महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् | कालीपुत्र कालीचरण | Mahishasur Mardini Stotram
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् | कालीपुत्र कालीचरण | Mahishasur Mardini Stotram Producer : Advocate Shivani Choudhary, Delhi. Music - Keshav Kundal / keshavkundal Spectral Audio, Indore. Veena - Shree Phani Narayana ji Rhythm - Shree Jay Kumar Acharya Video graphy : Stories By 9 Studio & Team, Sangamner. महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् - अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते । भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥ सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥ अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते । मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥ अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशौण्ड मृगाधिपते । निजभुजदण्ड निपातितचण्ड विपाटितमुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥ अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते । दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥ अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे । दुमिदुमितामर दुन्दुभिनादमुहुर्मुखरीकृतदिंड्निकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥ अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते । शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥ धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके । कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥ सुरललनाततथेयितथेयितथाभिनयोत्तरनृत्यरते कृतकुकुथाकुकुथोदिडदाडिकतालकुतूहल गानरते । धुधुकुटधूधुटधिन्धिमितध्वनिघोरमृदङ्गनिनादरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥९॥ जय जय जाप्यजये जयशब्दपरस्तुतितत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते । नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥ अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते । सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥ महितमहाहवमल्लमतल्लिकवल्लितरल्लितभल्लिरते विरचितवल्लिकपालिकपल्लिकझिल्लिकभिल्लिकवर्गवृते । श्रुतकृतफुल्लसमुल्लसितारुणतल्लजपल्लवसल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१२॥ अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते । अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥ कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले । अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥ करमुरलीरववर्जितकूजितलज्जितकोकिलमञ्जुमते मिलितमिलिन्दमनोहरगुंजितरंजितशैलनिकुंजगते । निजगणभूतमहाशबरीगणरङ्गणसम्भृतकेलिरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१५॥ कटितटपीतदुकूलविचित्रमयूखतिरस्कृतचण्डरुचे प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥ विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते । सुरथसमाधि समानसमाधि समानसमाधि सुजाप्यरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥ पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् । तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥ कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेऽङ्गणरंगभुवं भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् । तव चरणं शरणं करवाणि सुवाणि पथं मम देहि शिवम् जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१९॥ तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते । मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमु न क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥ अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरमे । यदुचितमत्र भवत्पुरगं कुरु शाम्भवि देवि दयां कुरु मे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२१॥ स्तुतिमिमां स्तिमित: सुसमाधिना नियमतो यमतोsनुदिनं पठेत् । परमया रमया स निषेव्यते परिजनोsरिजनोsपि च तं भजम ॥२२॥ इति श्री रामकृष्ण कवि विरचितं महिषासुरमर्दिनी स्त्रोत्रम सम्पूर्णम #kaalicharanMaharaj #OmKaali #KaaliputraKaalicharanMaharaj

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