिए यह एक बड़ी प्रशासनिक सिरदर्दी बन गया था। हालांकि उन्होंने पहचान के तौर पर कुछ जातियों के नाम बदलने की मांग (जैसे अहीर से यादव) मान ली, लेकिन पदानुक्रम को नहीं बदला। आज वक्त का चक्र पूरी तरह घूम चुका है। 100 साल पहले जो लड़ाई 'सामाजिक प्रतिष्ठा और ऊंचे दर्जे' के लिए थी, वह आज के समय में व्यवस्था और संसाधनों के लाभ के लिए 'आरक्षित और पिछड़ा' दिखने की होड़ में बदल चुकी है। #STV #himalayilog #BreakingNews #DrHarishChandraLakhera #NewDelhi, समसामयिक मुद्दों पर केंद्रित S TV यूट्यूब न्यूज चैनल | & Himalayilog| e- Book of Himalayan Civilization | हिमालयीलोग : हिमालयी संस्कृति, लोक, साहित्य और सरोकारों का चैनल | / @himalayilog Channel of Himalayi People | FaceBook- https://www.facebook.com/profile.php?... (Facebook Page -Himalayilog channel हिमालयीलोग चैनल ) X-twitter --- / himalayilogc सोचिए आज के अधिकतर पत्रकार क्यों काकदृष्टि की बजाए काणी दृष्टि के हो गए हैं ? किसी विचारधारा के गुलाम क्यों हो गए हैं ? किसी एक पार्टी या नेता के पक्षकार क्यों हो गए हैं ? आप भी ऐसा सोचते हैं तो आइए हमसे जुड़िए। काक दृष्टि अर्थ है छोटी से छोटी बातों पर भी ध्यान देने वाली दृष्टि। उदाहरण के तौर पर हम कह देते हैं कि उसकी काकदृष्टि से कोई भी चीज नहीं छुपती। पत्रकारों से भी यही उम्मीद की जाती है। परंतु अधिकतर पत्रकार विचारधारा में बटकर एक पक्षीय हो गए हैं। काक दृष्टि की बजाए उनकी काणी दृष्टि हो गई है। मेरा चैनल ऐसा था।, न है और न कभी ऐसा होगा।

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