प्लेटो प्रत्यय सिद्धांत-1| Plato Theory of Ideas-I | Brahm IAS | Dr. Atul Mishra
पाश्चात्य दर्शन के आधार तत्व/प्लेटो के दर्शन को समझने में सहायक शब्दावली तत्व मीमांसा - इसके अन्तर्गत सत्ता या तत्व सम्बन्धी चिन्तन किया जाता है। तत्व से यहां तात्पर्य विश्व के मूल में निहित उस आधारभूत सत्ता या पदार्थ से है जिसके आधार पर समस्त विश्व के उद्भव, विकास आदि की समुचित व्याख्या की जा सकती है। दर्शनशास्त्र में सामान्यतः ईश्वर आत्मा एवं मूल द्रव्य की विवेचना की जाती है। जिसका स्वरूप अतीन्द्रिय होता है। समकालीन दार्शनिक स्ट्रासन ने तत्वमीमांसा का वर्गीकरण स्वप्नदर्शी एवं वर्णनात्मक में भी किया है। स्वप्नदर्शी तत्वमीमांसा में अनुभव जगत के वर्णन तक सीमित नहीं रहा जाता बल्कि इनमें निहित अपूर्णतााओं से असंतुष्ट होकर कर एक उच्चतर जीवन की कल्पना की जाती है और उसी को यथार्थवादी वास्तविक सत्ता माना जाता है। दूसरी ओर वर्णनात्मक तत्वमीमांसा जगत की वास्तविकता से ही संतुष्ट हो जाता है तथा अनुभव से परे जाकर कल्पना करने की उपेक्षा की जाती है। ज्ञानमीमांसा - ज्ञान के स्रोत एवं साधनों का तार्किक विवेचन ज्ञानमीमांसा के अन्तर्गत आता है जिसके आधार पर यथार्थ सत्ता का स्वरूप निश्चित होता है। और सत्यता एवं असत्यता का स्वरूप निर्धारित किया जाता है। दूसरे शब्दों मंs तत्व को जानने के साधनों का तार्किक विवेचन ज्ञान मीमांसा है। सुकरात से प्लेटो - सुकरात एवं प्लेटो ने ज्ञान के यथार्थ स्वरूप के सन्दर्भ में चिन्तन किया है और प्लेटो का प्रत्ययवाद सुकरात के सम्प्रत्ययवाद का ही विकास है। सुकरात संत्प्रत्यय को बौद्धिक अमूर्तिकरण की प्रक्रिया का परिणाम मानते हैं। जिसमें एक वर्ग के विशेषों की अनिवार्य विशेषताओं को बौद्धिक रूप से ग्रहण किया जाता है। चंूकि यह प्रक्रिया मानसिक स्तर पर होती है अतः सुकरात के सम्प्रत्यय मानसिक है। इनके विपरीत प्लेटो ने अपने प्रत्ययों की वास्तविक सत्ता है यह मात्र मानसिक अवधारणायें नहीं है। प्रत्यय सिद्धांत -1 ग्रीक दर्शन की बहिर्मुखी एवं अन्तर्मुखी प्रवृत्तियों का समन्वय करके प्लेटो प्रत्यय सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। वास्तविक सत्ता के सन्दर्भ में पर्मेनाइडीज परम सत् को नित्य एवं अपरिवर्तनशील कहते हैं जबकि हेरेक्लाइटिस ने संभूति को ही परम सत् स्वीकार कर परिवर्तन को ही वास्तविक माना है। किन्तु प्लेटो के अनुसार प्रत्ययों की ही वास्तविक सत्ता है जो कि अपरिवर्तनषील है। जबकि परिवर्तनशीलता का संबंध जगत से है। ज्ञान के स्वरूप में पर्मेनाइडीज बौद्धिक ज्ञान को सत्य मानते है जबकि सोफिस्ट दार्शनिक अनुभव पर आधारित इन्द्रिय जन्य ज्ञान को समस्त ज्ञान का आधार घोषित करते हैं। प्लेटों प्रत्ययों के ज्ञान को बुद्धि गम्य घोषित करते हैं। प्लेटो प्रत्ययों के ज्ञान का बुद्धि गम्य घोषित कर प्राकृतिक जगत को अनुभव विशय कहते हैं। उपर्युक्त आधार पर प्लेटो के प्रत्यय सिद्धांत की रूपरेखा तैयार होता है जो कि सुकरात के विचारों का संशोधित नया रूप है सुकरात ने प्रत्ययों को मानसिक अवधारणायें कहा था। किन्तु प्लेटो ने प्रत्ययों को वस्तुनिष्ठता प्रदान कर वस्तुनिष्ठ प्रत्यय सिद्धांत की स्थापना की। उनके अनुसार सत्ता की दृष्टि से वास्तविक तत्व प्रत्यय ही है। जबकि जगत सत्य एवं असत्य की मध्यवर्ती अवस्था है। ज्ञान की प्राप्ति बुद्धि द्वारा संभव है। इन्द्रियों का सम्बन्ध इस परिवर्तनशील जगत से है इसलिए अनुभव से प्राप्त ज्ञान केवल मत ही है। इस प्रकार प्लेटो के प्रत्यय सिद्धांत का संबंध तत्वमीमांसा एवं ज्ञानमीमांसा दोनो से है। प्लेटो का प्रत्यय सिद्धांत नैतिक एवं सौन्दर्य शास्त्रीय प्रत्ययों के साथ-साथ सभी सम्भावित प्रत्ययों पर लागू होता है। प्राकृतिक जगत की वस्तुओं के प्रत्यय भी वास्तविक तथा वस्तुनिष्ठ होते हैं। इस प्राकृतिक जगत से भिन्न प्रत्ययों का एक जगत है जिसे प्लेटो ^^प्रत्ययों का दिव्लोक^^ कहते हैं। दूसरे शब्दों में प्लेटो के प्रत्यय देश एवं काल से परे है क्योंकि देश एवं काल में स्थित वस्तुएं उत्पत्ति] विकास] ह्रास एवं विनाश से ग्रस्त है। जबकि प्रत्यय सभी प्रकार के परिवर्तनों से रहित है।

प्लेटो प्रत्यय सिद्धांत-2| Plato Theory of Ideas-I | Brahm IAS | Dr. Atul Mishra

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