श्री गुरु तेग बहादुर जी — Guru Tegh Bahadur Ji — Hind di Chadar (The Shield of India)
🙏 गुरु हरगोबिंद जी ने जब गुरुगद्दी अपने पौत्र को सौंपी, तो माता नानकी की चिंता पर उन्होंने वचन दिया — समय आने पर यह गद्दी तेग बहादुर को ही मिलेगी। माता नानकी अपने पुत्र को लेकर बकाले गाँव आ गईं, जहाँ तेग बहादुर जी एकांत में बैठकर इक्कीस-बाईस वर्षों तक गहन भजन-सिमरन और तप-साधना में लीन रहे। आठवें गुरु श्री हरि कृष्ण जी ने दिल्ली में ज्योति-जोत समाने से पहले थाली में पाँच पैसे और नारियल रखकर वचन किया — 'गुरु बाबा बकाले'। यह संकेत सुनकर सच्चे गुरु की खोज शुरू हुई, पर बकाले में तो धीरमल समेत कई ढोंगी अपनी-अपनी गद्दी लगाकर 'मैं ही गुरु हूँ' कहने लगे। उधर व्यापारी मखन शाह लुभाना का जहाज समुद्री तूफ़ान में रेत में फँस गया। डूबते जहाज से उसने हाथ जोड़कर अरदास की — 'सच्चे पातशाह, मैं आपके घर का सेवक हूँ; पार लगा दो तो पाँच सौ मोहरें भेंट करूँगा।' अंतर्यामी गुरु ने अपने भक्त की पुकार सुनकर मानो कंधा देकर जहाज पार लगा दिया। मन्नत पूरी करने मखन शाह बकाले पहुँचा, जहाँ कई गुरु गद्दी लगाए बैठे थे। उसने हर एक के आगे दो-दो मोहरें रखकर माथा टेका — पर किसी ने पाँच सौ की मन्नत न पहचानी। अंत में कोष्ठ में बैठे तेग बहादुर जी के पास पहुँचा, और जैसे ही दो मोहरें रखीं, गुरु जी हँसकर बोले — 'मखन शाह! मन्नत तो पाँच सौ की थी।' गुरु जी के यह वचन सुनते ही मखन शाह को विश्वास हो गया — यही सच्चे गुरु हैं! उसने पाँच सौ मोहरें भेंट कीं और छत पर चढ़कर कपड़ा लहराते हुए ज़ोर-ज़ोर से पुकारा — 'गुरु लाधो रे! गुरु लाधो रे!' सुनते ही श्रद्धालु संगत उमड़-उमड़कर सच्चे गुरु के दर्शन को आने लगी। धीरमल से यह आदर सहा न गया। उसके आदमियों ने संगत का चढ़ावा लूट लिया, और शीहाँ मसंद ने गुरु जी पर गोली तक चला दी — पर वह खाली गई, गुरु जी अछूते रहे। मखन शाह लूटा हुआ सब सामान वापस ले आया, किंतु करुणामय गुरु ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बीड़ के सिवा सब कुछ धीरमल को लौटा दिया। गुरु जी ने यात्राएँ आरम्भ कीं। हडियाए नगर पहुँचे तो वहाँ बुख़ार की महामारी फैली थी। गुरु जी के वचन से रोगियों को पास के जौहड़ में स्नान कराया गया और सब निरोग हो गए। यह कौतुक देख सारा नगर गुरु-चरणों में नतमस्तक हो गया; वहाँ धर्मशाला, लंगर और 'गुरुसर' सरोवर बना। मानकपुर के पास वैष्णव संत मलूक दास गुरु जी के दर्शन तो चाहते थे, पर अहंकारवश सोचते रहे — अगर ये सच्चे अंतर्यामी हैं तो स्वयं मुझे बुलाएँगे। अंतर्यामी गुरु उनका भाव जान गए और पालकी भेजकर उन्हें ससम्मान बुला लिया। दर्शन पाकर मलूक दास का सारा भ्रम और अभिमान गल गया। प्रयाग में निवास के समय माता नानकी ने गुरु जी से कहा — बेटा, तुम्हारे पिता ने वचन दिया था कि तेरे घर तलवार का धनी, प्रतापी, ईश्वर-अंश पौत्र होगा; मैं उसका मुख देखने को तरस रही हूँ। गुरु जी ने माता को आश्वासन दिया और त्रिवेणी-स्नान कर नित्य पुत्र-प्राप्ति हेतु अकाल पुरख की आराधना करने लगे। गुरु जी की आराधना अकाल पुरख के दरबार में स्वीकार हुई। हेमकुंट के महातपस्वी 'दुष्ट-दमन' को आज्ञा हुई कि वे माता गुजरी के गर्भ में जन्म लें — और वही दिव्य आत्मा आगे चलकर दशम गुरु गोबिंद राय बने। यही कथा वे स्वयं 'बचित्र नाटक' में लिखते हैं। आसाम का राजा अपनी रानी सहित गुरु जी की शरण आया और संतान न होने का दुख कहकर पुत्र का वरदान माँगा। उनकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर गुरु जी ने वरदान दिया, और राजा के माथे पर अपनी मोहर का निशान लगाकर कहा — ऐसा ही निशान तुम्हारे पुत्र के माथे पर होगा, यही गुरु-घर की कृपा का प्रमाण है। ससाराम में गुरु-घर के सेवक भाई फग्गू ने अपने मकान का दरवाज़ा इतना बड़ा बनवाया कि गुरु जी घोड़े पर सवार होकर सीधे भीतर आ सकें — उन्हें उतरना न पड़े। उसकी इस अनोखी श्रद्धा को जानकर अंतर्यामी गुरु घोड़े पर बैठे-बैठे ही उसके आँगन में जा पहुँचे, और उसे ब्रह्म-ज्ञान की दात देकर निहाल कर दिया। गाँव मूलोवाल में गुरु जी को प्यास लगी, पर वहाँ का पानी बहुत खारा था। गुरु जी ने सेवक गोंदा से कहा — 'वाहेगुरु' कहकर इसी कूएँ से जल ले आओ, यही मीठा हो जाएगा। वचन मानते ही खारे कूएँ का जल शीतल और मीठा हो गया। आज वह 'गुरु का कूआँ' कहलाता है। एक पीर ने गुरु जी से पूछा — आप वैरागी गुरु होकर भी गृहस्थ का आडम्बर क्यों रखते हैं? गुरु जी ने कहा — गृहस्थ सब धर्मों से ऊँचा है; यही पीर-फ़कीरों, ऋषि-मुनियों को जन्म देता और सबका भरण-पोषण करता है। जो ईमानदारी से कमाकर अतिथि-सेवा और पुण्य-दान करे, वही गृहस्थी परम सुख और मुक्ति पाता है। उस समय मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब एक कट्टर शासक था। उसने अपने जरनैलों को आज्ञा दे रखी थी कि हिंदुओं को किसी भी तरह मुसलमान बनाओ, और जो इनकार करे उसे क़त्ल कर दो। कश्मीर में जरनैल अफ़ग़ान खाँ के अत्याचारों से कश्मीरी पंडित भयभीत होकर अन्न-जल त्यागकर रक्षा की प्रार्थना करने लगे। तभी पंडितों को आकाशवाणी से अनुभव हुआ कि इस समय धर्म की रक्षा केवल श्री गुरु तेग बहादुर जी कर सकते हैं। पूछते-पूछते वे आनंदपुर पहुँचे और गुरु जी के चरणों में गिरकर प्रार्थना की — महाराज, हमारा धर्म संकट में है, हमें बचाइए। गुरु जी सोच में थे कि धर्म-रक्षा के लिए किसी महापुरुष का बलिदान चाहिए। तभी नौ वर्ष के बालक गोबिंद राय आ पहुँचे। गुरु जी ने कहा — बेटा, ऐसा कोई महापुरुष चाहिए जो अपना बलिदान दे सके। निडर बालक ने उत्तर दिया — पिता जी, आपसे बड़ा महापुरुष इस समय कौन है? यह बलिदान तो आप ही दे सकते हैं। पुत्र के इन वचनों से गुरु जी अत्यंत प्रसन्न हुए 📿 Source: https://anandbhaktiras.blogspot.com/2... (श्री गुरु तेग बहादुर जी) 🎵 Music: Indian Classical Fusion — Sitar & Tabla 📖 Series: Sikh Gurus 🔔 Subscribe — Spiritual Anand · रोज़ एक पौराणिक क #SikhHistory #SikhGurus #Gurbani #Sikhism #Waheguru #Punjab #GuruKahani #Khalsa #Bhakti #DevotionalStories #HindiStories #AnandBhaktiRas #SpiritualAnand

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