किस्सा राजा गोपीचन्द (लेखराजचौहान)गायक सत्ते फरमाणा ,06 सदा कोए ना रहा जगत में कुदरत नै खेल रचाया सै
अपणी माता जी की बात सुणकर गोपीचन्द उसे समझाता है कि माता कुदरत की माया ही ऐसी है कि इस जग में कोई भी चीज या प्राणी स्थायी नहीं है जो इस जग में आया है उसे जाणा ही पड़ता है । जिसकी उत्पत्ति हुई उसका अंत भी निश्चित है और इसी तरह हमारा शरीर भी नश्वर है । हां यह बात जरूर है कि घटनाएँ सही समय पर हों तो ज्यादा बुरा नहीं लगता । जैसे कृषक अपणी जमीन बोते हुये बीज खाद पानी इत्यादि का ध्यान रखता है और जब फसल पकने पर होती है तो उसकी रखवाली भी करता है और सही समय पर उसको पाने पर खुश होता है लेकिन वह कितनी ही कोशिश करले अगर कुदरत चाहे तो अंतिम समय पर भी उसकी करी कराई मेहनत को भी मिट्टी में मिला देती है । इसी तरह हमारी काया का भी यही हाल है । पाँच तत्व मिलकर हमारी काया बनती है लेकिन यह भी तब तक सलामत है जब तक परमेश्वर चाहता है । हम कितनी भी कोशिश करलें अगर पाँचो तत्वों में से एक भी नाराज होकर चला जाए तो हमारी काया चेतन से जड़ हो जाती है । इसलिए जब तक यह स्थिति नहीं आती हमें अपने निर्धारित कार्य करते रहने चाहिएँ। इस में ज्यादा दखल देना ठीक नहीं है । गाणा न 6 गोपीचन्द अपणी माँ को समझाता हुआ सदा कोए ना रहा जगत में कुदरत नै खेल रचाया सै इसका भेद नहीं पावै या घणी अद्भुत उसकी माया सै (टेक) जब कृषक नै हो फसल उगाणी ध्यान बीज पै धरा करै पाणी,खाद की पड़ै जरूरत फिर उसकी पूर्ति करा करै फसल देख कै नै खागड़ झोटा उसकी खूद नै चरा करै फसल बचावण खातर उसनै के बिना रूखाळी सरा करै फसल पाकज्या करै कटाई हो मन में घणा उम्हाया सै (1) भूमि और आकाश जोड़ एक छोटा पौधा लगा दिया ताप नीर की या पड़ी जरूरत फेंक हाथ से बगा दिया वायु का संचार हुआ फिर यू जड़ हो भी जगा दिया आया खाण नै काळ शिकारी डंडे मार कै भगा दिया पाँच तत्व का बण्या पुतला या नश्वर म्हारी काया सै (2) यू क्यूकर तूं मनै अमर करैगी गलत सोच तेरी माई सै फर्ज़ निम्भावण दे अपणा मनै इस में म्हारी भलाई सै किसको सोंपू राज सिंहासन मेरै ना पुत्र ना भाई सै शादी हो रही चंद्रावळ की बस बाहण एक माँ जाई सै दूर देश ढाका में उसनै अपणा परिवार बसाया सै (3) हाथ जोड़ कै कह रहा सूं माता बात मेरी तूं मान लिए सोलह राणी बारह कन्या उनका भी कर ध्यान लिए रेह रेह माटी होज्या उनकी तूं इसका भी संज्ञान लिए भला बुरा कहगी दुनिया अपणी अगत पहचान लिए यू लेखराज कितै दूर नहीं सदा तेरा कहण पुगाया सै (4)

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