बलराम और राजा ककुद्मी की पुत्री रेवती का शुभ विवाह | श्री कृष्ण लीला
नारद मुनि जी एक शुभ समाचार लेकर द्वारिका पहुँचते हैं। वे बताते हैं कि राजा कूकुद्मी अपनी पुत्री रेवती का विवाह बलराम के साथ कराने के उद्देश्य से द्वारिका आने वाले हैं। यह समाचार सुनकर भगवान श्री कृष्ण अत्यंत प्रसन्न हो उठते हैं। कुछ ही समय बाद राजा कूकुद्मी अपनी पुत्री रेवती के साथ द्वारिका पहुँचते हैं और आदरपूर्वक बलराम के साथ उसके विवाह का प्रस्ताव रखते हैं। यह प्रस्ताव स्वीकार होते ही द्वारिका नगरी में हर्ष और उल्लास की लहर दौड़ जाती है। चारों ओर मंगल गीत गूँजने लगते हैं, उत्सव का वातावरण छा जाता है और बड़े धूमधाम से बलराम और रेवती के विवाह की तैयारियाँ की जाती हैं। विवाह के उपलक्ष्य में द्वारिका में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें समस्त नगरवासी आनंद और उल्लास के साथ सम्मिलित होते हैं। अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर श्री कृष्ण और बलराम गुरु सांदिपनि से कहते है कि गुरु से मिली शिक्षा के ऋण कभी नहीं उतारा जा सकता है, लेकिन लोक रीति अनुसार उचित गुरु दक्षिणा का आदेश दें। गुरु उनसे कहते है कि उनसे प्राप्त शिक्षा का वे जनकल्याण के लिए अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध करेंगे। लेकिन जब श्री कृष्ण गुरु माँ से उनकी इच्छा पूछते है तो वह कहती है कि उन्हें अपना समुद्र में डूब कर मरा पुत्र पुनर्दत्त चाहिए। श्री कृष्ण गुरु माँ को उनके पुत्र को जीवित लाने का वचन देकर समुद्र के किनारे पहुंच जाते है और समुद्र देव से पुनर्दत्त को वापस करने का अनुरोध करते है। समुद्र देव कहते है कि सम्भवतः पुनर्दत्त को मेरे जल के अंदर रह कर लोगों को भक्षण करने वाला पाञ्चजन्य नामक राक्षस ले गया होगा। श्री कृष्ण और बलराम पाञ्चजन्य समुद्र की तलहटी में सूक्ष्म शरीर करके शंख में विश्राम करता हुआ मिलता है। श्री कृष्ण उसे अग्नि बाण चला कर जागते है, जिसकी गर्मी से व्याकुल होकर वह अपना शरीर विशाल कर लेता है। श्री कृष्ण अपनी तलवार से पाञ्चजन्य के दो टुकड़े कर देते है, लेकिन उसके शरीर के अंदर से पुनर्दत्त की हड्डियां नहीं मिलती है। श्री कृष्ण पाञ्चजन्य के शंख को उठा लेते है और बलराम के साथ यमपुरी के द्वार पर पहुंच कर शंखनाद करते है। जिसकी ध्वनि से भयभीत यमराज स्वयं द्वार पर आते है और क्षमा मांगते हुए श्री कृष्ण के अनुरोध पर पुनर्दत्त की जीवित उनके साथ वापस भेज देते है। आश्रम पहुंच कर श्री कृष्ण पुनर्दत्त को गुरु माँ को सौंपते समय एक मनगढ़ंत कहानी भी सुनाते है। अपने पुत्र को जीवित देख गुरु माँ की आँसू की धारा बहने लगती है। " Produced - Ramanand Sagar / Subhash Sagar / Pren Sagar निर्माता - रामानन्द सागर / सुभाष सागर / प्रेम सागर Directed - Ramanand Sagar / Aanand Sagar / Moti Sagar निर्देशक - रामानन्द सागर / आनंद सागर / मोती सागर Chief Asst. Director - Yogee Yogindar मुख्य सहायक निर्देशक - योगी योगिंदर Asst. Directors - Rajendra Shukla / Sridhar Jetty / Jyoti Sagar सहायक निर्देशक - राजेंद्र शुक्ला / सरिधर जेटी / ज्योति सागर Screenplay & Dialogues - Ramanand Sagar पटकथा और संवाद - संगीत - रामानन्द सागर Camera - Avinash Satoskar कैमरा - अविनाश सतोसकर Music - Ravindra Jain संगीत - रविंद्र जैन Lyrics - Ravindra Jain गीत - रविंद्र जैन Playback Singers - Suresh Wadkar / Hemlata / Ravindra Jain / Arvinder Singh / Sushil पार्श्व गायक - सुरेश वाडकर / हेमलता / रविंद्र जैन / अरविन्दर सिंह / सुशील Editor - Girish Daada / Moreshwar / R. Mishra / Sahdev संपादक - गिरीश दादा / मोरेश्वर / आर॰ मिश्रा / सहदेव Cast / पात्र Sarvadaman D. Banerjee सर्वदमन डी. बनर्जी Swapnil Joshi स्वप्निल जोशी Ashok Kumar अशोक कुमार बालकृष्णन Deepak Deulkar दीपक डेओलकर Sanjeev Sharma संजीव शर्मा Pinky Parikh पिंकी पारिख Reshma Modi रेशमा मोदी Shweta Rastogi श्वेता रस्तोगी Paulomi Mukherjee पौलोमी मुखर्जी Sunil Pandey सुनील पांडेय In association with Divo - our YouTube Partner #shreekrishna #shreekrishnakatha #katha #krishna #krishnakatha

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