1319)क्षर और अक्षर पुरुष । Hindi | Arvind P Patil
🕉👏श्री सद्गुरु कृपा -(प्र १३१९ दि १/७/२६) गीता स्वाध्याय तो चलना ही चाहिए । इस भूतलपर दो ही पुरुष मौजूद है । एक क्षर और दूसरा अक्षर । गीता हमे हमारी सच्ची पहचान देती हैं । जन्म से हम शरीर ही देखते है इसलिए हमें लगता हैं , मै शरीर ही हूं । जब हमे काडसिद्धेश्वर स्वामी जैसे गुरु मिलते हैं तब वे हमे बताते हैं की, शरीर में रहनेवाला आत्मा तुम ही हो । गीता में एक श्लोक लिखा है वह हम देख लेंगे । द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एवं च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ इस संसारमे नाशवान और अविनाशी ये दो प्रकार के पुरुष हैं । इनमें संपूर्ण भूतप्राणियोके शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है । क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ याने शरीर और उसका ज्ञाता । शरीर नाशवान है, उसे यथावकाश छोड़ना ही पड़ता हैं । अक्षर याने जीवात्मा, जो परमनंट है, जो कारण देहमे रहता हैं । इसलिए भगवान अर्जुन को बताते हैं, तुम युद्ध करो । आत्मा अविनाशी है । वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवाणि गृण्हाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय । जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ कर्म करो कर्म करो यही हमारा निश्चय होना है । देवता पूजन के समय हमने देखा, निष्काम कर्म से हम वही देवताको प्राप्त होते है । मै गुरुजीके सामने प्रवचन करता था । उसी समय ज्ञानेश्वर महाराज की ओवी मैंने बताई - पुण्यात्मके पापे स्वर्गा जाईजे । पापात्मके पापे नरका जाईजे । माते पाविजे ते शुद्ध पुण्य । मेरी प्राप्ति होनेकेलिए शुद्ध कर्म करने चाहिए । गुरुजीने मुझे बताया, अभी हम संतसंगमे जे कर रहें है, वही शुद्ध कर्म है । अभी मैं ये सब कुछ कर रहा हूं, यही शुद्ध कर्म हैं । मुझे कुछ नहीं चाहिए । चाह गयी चिंता मिटी । मनुवा बेपुरवाह । जींसें कुछ नहीं चाहिए वही शहेनशाह । मैं जैसा हूँ वैसा मैं तृप्त ही हूँ । जैसे पूर्ण मदः पूर्ण मिदम् पूर्णांत पूर्ण मुदच्यते । पूर्णस्य पूर्ण मादाएं पूर्ण मेवावशिष्यते । ये पूर्णताका अनुभव हम कब कर सकते है? जब हमारी कोई इच्छा ही शेष नहीं है । हमे पंचमहायज्ञ करने ही चाहिए । जय काडसिद्ध । जय काडसिद्ध ॥

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