नर्मदा किनारे बसने वाले आदिवासी क्षेत्र की सभ्यता और संघर्ष की कहानी।—Hindi Video
नर्मदा किनारे बसने वाले आदिवासी क्षेत्र की सभ्यता और संघर्ष की कहानी।—Hindi Video नर्मदा क्षेत्र में प्रमुखतया आदिवासियों के दो वर्ग पाए जाते हैं। मालवा क्षेत्र में भील आदिवासी और महाकौशल क्षेत्र में गौड़ आदिवासी। भील शब्द 'भिल्ल' से बना है। 'भिल्ल' का एक अर्थ सूर्य भी होता है। भारत के सामाजिक जीवन में एक गौत्र परंपरा है। व्यक्ति की पहचान के लिए तीन बातें पूछी जाती है। एक उसका उपवर्ग, एक उसका खेड़ा और एक उसका गौड़ कहीं-कहीं ‘खेड़ा’ का उपयोग लोग गौत्र के रूप में करने लगे। या कहीं गौत्र प्रवर्क ऋषि का नाम अपभ्रंश हो गया। जैसे ‘शाडिल्य’ अब ‘सडियां’ हो गया और ‘वत्य’ ‘बच्छ’हो गया। यह एक आश्चर्यजनक बात है कि नर्मदा क्षेत्र में रहने वाले वनवासियों और आदिवासियों के गौत्र क्षत्रियों और ब्राह्मणों से मिलते हैं। नर्मदा क्षेत्र में प्रमुखतया आदिवासियों के दो वर्ग पाए जाते हैं। मालवा क्षेत्र में भील आदिवासी और महाकौशल क्षेत्र में गौड़ आदिवासी। भील शब्द ‘भिल्ल’ से बना है। ‘भिल्ल’ का एक अर्थ सूर्य भी होता है। यह माना जाता है कि ‘भील’ शब्द ‘भिल्ल’ से ही बना है। पुराण काल में मालवा क्षेत्र में सूर्यवंशी राजाओं का शासन था। सूर्यवंशी क्षत्रियों के गौत्र और भील आदिवासियों के गौत्र ही नहीं उनके शारीरिक गठन में भी बहुत एक रूपता है। ठीक इसी तरह महाकैलाश में चन्द्रवंशी क्षत्रियों का शासन रहा। कोरकू, आदिवासियों का तो सीधा संबंध चन्द्रवंशी ‘कुरु’ वंश है। जबकि गौड़ आदिवासियों के गौत्र चन्द्रवंशियों से बहुत मिलते हैं। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी में ‘ड़’ के स्थान पर ‘डी’ अक्षर के प्रयोग से शब्द ‘गौड़’ ही घिसकर ‘गौड’ हो गया। अन्यथा ‘गौड़’ उपनाम भारत के चतुवर्णों में मिलता है। गौड़ आदिवासियों की आंतरिक व्यवस्था में वर्ग-गत विभाजन है। इस हिसाब से गौड़ आदिवासी वर्ग का रक्त संबंध ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्णों से है। नर्मदा क्षेत्र के वनवासी या अंग्रेजों द्वारा गढ़े गए शब्द आदिवासी कोई और नहीं भारत के नगरवासियों के रक्त संबंधी हैं – इसे इसी रूप में लिया जाना चाहिए और समझना चाहिए। वनक्षेत्रों का राष्ट्रीय संघर्ष नर्मदा क्षेत्र में निवास करने वाले वनवासी या तो भारतीय ऋषियों के वंशज, ऋषियों के शिष्य-अनुयायी हैं, अथवा वानप्रस्थ राज्यों के वंशज अनुयायी है। यही कारण है कि भारत से प्रत्येक विदेशी हमलावर या शासक का तीखा प्रतिरोध वनों से हुआ। वनवासियों ने भारतीय राजाओं को पूरा संरक्षण दिया और सहयोग किया। अंग्रेजों से बहुत पहले गौडवाने की रानी दुर्गावती ने अकबर से लोहा लिया। शाहजहां के काल में मंडला का हृदय शाह मुगलों की बेटी ‘चमनी बेगम’ को भगा लाया था। अलाउद्दीन खिजली को दक्षिण जाने का रास्ता वनवासियों ने रोका और उसे 15 दिनों तक नर्मदा पार नहीं करने दी। अंग्रेजों के वक्त में टांट्या मील, या भीमा नायक द्वारा ही नहीं बल्कि सिवनी, जबलपुर, मंडला, महेश्वर, होशंगाबाद आदि प्रत्येक किनारे पर प्रतिरोध हुआ। यह प्रतिरोध अंग्रेजों के आगमन से उनकी विदाई तक के पूरे ढाई सौ सालों में मिलता है। अंग्रेज भले ही दिल्ली, मद्रास, मुम्बई या कोलकाता में महावीर के रूप में दिखते हों किन्तु वे अपनी पकड़ नर्मदा के वन क्षेत्रों में कभी नहीं बना पाए। 1957 के बाद तो बौखलाए अंग्रेजों ने नर्मदा क्षेत्र के वनों और वनक्षेत्र से सटे गांवों को आग से जलाना और सामूहिक नरसंहार शुरू कर दिया था ताकि वे वनवासियों को डरा सकें। इसका जिक्र 1858 में अंग्रेजों के नागपुर रेजीडेन्ट ने अपने पत्र में किया है। कहने का अर्थ यह है कि नर्मदा क्षेत्र में निवास करने वाले वनवासी या आदिवासी पूर्णतया राष्ट्रवादी हैं, भारतवादी हैं, भारतीय जनों से एकाकार हैं। उनके नाम, उनके गौत्र, उनके पूर्वज, उनकी आस्थाओं के केन्द्र भारत के अन्य नागरिकों से मिलते हैं। सब एक ही पूर्वजों की संतान है, इसे इसी रूप में समझा जाना चाहिए। इस राष्ट्र की एकता के लिए नर्मदा का महत्व आधारभूत है। नर्मदा का योगदान अद्वितीय है। पर्वतों से लाए गए खनिजों, लवणों और बूटियों से नर्मदा ने अपने आसपास अद्भुत वनक्षेत्र विकसित किया है। इसी वनक्षेत्र में सभ्यता ने आंख खोली है, विकास किया है। प्राणियों की विभिन्न प्रजातियों को प्रश्रय दिया है। उनके बीच एक रिश्ता बनाया है। उन सबको एकसूत्र से बांधा हुआ हैं। यह संदर्भ भारत तक सीमित नहीं है अपितु अंतर्राष्ट्रीय भी है। मंडला में मिले शंख के जीवाश्म प्रशांत महासागर के क्षेत्र से मिले जीवाश्मों से मिलते हैं। प्रौंडव कुल की प्रजाति के जो जीवाश्म नर्मदा क्षेत्र में मिले वैसे आस्ट्रेलिया में भी मिलें हाथियों के जीवाश्म अफ्रीका के प्राचीन हाथियों के जीवाश्मों से मेल खाते हैं। आज दुनियाँ एक गांव हो गई है। भारतवासी वैश्विक होना चाहते हैं। इसके प्रमाण नर्मदा वैली में मौजूद है कि भारत लाखों साल पहले भी वैश्विक था। यदि हम आज वैश्विक हैं, हजारों साल पहले वैश्विक थे तब भारत के भीतर आदिवासी और नगरवासी के बीच भेद कैसा। विदेशी सरकार ने अपने पैर मजबूत करने के लिए यह भेद बनाया था। आज देश आजाद है, हम स्वतंत्र हवा में सांस ले रहे हैं तब हमारी सोच से भी अंग्रेजी उदाहरणों संदर्भों का दबाव हटाना होगा। एक स्वतंत्र सोच की आवश्यकता है जो नर्मदा क्षेत्र के यथार्थ को सामने ला सके उसकी राष्ट्रीय एकात्मकता को सामने ला सके। ऐसे शोध के साथ-साथ नर्मदा क्षेत्र में या नर्मदा किनारे ऐसे समारोहों की भी आवश्यकता है जिनमें इस एकात्म सत्य को सामने लाने वाले प्रमाण सहित प्रबोधन हों जिससे सामाजिक एकत्रीकरण, एकीकरण, समरसता मजबूत हो सके। नर्मदा क्षेत्र में समाज की व्यवस्था एक चक्र के रूप में मिलती है। वनवासी नगरों में आते हैं और नगरवासी वनों में चले जाते हैं। यह आवागमन दो प्रकार से होता है। एक तो महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि नर्मदा के आसपास जितने नगर हैं वे सभी कभी न कभी वन क्षेत्र ही रहे हैं।
![The Himalaya - One of the Youngest Mountain Ranges on the Planet - [Hindi] - Infinity Stream](https://i.ytimg.com/vi/hHkZpxl7z_k/hqdefault.jpg?sqp=-oaymwEjCNACELwBSFryq4qpAxUIARUAAAAAGAElAADIQj0AgKJDeAE=&rs=AOn4CLBlSEuIU4p2N8LLA9rCMCZmzP65FA)
The Himalaya - One of the Youngest Mountain Ranges on the Planet - [Hindi] - Infinity Stream

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