12.10.1981 avyakt mahavakya/"वर्त्तमान ही भविष्य का आधार"/in sindhi

🌟आप हर ब्राह्मण आत्मा नये वृक्ष के कलम हो,इसलिए हर आत्मा अमूल्य है।👉कलम में जो कमजोरी होगी,वह सारे वृक्ष में कमजोरी होगी।👉इतनी जिम्मेवारी हर एक अपनी समझते हो?👉 जब वर्सा लेने में नया,चाहे छोटा,चाहे बड़ा हरेक अपने को पूरा अधिकारी समझते हो,हम सूर्यवंशी बनेंगे।👉साथ-साथ संगमयुग की प्राप्ति के ऊपर, बाप के ऊपर अपना पूरा हक लगाते हो। 👉यही बोल बोलते हो कि पहले हम छोटों का बाप है। छोटों पर ज्यादा स्नेह है बाप का, इसीलिए हमारा ही बाबा है। पहले हमको सब अधिकार होना चाहिए। 👉जिम्मेवारी में भी छोटे बड़े सब अधिकारी हो। सब साथी हो।👉स्व-परिवर्त्तन, विश्व-परिवर्त्तन दोनों के जिम्मेवारी के ताजधारी सो विश्व के राज्य के ताज के अधिकारी होंगे। संगमयुगी ताजधारी सो भविष्य का ताजधारी। 🌟ब्राह्मण जीवन में डबल ताज है वा सिंगल ताज है? एक है पवित्रता का ताज,दूसरा है प्रैक्टिकल जीवन में पढ़ाई और सेवा का। दोनों ताज समान हैं?सम्पूर्ण हैं?👉अगर यहाँ कोई भी ताज अधूरा है,चाहे पवित्रता का,चाहे पढ़ाई वा सेवा का,तो वहाँ भी छोटे से ताज के अधिकारी वा एक ताजधारी अर्थात् प्रजा पद वाले बनना पड़ेगा।👉क्योंकि प्रजा को भी लाइट का ताज तो होगा अर्थात् पवित्र आत्मायें होंगी। लेकिन विश्वराजन् वा महाराजन् का ताज नहीं प्राप्त होगा 🌟इसी प्रकार तख्त को देखो - वर्त्तमान समय ब्राह्मण जीवन में कितना समय अकाल तख्तधारी और दिलतख्तधारी👉अकाल तख्तनशीन निरन्तर होंगे अर्थात् सदाकाल होंगे तो दिलतख्तनशीन भी सदाकाल होंगे।👉रायल फैमली ही तख्तनशीन गाई जाती है।🌟इसी रीति तिलक को चेक करो👉संगमयुग पर ही देवों के देव के सुहाग और परमात्म वा ईश्वरीय सन्तान के भाग्य का तिलक प्राप्त होता है। तो यह सुहाग और परमात्म वा ईश्वरीय सन्तान के भाग्य का तिलक प्राप्त होता है।👉यहाँ के सुहाग,भाग्य के सदा तिलकधारी सो भविष्य के सदा राज्य-तिलकधारी।👉वहाँ के हर जन्म के राज तिलक का उत्सव 👉राजा के साथ रायल फैमली का भी तिलक-दिवस मनाया जाता है। और 👉यहाँ ब्राह्मण जीवन में सदा बाप से मिलन मेले का,स्वयं की सदा चढ़ती कला का,हर प्रकार की सेवा का अर्थात् तन-मन-धन-जन सबकी सेवा का सदा उत्साह और उमंग होगा। 🌟इसी प्रकार तन-मन-धन का सम्बन्ध है।👉यहाँ आदि से अब तक और अब से अन्त तक अपने तन को कितना समय सेवा में समर्पण किया?👉मन को कितना समय याद और मंसा सेवा में लगाया? मंसा सेवा है-शुभ भावना और श्रेष्ठ कामना। इसमें भी सेवा हद की रही वा बेहद की रही? सर्व के प्रति शुभ भावना और श्रेष्ठ कामना रही वा कोई के प्रति रही, कोई के प्रति नहीं रही🌟इसी प्रकार धन,स्व प्रति लगाते हैं स्वार्थ से लगाते हैं वा नि:स्वार्थ सेवा में लगाते हैं?अमानत में खयानत तो नहीं डालते हैं?बेहद के बजाए हद में तो नहीं लगाते हैं? 👉इस चेकिंग के आधार पर वहाँ भी प्रालब्ध में परसेन्टेज के आधार पर नम्बरवार पद की प्राप्ति होती है। 👉फुल समय वाले और फुल प्रालब्ध वाले वन-वन-वन के संवत से पहला-पहला सम्पूर्ण फुल सतोप्रधान प्रकृति,फुल राज्य-भाग्य, संवत भी वन,प्रालब्ध भी वन,प्रकृति का सुख भी वन। ✨️👉संगमयुगी और सतयुगी, दोनों स्वरूप को सामने रखो।👉इसलिए ब्राह्मण जीवन के 16 रूहानी श्रृंगारों को देखो। 16 कलाओं को देखो। स्वयं ही स्वयं को देखो, जो कमी देखो वह अब भरते चलो।👉समझा-क्या करना है? स्व को दर्पण में देखो। अच्छा-🌟 ऐसे बेहद के सेवाधारी, सर्व प्रति सदा शुभचिन्तन, सदा याद और सेवा के उत्साह में रहने वाले, सदा के सुहाग और भाग्य के तिलकधारी, ऐसे वर्त्तमान के राज्य अलंकारी, श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।''🌟संगमयुग का बड़े ते बड़ा खज़ाना कौन सा है? बाप ही सबसे बड़े ते बड़ा खज़ाना है। बाप मिला तो सब कुछ मिला।👉तो ऐसी आत्मायें सम्पन्न होंगी ना!👉देवताओं के जीवन में बाप की अप्राप्ति होगी,लेकिन ब्राह्मणों के जीवन में कोई भी अप्राप्ति नहीं। तो मन का अविनाशी गीत यही बजता रहता है 👉बालक बनना अर्थात् मालिक बनना।👉मालिक तो बन गये बाकी सम्भालना कहाँ तक आता है,यह हरेक का नम्बरवार है। 🌟सदा अचल,अडोल,संकल्प वा स्वप्न में भी व्यर्थ संकल्प न आए इसको कहा जाता है अचल,अडोल महावीर। तो ऐसे हो ना? जो कुछ होता है-उसमें कल्याण भरा हुआ है। 👉जिसको अभी नहीं जानते लेकिन आगे चल करके जानते जायेंगे।👉कोई भी बात एक काल की दृष्टि से नहीं देखो, त्रिकालदर्शी हो करके देखो।👉अब यह क्यों? अब यह क्या? ऐसे नहीं, त्रिकालदर्शी होकर देखने से सदा यही संकल्प रहेगा कि जो हो रहा है उसमें कल्याण है।🌟सेवा के आधारमूर्त्त जितने मजबूत होंगे उतनी सेवा की बिल्डिंग भी मजबूत होगी।👉जो बाबा बोले वह करते चलो,फिर बाबा जाने बाबा का काम जाने। जैसे बाबा वैसे चलो तो उसमें कल्याण भरा हुआ है।👉बाबा कहे ऐसे चलो, ऐसे रहो -जी हाजर।👉तो सदा उड़ती कला में जाते रहेंगे। रूकेंगे नहीं, उड़ते रहेंगे क्योंकि हल्के हो जायेंगे ना! 🌟 हम कल्प पहले वाली कोटों में से कोई,कोई में से कोई श्रेष्ठ आत्मायें हैं👉ऐसी श्रेष्ठ आत्मायें सदा बाप शमा के पीछे परवाने बन फिदा होने वाली होंगी👉अर्थात् मर जाना- जलना ही बाप का बनना है।👉जलना अर्थात् परिवर्त्तन होना। अच्छा- 🌟सदा हर परिस्थिति में एकरस स्थिति रहे,उसका सहज साधन क्या है?👉एक शब्द बताओ। वह एक शब्द है-ट्रस्टी।👉जब गृहस्थी है तो अनेक रस हैं, मेरा-मेरा बहुत हो जाता👉ममता वाले को गृहस्थी कहेंगे,ट्रस्टी नहीं अच्छा।''🌟 सेवा के लिए जहाँ भी जाओ, अनेक खज़ाने अनेकों को मिल जाते हैं। इसलिए ड्रामा में अब तक जाने का है, तो चल रहा है, स्टाप होगा तो सेकेण्ड में हो जायेगा।👉सबके दिल को खुश करना यह भी सबसे बड़ा पुण्य है।👉आह्वान में प्रत्यक्ष होना ही पड़ता है। जड़ चित्रों का भी आह्वान करते हैं तो उसमें भी जान अनुभव होती है।👉पहले संकल्प शक्ति फिर है वाणी की शक्ति।👉इससे वायुमण्डल योगयुक्त बनता है। 🌟 जब बाप के याद की लगन की अग्नि में पड़ते हो तो परिवर्त्तन हो जाते हो👉अपनापन कुछ भी नहीं। मानव, मानव नहीं रहा फरिश्ता बन गया।

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