कहानी जगाई और माधाई के उद्धार की #trending #facts #shortfilm
शॉर्ट फिल्म: श्री चैतन्य महाप्रभु, नित्यानंद, जगाई और माधाई (हिंदी अनुवाद) नित्यानंद! नित्यानंद! कृपया जल से बाहर आइए। गंगा में मगरमच्छ हैं। कलियुग में भगवान बलराम ने श्री नित्यानंद प्रभु के रूप में अवतार लिया। वही अनंत शेष हैं, जो कारण सागर में सदैव विराजमान रहते हैं। लगभग 500 वर्ष पूर्व, नवद्वीप में अपनी लीलाओं के दौरान नित्यानंद प्रभु अनंत स्वरूप की भावावस्था में गंगा में तैर रहे थे। आज तुम्हारा अंत निश्चित है! मुझे छोड़ दो! जगाई और माधाई—ये दोनों भाई शराब के अत्यधिक आदी थे। उन्होंने संसार के लगभग हर पाप किए थे—शराब पीना, गौहत्या, मांसाहार, लूटपाट, घरों में आग लगाना, निर्दोष महिलाओं पर अत्याचार और प्रतिदिन ब्राह्मणों की हत्या करना। उनका आतंक इतना भयानक था कि कोई भी उनका विरोध करने का साहस नहीं करता था। लोग तो उनकी परछाईं पड़ जाने पर भी स्वयं को अपवित्र मानकर गंगा स्नान करते थे। मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगा। दरवाज़ा खोलो! दरवाज़ा खोलो! कैसा भयानक सपना था! क्या सचमुच कोई दरवाज़े पर है? इतनी सुबह कौन आया होगा? तुम कौन हो और मेरे घर क्यों आए हो? मैं नित्यानंद हूँ। मैं आपसे विनती करने आया हूँ कि आप कृष्ण नाम का कीर्तन करें, कृष्ण की महिमा गाएँ और सदैव उनकी भक्ति में लगे रहें। ठीक है, मैं कृष्ण का नाम जपूँगा। आपने यह कहकर मुझे अपना बना लिया। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। गाओ "गौरांग", बोलो "गौरांग"... (भजन) ये लोग कौन हैं? ये दोनों अत्यंत पापी भाई हैं—जगाई और माधाई। जन्म से ब्राह्मण हैं, लेकिन बुरी संगति के कारण राक्षसों जैसे बन गए हैं। ऐसा कोई पाप नहीं जो इन्होंने न किया हो। हरिदास! यदि ये दोनों भी हरिनाम स्वीकार कर लें, तो हमारे प्रभु का अवतार सबसे बड़े पापियों का उद्धार करने के लिए ही है। इनके उद्धार से श्री चैतन्य महाप्रभु की महिमा पूरे संसार में फैल जाएगी। आपकी करुणा-दृष्टि उन पर पड़ चुकी है। मुझे विश्वास है कि उनका उद्धार अवश्य होगा। चलो हरिदास, उन्हें प्रभु का संदेश दें। लोगों ने चेतावनी दी— उनके पास मत जाओ! वे तुम्हें मार डालेंगे। वे बहुत खतरनाक हैं। फिर भी नित्यानंद और हरिदास उनके पास गए और बोले— हे भाइयों! अपने पापमय जीवन का त्याग करो। कृष्ण का नाम लो। कृष्ण की भक्ति करो। कृष्ण ही तुम्हारे माता-पिता और जीवन हैं। माधाई बोला— जगाई! इन्हें पकड़कर मार डालो। दोनों उनके पीछे दौड़े, लेकिन भगवान की कृपा से नित्यानंद और हरिदास बच निकले। उस शाम वे प्रसन्नतापूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु के पास पहुँचे और दिनभर के प्रचार का विवरण सुनाने लगे। श्री चैतन्य महाप्रभु कौन हैं? गोलोक वृंदावन में श्रीराधा रानी जिस प्रेम और आनंद से श्रीकृष्ण की सेवा करती हैं, उसी प्रेम का अनुभव करने की इच्छा से स्वयं श्रीकृष्ण ने श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतार लिया। वे स्वयं कृष्ण हैं, किंतु श्रीराधा की स्वर्णिम आभा और भक्त-भाव धारण करके प्रकट हुए। महाप्रभु बोले— हे नित्यानंद! हे हरिदास! मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। उन्होंने दिनभर की कथा सुनाई और जगाई-माधाई के विषय में बताया। महाप्रभु क्रोधित होकर बोले— मैं उन्हें दंड दूँगा! लेकिन नित्यानंद ने विनती की— प्रभु! उन्हें दंड मत दीजिए। इस कलियुग में लगभग सभी किसी न किसी रूप में जगाई-माधाई जैसे हैं। आप तो प्रेम और भक्ति देकर पतितों का उद्धार करने आए हैं। कृपया उन्हें मुझे सौंप दीजिए। अगले दिन नित्यानंद फिर उनके पास पहुँचे। हे भाइयों! केवल एक बार सच्चे मन से कृष्ण का नाम लेने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। माधाई ने क्रोध में आकर एक टूटा हुआ घड़ा नित्यानंद प्रभु के सिर पर दे मारा। उनके सिर से रक्त बहने लगा। फिर भी नित्यानंद बोले— हे भाई! कृष्ण-विमुख जीवन जीकर तुमने स्वयं को जितना दुख दिया है, उससे अधिक मुझे तुम्हारे इस प्रहार से दुख नहीं हुआ। कृपया हरिनाम स्वीकार कर लो। जगाई ने माधाई को रोका और कहा— इतने दयालु संन्यासी को मत मारो। उसी समय श्री चैतन्य महाप्रभु वहाँ पहुँचे। मेरे प्रिय नित्यानंद को चोट पहुँचाने का साहस कैसे किया? उन्होंने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। लेकिन नित्यानंद प्रभु ने हाथ जोड़कर कहा— प्रभु! इन्हें दंड मत दीजिए। मुझे कोई कष्ट नहीं है। कृपया इन्हें क्षमा कर दीजिए। और जब माधाई मुझे फिर मारने वाला था, तब जगाई ने ही मेरी रक्षा की। महाप्रभु ने जगाई से कहा— तुमने नित्यानंद की रक्षा की है। आज से तुम्हें शुद्ध कृष्ण-भक्ति प्राप्त हो। यह कहकर उन्होंने जगाई को गले लगा लिया। उसी क्षण जगाई को प्रेम-भक्ति प्राप्त हुई और महाप्रभु ने उसे अपना चतुर्भुज विष्णु स्वरूप भी दिखाया। माधाई यह देखकर रो पड़ा। प्रभु! मैंने भी जगाई के साथ मिलकर अनेक पाप किए हैं। जिस प्रकार आपने उस पर कृपा की, कृपया मुझ पर भी कर दीजिए। मैं आपकी शरण में हूँ। महाप्रभु बोले— तुमने मेरे प्रिय नित्यानंद को चोट पहुँचाई है। उनका शरीर मुझे अपने शरीर से भी अधिक प्रिय है। इसलिए मैं तुम्हें क्षमा नहीं कर सकता। यदि नित्यानंद तुम्हें क्षमा कर दें, तभी तुम्हारा उद्धार होगा। माधाई नित्यानंद प्रभु के चरणों में गिर पड़ा। प्रभु! मुझे क्षमा कर दीजिए। नित्यानंद प्रभु ने उसे क्षमा कर गले लगा लिया। तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने माधाई को भी अपना लिया और आदेश दिया— आज के बाद कभी कोई पाप मत करना और सदैव हरिनाम का कीर्तन करना। हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे। कहानी जगाई और माधाई के उद्धार की #trending #facts #shortfilm

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