पद-रैदास Pad-Raidaas NCERT Solutions by ARVIND KUMAR
पद-रैदास Pad-Raidaas NCERT Solutions by ARVIND KUMAR रैदास के पद कवि परिचय रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ। उनका जीवन-काल 15वीं शताब्दी (सन 1388–1518)* माना जाता है। रैदास संत कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना है। रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। उनकी सरल ब्रज भाषा में लिखी भक्ति रचनाएँ आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में शामिल हैं और वे आज भी समता, प्रेम और भाईचारे का संदेश देती हैं। उनकी रचनाएँ रैदास बानी में संकलित हैं। पाठ का सार: यहाँ रैदास के दो पद लिए गए हैं। पहले पद में बताया गया है कि जैसे चंदन-पानी, दीपक-बाती, मोती-धागा और बादल-मोर का संबंध अटूट होता है, वैसे ही भक्त से उसके आराध्य अलग नहीं हो सकते। इस पद में अनन्य भक्ति और आराध्य के प्रति समर्पण का भाव प्रकट होता है। दूसरे पद में भी आराध्य से भक्त का अटूट नाता व्यक्त किया गया है। वह तीर्थ और व्रत छोड़ सकता है, पर प्रभु-चरणों की भक्ति नहीं। यह पद निष्ठा, विश्वास और अडिग भक्ति को व्यक्त करता है। कक्षा 9 की हिंदी 'गंगा' (स्पर्श भाग-1) में संत रैदास के दो प्रमुख पद शामिल हैं। यहाँ इन पदों का सरल अर्थ और भावार्थ दिया गया है: पहला पद: "प्रभु जी तुम चंदन हम पानी..." पद की पंक्तियाँ: प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी। जाकी अङ्ग-अङ्ग बास समानी॥ प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत चंद चकोरा॥ प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती। जाकी जोति बरै दिन राती॥ प्रभु जी, तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहिं मिलत सुहागा॥ प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करै रैदास॥ व्याख्या: इस पद में रैदास जी ने भक्त और भगवान के अटूट रिश्ते को अलग-अलग उदाहरणों से समझाया है: • चंदन और पानी: कवि कहते हैं कि हे प्रभु! आप चन्दन के समान हैं और मैं पानी (यानी भक्त) हूँ, जिसके संपर्क में आने से चंदन की महक मेरे अंग-अंग में समा जाती है। [1, 2, 3] • बादल और मोर: जैसे काले बादलों (प्रभु) को देखकर जंगल में मोर नाचने लगता है, वैसे ही मैं आपकी भक्ति में लीन हो जाता हूँ। जैसे चकोर पक्षी बिना पलक झपकाए हमेशा चंद्रमा को देखता रहता है, वैसे ही मैं आपको निहारता हूँ। • दीपक और बाती: आप उस दीपक के समान हैं जो हमेशा जलता है और मैं उसमें जलने वाली बाती हूँ, जो दिन-रात आपकी भक्ति की ज्योति जलाती है। • मोती और धागा: जैसे मोती को पिरोने के लिए धागे की जरूरत होती है, वैसे ही मैं आपके साथ जुड़ा हुआ हूँ। जैसे सोने में सुहागा मिलाने से उसकी चमक बढ़ जाती है, वैसे ही आपकी संगति से मेरा जीवन पवित्र हो गया है। • स्वामी और दास: अंत में रैदास जी कहते हैं कि हे प्रभु, आप मेरे स्वामी हैं और मैं आपका तुच्छ सेवक। मेरी भक्ति का भाव यही है। [1] • दूसरा पद: जो तुम तोरो राम मैं नहिं तोरौं। तुम सौं तोरि कवनि सौं जोरौं॥टेक॥ तीरथ बरत न करौ अदेसा, तुम्हारे चरन कंवल भरोसा। जहाँ जहाँ जाऊँ तुम्हारी पूजा, तुम सा देव अवर नहिं दूजा॥ मैं अपनी मन हरि सौं जोरयौ, हरि सौं जोरि सबनि सौं तोर्यौ। सब परहरि तुम्हरी ही आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा॥ हे प्रभु! तुम भले ही मुझसे प्रीति करना छोड़ दो, किंतु मैं तुमसे प्रीति करना नहीं छोडूँगा। तुमसे प्रीति तोड़कर मैं और क़िससे अपना मन जोड़ूँगा! मुझे केवल तुम्हारे चरणकमलों का ही भरोसा है, इसी कारण मुझे तीर्थ−व्रत में विश्वास नहीं है। जहाँ−जहाँ मैं जाता हूँ, वहाँ−वहाँ मैं तुम्हारी पूजा करता हूँ, तुम-सा अन्य कोई देव दूसरा नहीं है। मैंने अपना मन हरि से जोड़ लिया है और अन्य सभी देवताओं से अपना मन हटा लिया है। मन, कर्म और वचन से संत रैदास कहते हैं−हे हरि! सब पर तुम्हारी ही आशा है।

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