श्री कृष्ण भाग 87 - अर्जुन सुभद्रा मिलन | अर्जुन ने बचायी सुभद्रा की जान । रामानंद सागर कृत
Ramanand Sagar's Shree Krishna Episode 86 - Paarshad Jai Vijay Ki Katha. Balaram Ki Gada Yudh Ki Shiksha. युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भगवान श्रीकृष्ण को अग्रपूजा के लिये चुना जाता है। शिशुपाल इसका विरोध करते हुए श्रीकृष्ण का अपमान करता है। श्रीकृष्ण ने अपनी बड़ी बुआ और शिशुपाल की माता श्रुतिसुभा को वचन दिया था कि वह शिशुपाल के सौ अपराधों को क्षमा करेंगे। श्रीकृष्ण उसके अपराधों को गिनते रहे और जैसे ही शिशुपाल ने एक सौ एकवीं बार श्रीकृष्ण को अपशब्द कहे, उन्होंने सुदर्शन चक्र से उसका शीश काट दिया। तभी एक विचित्र घटना हुई। शिशुपाल के मृत शरीर से भगवान विष्णु का जय नाम का पार्षद प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण उसे विमान से बैकुण्ठ धाम भेजते हैं। स्वर्ग में नारद जी जय को उसकी पूर्व कथा सुनाते हैं कि वह और उसका साथी विजय पहले भगवान विष्णु के अन्तःकक्ष के द्वारपाल थे। उन्होंने अहंकारवश ब्रह्माजी के चार पुत्रों को बैकुण्ठ के अन्दर जाने से रोका था। तब ब्रह्मकुमारों ने जय विजय को बैकुण्ठ छोड़कर तीन जन्मों तक धरती पर रहने का श्राप दिया था। धरती पर जाने से पहले जय विजय ने प्रभु श्रीहरि से प्रार्थना की थी कि तीनों जन्म में हमारी मुक्ति आपके हाथ से ही हो। दोनों का पहला जन्म हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में हुआ। अपनी शक्ति के मद में एक बार हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को अन्तरिक्ष से चुराकर समुद्र के नीचे छिपा दिया। तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया, समुद्र के अन्दर हिरण्याक्ष से युद्ध करते हुए उसका अन्त किया और पृथ्वी का उद्धार किया। भाई का वध होने से क्षुब्ध हिरण्यकश्यप ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और उनसे वरदान माँगा कि मेरी मृत्यु न नर से हो, न पशु से। न दैत्य से और न देवताओं से। न भीतर मरुँ और न बाहर। न दिन में मरुँ और न रात में। न अस्त्र से मरुँ और न शस्त्र से। न पृथ्वी पर और न आकाश में। ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया। इसके बाद धरतीवासी डर से हिरण्याकश्प की पूजा करने लगे किन्तु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान श्रीहरि की भक्ति में लीन हो गया। नाराज हिरण्यकश्यप ने अपने ही पुत्र को मारने के अनेक प्रयास किये किन्तु हर बार भगवान विष्णु ने उसकी प्राण रक्षा की। अन्त में श्रीहरि नरसिंह का रूप लेकर एक खम्भे के अन्दर से प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप को घसीट कर महल की चौखट पर ले गये और उसे अपनी जंघा पर लेटा दिया। तभी आकाशवाणी हुई कि ब्रह्मा के वरदान की रक्षा करते हुए आज तुम्हारा अन्त किया जा रहा है। नरसिंह भगवान न नर हैं, न पशु। तुम इस समय न धरती पर हो और न आकाश में। तुम भगवान नरसिंह की जंघा पर हो। तुम न घर में हो और न बाहर। बल्कि घर की चौखट पर हो। इस समय न दिन है और न रात। यह संध्याबेला है। तुम्हें न अस्त्र से मारा जा रहा है और न शस्त्र से। तुम्हें नरसिंह भगवान अपने नाखून से मार रहे हैं। भगवान नरसिंह ने हिरण्यकश्यप की छाती चीरकर उसका अन्त कर दिया। इसके पश्चात नारद जी जय को उसके दूसरे जन्म की कथा सुनाते हैं। जय विजय का दूसरा जन्म त्रेता युग में रावण और कुम्भकरण के रूप में हुआ था। उस युग में भगवान श्रीहरि ने राम अवतार लेकर तुम दोनों भाईयों का उद्धार किया। नारद जी उसे बताते हैं कि द्वापर युग में तुमने शिशुपाल के रूप में तीसरा जन्म लिया और प्रभु ने अभी वध करके मानव योनि से तुम्हारा उद्धार किया है। तुम्हारे दूसरे साथी विजय ने वक्रदन्त के रूप में जन्म लिया है। जब वह द्वारिका पर आक्रमण करेगा, प्रभु के हाथों मारा जायेगा। उधर इन्द्रप्रस्थ में शकुनि और दुर्योधन को यह स्थान किसी मायामहल की तरह लगता है। एक स्थान सूखा होने के भ्रम में दुर्योधन जलकुण्ड में गिर पड़ता है। यह दृश्य देखकर द्रौपदी उपहास में उसे अंधे का पुत्र अंधा कह देती है। दुर्योधन इस अपमान का बदला लेने की ठानता है। यज्ञ की समाप्ति पर श्रीकृष्ण अर्जुन को साथ लेकर द्वारिका वापस जाते हैं किन्तु बलराम वहाँ रुकते हैं। एक दिन दुर्योधन बलराम के मार्ग पर पुष्प बिछा कर उन्हें प्रसन्न करता है। शकुनि बलराम की तमाम चापलूसी करते हुए कहता है कि भीम इतना दम्भी हो गया है कि वह आपके होते हुए भी स्वयं को धरती का श्रेष्ठ गदाधारी कहता है। बलराम कहते हैं कि श्रेष्ठ गदाधर बनने के गुण तो दुर्योधन में भी विद्यमान हैं। और फिर वह दुर्योधन को गदायुद्ध सिखाने के लिये अपना शिष्य बना लेते हैं। द्वारिका में रुक्मिणी श्रीकृष्ण से कहती हैं कि अब आपको बहन सुभद्रा के लिये योग्य वर की खोज प्रारम्भ करनी चाहिये। श्रीकृष्ण हँसकर कहते हैं कि इसकी आवश्यकता नहीं है। वर स्वयं चलकर आयेगा। उसी समय अर्जुन का रथ उनके महल में प्रवेश करता है। Produced - Ramanand Sagar / Subhash Sagar / Pren Sagar निर्माता - रामानन्द सागर / सुभाष सागर / प्रेम सागर Directed - Ramanand Sagar / Aanand Sagar / Moti Sagar निर्देशक - रामानन्द सागर / आनंद सागर / मोती सागर Chief Asst. Director - Yogee Yogindar मुख्य सहायक निर्देशक - योगी योगिंदर Asst. Directors - Rajendra Shukla / Sridhar Jetty / Jyoti Sagar सहायक निर्देशक - राजेंद्र शुक्ला / सरिधर जेटी / ज्योति सागर Screenplay & Dialogues - Ramanand Sagar पटकथा और संवाद - संगीत - रामानन्द सागर Camera - Avinash Satoskar कैमरा - अविनाश सतोसकर Music - Ravindra Jain संगीत - रविंद्र जैन Lyrics - Ravindra Jain गीत - रविंद्र जैन Playback Singers - Suresh Wadkar / Hemlata / Ravindra Jain / Arvinder Singh / Sushil पार्श्व गायक - सुरेश वाडकर / हेमलता / रविंद्र जैन / अरविन्दर सिंह / सुशील Editor - Girish Daada / Moreshwar / R. Mishra / Sahdev संपादक - गिरीश दादा / मोरेश्वर / आर॰ मिश्रा / सहदेव In association with Divo - our YouTube Partner #shreekrishna #shreekrishnakatha #krishna

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