HAVELI SANGEET Raag Kafi छिन छिन होरी| Shri Kelimal Ji Pad @BRAJPADRAAGSEVA #brajholi #raagseva

||राग काफी || दिन डफ ताल बजावत, गावत,भरत परस्पर छिन छिन होरी। अति सुकुमार बदन स्रम बरसत,भले मिले रसिक किसोर किसोरी ।। बातनि बतबतात, राग रंग रमि रह्यौ, इत-उत चाह चलत तकि खोरी। सुनि 'श्री हरिदास' तमाल स्याम सौं, लता लपटि कंचन की थोरी।। •𝗚𝗥𝗔𝗡𝗧𝗛 : 𝗦𝗛𝗥𝗜 𝗞𝗘𝗟𝗜𝗠𝗔𝗔𝗟 𝗝𝗜 •𝗟𝗬𝗥𝗜𝗖𝗦 : 𝗦𝗪𝗔𝗠𝗜 𝗛𝗔𝗥𝗜𝗗𝗔𝗦 𝗗𝗘𝗩 𝗝𝗨 𝗠𝗔𝗛𝗔𝗥𝗔𝗝 •𝗖𝗢𝗠𝗣𝗢𝗦𝗜𝗧𝗜𝗢𝗡 : 𝗧𝗥𝗔𝗗𝗜𝗧𝗜𝗢𝗡𝗔𝗟(𝗥𝗔𝗔𝗚 𝗞𝗔𝗙𝗜) •𝗔𝗨𝗗𝗜𝗢 𝗠𝗜𝗫𝗜𝗡𝗚 & 𝗠𝗔𝗦𝗧𝗘𝗥 : 𝗦𝗛𝗥𝗜 𝗣𝗜𝗬𝗨𝗦𝗛 𝗬𝗢𝗚𝗜 𝗝𝗜 •𝗩𝗜𝗦𝗨𝗔𝗟𝗦 & 𝗚𝗥𝗔𝗣𝗛𝗜𝗖𝗦 : 𝗨𝗠𝗔𝗡𝗚 𝗦𝗛𝗔𝗥𝗠𝗔 •𝗣𝗢𝗦𝗧𝗘𝗥 𝗗𝗘𝗦𝗜𝗚𝗡 & 𝗘𝗗𝗜𝗧𝗜𝗡𝗚 : 𝗕𝗥𝗔𝗝𝗣𝗔𝗗 𝗥𝗔𝗔𝗚𝗦𝗘𝗩𝗔 𝗧𝗘𝗔𝗠 ||𝗦𝗵𝗿𝗶 𝗸𝗲𝗹𝗶𝗺𝗮𝗹 𝗷𝗶|| श्री केलिमाल जी अनन्य रसिक चक्रचूड़ामणि श्रीहरिदासजी महाराज की ऐसी वाणी है, जिसमें उन्होंने अपने परमाराध्य श्रीश्यामा-श्याम की प्रेम-मयी सहज जोड़ी की रसमयी क्रीड़ाओं का गायन किया है। नित्य-किशोर-वयस वाली, घन-दामिनी की तरह श्यामल-गौर कान्ति से अभिमण्डित यह अद्भुत जोड़ी सृष्टि के आदि में भी थी, सृष्टि के समय भी है और सृष्टि के सिमिट जाने पर भी रहेगी। इसके अंग-अंग की उज्ज्वलता, सुघड़ता, सुन्दरता और शोभा का उपमान तीनों भुवनों में न कभी हुआ, न होगा, नहो सकता है। इसका विलास क्या है, मानो रुचि के प्रकाश परस्पर खेल रहे हों, राग-रागिनियों के निर्झर मानो सर्वत्र झर-झर करके प्रवाहित हो रहे हों| आचार्यों ने इस अद्भुत जोड़ी के रस - विलास को 'नित्यविहार' कहा है। नित्यविहार इसलिए कि यह नित्य जोड़ी का विहार है, अनित्य का नहीं, और इसलिए भी कि यह नित्य (सतत चलने वाला) विहार है और इसलिये भी कि यह नित्य वृन्दावन में होने वाला विहार है और इसलिए भी कि यह नित्य (प्रेम) का विहार है, अनित्य (काम) का नहीं। नित्य वृन्दावन में, नित्य प्रेम स्वरूपिणी श्रीहरिदासी के निर्देशन में, नित्य जोड़ी का नित्य निरन्तर चलने वाला यह नित्य विहार ही इस केलिमाल का वर्ण्य है, गेय है। यह नित्यविहार-रस ही श्यामा-श्याम का काम्य है, यही दोनों का जीवन-प्राण है, यही दोनों का आहार-विश्राम है। आसक्ति और अनुराग भी यही है, होली और फाग भी यही है, फूलडोल भी यही है, तीज-हिंडोरा भी यही है। प्रियालाल की अद्भुत रूप माधुरी, आमोद-आह्लाद, गीत-संगीत बनाव-शृङ्गार, सुकुमार भावनाओं की सरस अभिव्यक्ति एवं ऐश्वर्य विहीन अलौकिक प्रेम की रसिक-हृदय-संवेद्य अनंत-अनंत सौंदर्यमयी लीलाएँ- सब नित्यविहार के अन्तर्गत आती हैं। मान- मनुहार, विकलता-बेचैनी शुक-शावकों का कलरव, कोकिला का आलाप विहंगवृन्द का स्वर भरना, मोरों का नृत्य, मेघों का मृदंग-वादन, वर्षा की रिमझिम, नृत्य, गीत और ताल, जवादि- कर्पूर की महक और कस्तूरी-कुमकुम के रंग- सबके सब नित्यविहार के ही अङ्ग हैं। कहीं विपरीत रति से इस नित्यविहार की अभिव्यक्ति हुई है, कहीं सुरतान्त छवि से इसे इंगित किया गया है,कहीं वेष-विपर्यय से यह ध्वनित हुआ है, तो कहीं 'चनख-चनख' बोलन से इसकी प्रतीति करा दी गई है। श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज कौ रस समस्त रसन कौ राजा स्वरूप है और जितने भी रस जो रसिकाचार्यन ने प्रगट किये हैं वे प्रजावत हैं। श्रीश्यामा कुंजविहारी दोऊ रस की ही साक्षात मूरति हैं। इनके तन मन में केवल यही रस भत्यो भयो है, और काहू बात की कहा कही जावै अन्य काहू रस की हू समाई नाँय है। रात और दिन याही रस कौ आस्वादन करत रहत हैं। एक छिन हूं या रस बिन नाँय रह सकत है। याही रस ते इनके प्रानन कौ पोषण होवत रहत है। जैसे जल के बिना जल जन्तु नाँय रह सकत, ऐसें या रस के बिना इनकौ जीवन ही नाँय है। ||𝗦𝗛𝗥𝗜 𝗦𝗪𝗔𝗠𝗜 𝗝𝗨 𝗠𝗔𝗛𝗔𝗥𝗔𝗝|| श्री स्वामी हरिदास जी महाराज प्रेम, रस, सुख, शोभा, कृपा, हित, दया, मया आदि के महासागर हैं। प्रीयालाल के नित्यविहार के स्वरूप हैं, लाड, दुलार सुख के समूह हैं। जगत के दुखी जीवों के दुख को देखकर उनको नित्य सुख से सुखी करने के लिये ही संवत 1537 भादों शुक्ला अष्टमी, दिन बुधवार को मध्यान्ह के समय ब्राह्मण कुल में, श्री वृन्दावन के निकट राजपुर गाँव में प्रगट भये। आपकी माता का नाम श्री चित्रा जी तथा पिताजी का नाम श्री गंगाधर जी था। आपने श्री निम्बार्क सम्प्रदाय में स्थित श्री आशुधीर देव जू, जो श्री गोवर्धन पर्वत के अवतार माने जाते हैं, से दीक्षा, मन्त्र तथा विरक्त भेष ग्रहण कर शिष्यता प्राप्त की "गुरुन कौ गुरु श्री हरिदास आशुधीर कौ"। पच्चीस वर्ष की अवस्था में आप अविवाहित ही गृह त्यागकर श्री वृन्दावन में नित्य निवास कर, श्री बिहारी-बिहारिनि कूं लाड लडाने में तल्लीन हो गये; सत्तर वर्ष वृन्दावन में वास किया। 95 वर्ष की आयु में आप निकुंज महल को गमन कर गये। आपके बारह विरक्त शिष्य थे (1) श्री बीठलविपुल जी, (2) श्री दयालदास जी, (3) श्री मनोहर दास जी, (4) श्री मधुकर दास जी, (5) श्री मधुरदास जी, (6) श्री गोविन्ददास जी, (7) श्री केशवदास जी (8) श्री मोहनदास जी, (9) श्री बलदाऊ दास जी, (10) श्री अनन्य दास जी, (11) श्री द्वितीय दयाल दास जी, (12) श्री प्रकाश दास जी। श्री स्वामी हरिदास जू महाराज श्यामा-कुंजबिहारी की नित्य लीलाओं का नित्य-निरन्तर अवलोकन किया करते थे और उन्हीं का गायन किया करते। उन पदों को संकलित कर, श्री केलिमाल जी की रचना भई है, जिसमें प्रियालाल का पूर्ण प्रेम प्रकाश, केलि विलास, रूप रंग रस की गहराई आदि का वर्णन है। एक-एक शब्द पर सकल मंत्र न्योछावर हैं। यह श्री स्वामी जी महाराज के मुखारबिन्द से स्पर्श हुआ कृपा प्रसाद है। #brajpadhavelisangeet #brajpadraagseva #brajpad #raagseva #raag #brajpadraagsevakelimalji #brajpadkelimalji #kelimalji #shriharidas #brajholi

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प्रीति की रीति रंगीलौई जानैं|श्री हितचौरासीजी पद क्रमांक 41|Raag:Asavari|#RAAGSEVA @BRAJPADRAAGSEVA
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Birju Barot द्वारा रमणीय स्वर में गूंजता हुआ Radha Naam Kirtan (जन्मोत्सव Special) // 18/03/25
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Aesi Kripa karo Shri Radhe | ऐसी कृपा करो श्री राधे | Sanatana Sankirtan
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Naav Ke Pad | नाव के पद​ | Nonstop | Krushnadas Nayak
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Vitthala Thevre Pathivar Haat |  Rigved Barve | Anil Gandbhir | Pandharinath Mane | Pranita Saklikar
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Bhajan Jamming | Backstage Siblings | Shree Ram Ki Gali Mein Tum Jaana
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Choosy Girls in Matrimonial Market | MATRIMANIA Episode 7 | Standup Comedy by Saikiran
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