चेतना सदैव विद्यमान है, इसे कैसे समझें ? | YUGPURUSH | चेतना को क्यों नहीं देखा जा सकता?

।। Param Pujya Yug-Purush Swami Parmanand Giri Ji Maharaj Official YouTube Channel ।। परम् पूज्य गुरुदेव भगवान से संबंधित किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए आप हमसे नीचे दिए हुए संपर्क सूत्रों पर संपर्क करें। +91 8126814006 +91 9027585425 परम् पूज्य सदगुरुदेव की अमृतमयी वाणी को विस्तार से सुनने के लिए आप हमारे Akhand Param Dham... YOU TUBE CHANNEL को SUBSCRIBE कर के BELL ICON को जरूर दबा लें।    / @akhandparamdham7011   कृपया इस प्रवचन को अधिक से अधिक शेयर करें और लाइक करें। 〰️✴️〰️✴️〰️✴️〰️✴️〰️✴️〰️✴️〰️ 🔹 1. चेतना क्या है? चेतना वह है जिससे हम देखते, सुनते, सोचते, अनुभव करते हैं। यह शरीर, मन और बुद्धि से परे एक गहराई में स्थित साक्षी सत्ता है। उदाहरण: जब आप सपना देख रहे होते हैं, तब शरीर सो रहा होता है — लेकिन सपना देखने वाला ‘कोई’ तो जाग रहा होता है। वही ‘कोई’ चेतना है। 🔹 2. "सदैव विद्यमान" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है — चेतना कभी भी उत्पन्न नहीं होती, और कभी नष्ट भी नहीं होती। यह हर अनुभव में उपस्थित रहती है, चाहे वह जाग्रत हो, स्वप्न हो या सुषुप्ति (गहरी नींद) हो। उपनिषद् कहते हैं — "न जायते म्रियते वा कदाचित् — यह चेतना न जन्म लेती है, न मरती है।" 🔹 3. इसे कैसे अनुभव करें? जब आप शांत होकर बैठते हैं, और शरीर व मन से दूरी बनाते हैं — तो आपको एक 'साक्षी भाव' का अनुभव होता है। यह वही चेतना है जो मन के विचारों को देखती है, भावनाओं को देखती है, लेकिन उनसे अछूती रहती है। 🔹 4. चेतना शरीर नहीं है, फिर भी शरीर में प्रकट होती है जैसे बिजली हर बल्ब में अलग-अलग रोशनी के रूप में दिखती है, पर स्वयं एक ही होती है, वैसे ही चेतना हर जीव में भिन्न-भिन्न व्यक्तित्व के रूप में दिखती है, लेकिन मूल चेतना एक ही है। 🔹 5. चेतना को क्यों नहीं देखा जा सकता? क्योंकि चेतना स्वयं देखनेवाली है — जो देखता है, उसे कोई देख नहीं सकता। यह ऐसे ही है जैसे आँख सब कुछ देख सकती है, पर खुद को देखने के लिए दर्पण चाहिए। चेतना कोई वस्तु नहीं है, यह आपका मूल स्वभाव है। आप उसे खोज नहीं सकते, क्योंकि आप स्वयं वही हैं। जैसे लहर समुद्र से अलग नहीं, वैसे ही हम चेतना से अलग नहीं। "तत्त्वमसि" — तू वही है।

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