Tantra Warning ⚠️ | आत्मरक्षा और दिक् बंधन: Don’t Begin Mantra-Tantra Without This | Non-Negotiable

5:36 आत्मरक्षा विधान | Atmaraksha Vidhan: The First Line of Protection 6:00 अग्नि बीज मंत्र और मोल्टन एनर्जी स्टेट | Agni Beej Mantra and the Molten Energy State 8:35 आत्मरक्षा मंत्र | The Atmaraksha Mantra Explained 10:00 रक्षा विधान: एक व्यक्तिगत अनुभव | Raksha Vidhan: A Personal Experience 11:45 मार्जन क्या है? | What is Marjan (Energetic Purification)? 12:15 अग्नि और गलित अग्नि में अंतर | Fire vs Molten Fire: Understanding the Difference 13:30 मोल्टन स्टेट को पार करना क्यों कठिन है | Why the Molten State Is Difficult to Cross 15:48 दिक् बंधन | Dik Bandhan: Securing the Directions 17:17 पीली सरसों ही क्यों? विज्ञान क्या कहता है | Why Yellow Mustard? The Science Behind It 21:00 दिक् बंधन कैसे करें | How to Perform Dik Bandhan 23:10 दस दिशाएँ, शक्ति के दस स्वरूप | Ten Directions, Ten Forms of Shakti 24:00 भगवान विष्णु के नौ रूप, महेश्वर और शेष | Nine Forms of Vishnu, Maheshwar, and Shesh 24:30 एक रोचक अवलोकन | An Interesting Observation 27:00 अनंत शेष | Anant Shesh: The Foundation Principle 28:00 देह रक्षा न्यास और क्षेत्र कीलन | Deha Raksha Nyas and Kshetra Keelan हम इन जनरल चार विधानों के बारे में बात करेंगे जिसमे से २ विधानों को डिटेल में इस वीडियो में समझेंगे और २ को अगले। ये चार विधान है - 1 - आत्म रक्षा १ - दिकबन्धन (दिशा बंधन) २ - देहरक्षान्यास (देह की रक्षा के लिए न्यास) ३ - क्षेत्रकीलन (जिस क्षेत्र में साधना-अनुष्ठान किया जा रहा है उसका कीलन - संरक्षण) Yellow mustard seeds contain allyl isothiocyanate, a highly volatile, pungent compound. From a hard-science view, this makes mustard energetically “loud” at a micro level. Anything that thrives on stagnation, fear, or dullness does not tolerate such sharp dispersion. बहुत से कवचों में आपको अंगो की रक्षा के साथ साथ दिशा बंधन के भी विधान मिलेंगे जैसे - श्री ब्रह्माणपुराण में अगस्त्य नारद संवाद में हनुमत्कवच का संदर्भ आता है - इस कवच में शरीर के अंगो और दिशाओ का बंधन ही है आनन्दरामायण में शिवपार्वति संवाद कवच का संदर्भ है उसमें अगर आप देखेंगे तो रक्षा मंत्रों की अधिकता है दोनों ही कवच श्रीराम द्वारा कहे गये है। इसी तरह राम रक्षा स्तोत्र है जो रक्षण के लिए है। श्रीदुर्गाकवच - इसमें भी भगवती के अलग अलग स्वरूप से शरीर के अलग अलग अंगों की सुरक्षा की प्रार्थना की गई है और साथ ही साथ दिशा बंधन भी है। आत्म रक्षा ====== ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणी स्वाहा ॐ आं हुं फट्‌ स्वाहा - आत्म रक्षा मंत्र दिक् बंधन ====== इसके दो विधान है - एक आपको श्रीदुर्गासप्तशती की पुस्तक में श्रीदुर्गाकवच में मिलेगा और दूसरा नित्य कर्म पूजा प्रकाश पुस्तक में दिया गया है। १ - पहला विधान (श्रीदुर्गा सप्तशती) https://archive.org/details/1281_2023... प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥ १७॥ दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खड्गधारिणी । प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद्‌ वायव्यां मृगवाहिनी ॥ १८ ॥ उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी। ऊर्ध्व ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद्‌ वैष्णवी तथा॥ १९॥ एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना। १ - पूर्व दिशा = ऐंद्री (भगवान इंद्र की शक्ति) २ - अग्निकोण = अग्नि शक्ति ३ - दक्षिण = वाराही ४ - नैऋत्य कोण = खड़गधारिणी ५ - पश्चिम = वारुणी ६ - वायव्य = मृग पर सवारी करने वाली देवी ७ - उत्तर = कौमारी ८ - ईशान = शूलधारिणी ९ - ऊपर (ऊर्ध्व) = ब्राह्मणी १०- नीचे (अनंत) = वैष्णवी देवी दसो दिशा = शव को वाहन बनाने वाली माँ चामुंडा २ - दूसरा विधान (नित्य कर्म पूजा प्रकाश) https://archive.org/details/nitya-kar... बायें हाथमें अक्षत, पीली सरसों, द्रव्य और तीन तारकी मौली लेकर दाहिने हाथ से ढककर नीचे लिखे मन्त्र से अभिमंत्रित करे - ॐ गणाधिपं नमस्कृत्य नमस्कृत्य पितामहम्‌ विष्णु रूद्रम् श्रियं देवीं वन्दे भक्त्या सरस्वतीम्‌ ॥ स्थानाधिपं नमस्कृत्य ग्रहनाथं निशाकरम्‌ । धरणीगर्भसम्भूतं शशिपुत्रं बृहस्पतिम्‌॥ दैत्याचार्य नमस्कृत्य सूर्यपुत्रं महाग्रहम्‌ । राहु केतुं नमस्कृत्य यज्ञारम्भे विशेषत: ॥ शक्राद्या देवता: सर्वाः मुनींश्चैव तपोधनान्‌ । गर्ग मुनिं नमस्कृत्य नारदं मुनिसत्तमम्‌ ॥ वसिष्ठं मुनिशार्दूलं विश्वामित्रं च गोभिलम्‌ । व्यासं मुनिं नमस्कृत्य सर्वशास्त्रविशारदम्‌ ॥ विद्याधिका ये मुनय आचार्याश्च तपोधनाः । तान्‌ सर्वान्‌ प्रणमाम्येवं यज्ञरक्षाकरान्‌ सदा अब निम्नलिखित मन्त्रों से दसों दिशाओं में अक्षत तथा पीली सरसों छोड़े - पूर्वे रक्षतु वाराह आग्येय्यां गरुडध्वजः । दक्षिणे पद्मनाभस्तु नैऋत्यां मधुसूदन: ॥ पश्चिमे पातु गोविन्दो वायव्यां तु जनार्दनः । उत्तरे श्रीपती रक्षेदैशान्यां तु महेश्वरः ॥ ऊर्ध्व गोवर्धनो रक्षेद्‌ ह्यधोऽनन्तस्तथैव च । एवं दश दिशो रक्षेद्‌ वासुदेवो जनार्दनः ॥ रक्षाहीनं तु यत्स्थानं रक्षत्वीशो महाद्रिधृक् । यदत्र संस्थितं भूतं स्थानमाश्रित्य सर्वदा ॥ स्थानं त्यक्त्वा तु तत्सर्व यत्रस्थं तत्र गच्छतु । अपक्रामन्तु ते भूता ये भूता भूमिसंस्थिताः ॥ ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया । अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशः ॥ सर्वेषामविरोधेन पूजाकर्म सपारभे ॥ १ - पूर्व दिशा = वाराह २ - अग्निकोण = गरुड़ध्वज (भगवान विष्णु) ३ - दक्षिण = पद्मनाभ ४ - नैऋत्य कोण = मधुसूदन ५ - पश्चिम = गोविंद ६ - वायव्य = जनार्दन ७ - उत्तर = श्रीपति ८ - ईशान = महेश्वर ९ - ऊपर (ऊर्ध्व) = गोवर्धनधारी १०- नीचे = अनंत (शेषनाग) =======

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