_कोरकू_संस्कृति । डोलार झुला झुलते हुए महिलाए अपने इतिहास को लोकगीतों के माध्यम से बताते हैं ।
_कोरकू_संस्कृति । कोरकू समाज में हर महिने त्यौहार मनाने का प्रचलन हैं इसी क्रम में जब जिरोती त्यौहार मनाने के बाद से बच्चे सागौन या बांस की लकड़ी से गेड़ी बनाकर एक माह तक गेड़ी चलाते है और महिलाओं के लिए पुरूष डोलार बांधते है जैसा कि आप विडियो मे डोलार देख रहे है जिसमें महिलाए पूरे एक माह तक शाम से लेकर आधी रात तक झूला झुलते है। झुला झुलते हुए महिलाए अपने इतिहास को लोकगीतों के माध्यम से बताते हैं ।हमारा पुरातन इतिहास इन्ही लोकगीतों में मिलता हैं।इस झूले में सिर्फ महिलाए ही बैठकर झूलते है ऐसा नही है,डोलार झूले में महिलाओ के साथ बैठकर छोटे बच्चे बच्चियां और पुरूष भी झूला झुलते हैं।बचपन में मैने भी खूब झूला झुला हुं।जिरोती के एक माह बाद पोला(पिटोरा) का त्यौहार आता है इस त्यौहार के दूसरे दिन कर(कड़) होता है इसी दिन सुबह 6:00 am को बच्चे जल्दी उठकर अपने अपने गेड़ियों के साथ इकट्टा होते है और फिर घर घर जाकर पारंपारिक स्लोगन बोल बोलकर रात की बनी बासी पुड़ी भजिया बड़े और महुए के बने लड्डू को मांगना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते है और सभी घरो से जो कुछ भी मिले ले लेते हैं।और फिर सभी बच्चे एक साथ अपनी अपनी गेड़ी सिराने (विसर्जन) करने जाते हैं।गेड़ी सिराने(विसर्जन)का स्थल निश्चित होता है जैसे जिस गांव के पास नदी नाला नही होता है तो वे गांव के बाहर मेंढा मे जो पूर्व समय से निश्चित है जहां कोई पेड़ होता है वहां जाकर उस स्थान के चारो ओर अपने गेड़ी पर चड़कर परिक्रमा लगाते है और फिर उस गेड़ी को सभी बच्चे वही खड़ी कर छोड़ आते है मतलब गेड़ी का विसर्जन कर देते हैं।और जिस गांव के पास नदी नाला होता है तो गेड़ी को बहते पानी में विसर्जित करते है।तत्पश्चात घरों से मिले व्यंजन का एक साथ बैठकर लुफ्त उठाते हैं।उसके बाद बच्चे अपने क्षेत्र के छोटे मोटे जंगल से नारभोर लाते है और घर घर जाकर उस नारभोर को घरो पर डाल देते हैं।यहां गेड़ी का कार्यक्रम पूरा हो जाता है इसके बाद डोलार विसर्जन की बारी आती हैं।कर (कड़)के दिन महिलाएं सुबह से शाम 4-5 बजे तक झूला झूलते है और डोलार झूले को पारंपारिक साज सामान से सजाते है और शाम को गांव के सभी लोग महिला पुरूष बच्चे एक साथ पारंपारिक वादयंत्र ढोल बांसुरी बजाकर नाचते कूदते लोकगीत गाते हुए डोलार झूले का विसर्जन नदी नाले मे बहते पानी में विसर्जित कर देते हैं।डोलार झूले से महिलाओं का आत्मीय लगाव हो जाता है इसलिए डोलार(झूला) का विसर्जन विदाई कार्यक्रम बिल्कुल एक दुल्हन की विदाई की भांति होती है। इस प्रकार डोलार झूले का पूरा कार्यकाल होता हैं।डोलार झूला गांव मे हर कभी नही बांधते है। आप लोगो को कोरकू आदिवासी समाज का यह जानकारी कैसे लगी कमेंट बाक्स में जरूर बताएं। 🌾🌻🌻🌾🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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