सरस्वती: आखिर कहां विलुप्त हो गई वैदिक काल की देवतुल्य नदी ! The Lost River | Mystic River of India
जहां लिखी गई थी महाभारत और गरजती हुई बहती थी सरस्वती | यहां पर आज भी मौजूद है सरस्वती नदी.व्यास जी ने दिया था श्राप | तो क्या वापिस आएगी सरस्वती..? सरस्वती का पौराणिक इतिहास | History behind Saraswati River in Hindi | Mystic River of India सरस्वती का नाम सरस्वती क्यूँ पड़ा ? इसके पीछे ऋग वेद में यह कहा गया हैं कि कला,संस्कृति, भाषा, ज्ञान विज्ञान जन्म एवम वेदों की रचना इस नदी के तट पर ही की गई | सरस्वती की ज्ञान एवम कला की देवी हैं | इसलिये इसे सरस्वती नदी कहा गया हैं | सरस्वती तट के तीर्थ सरस्वती के तीर्थ : पुष्कर में ब्रह्म सरोवर से आगे सुप्रभा तीर्थ से आगे कांचनाक्षी से आगे मनोरमा तीर्थ से आगे गंगाद्वार में सुरेणु तीर्थ, कुरुक्षेत्र में ओधवती तीर्थ से आगे हिमालय में विमलोदका तीर्थ हैं। उससे आगे सिन्धुमाता से आगे जहां सरस्वती की 7 धाराएं प्रकट हुईं, उसे सौगंधिक वन कहा गया है। उस सौगंधिक वन में प्लक्षस्रवण नामक तीर्थ है, जो सरस्वती तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। रेगिस्तान में उतथ्य मुनि के शाप से भूगर्भित होकर सरस्वती लुप्त हो गई और पर्वतों पर ही बहने लगी। सरस्वती पश्चिम से पूरब की ओर बहती हुई सुदूर पूर्व नैमिषारण्य पहुंची। अपनी 7 धाराओं के साथ सरस्वती कुंज पहुंचने के कारण नैमिषारण्य का वह क्षेत्र 'सप्त सारस्वत' कहलाया। यहां मुनियों के आवाहन करने पर सरस्वती 'अरुणा' नाम से प्रकट हुई। अरुणा सरस्वती की 8वीं धारा बनकर धरती पर उतरी। अरुणा प्रकट होकर कौशिकी (आज की कोसी नदी) से मिल गई। क्या सरस्वती नदी कभी गंगा से मिली? वैज्ञानिक शोध : सरस्वती नदी कभी गंगा नदी से मिली या नहीं मिली, यह शोध का विषय अब भी बना हुआ है। वैदिक काल में एक और नदी दृषद्वती का वर्णन भी आता है। यह सरस्वती नदी की सहायक नदी थी। यह भी हरियाणा से होकर बहती थी। कालांतर में जब भीषण भूकंप आए और हरियाणा तथा राजस्थान की धरती के नीचे पहाड़ ऊपर उठे, तो नदियों के बहाव की दिशा बदल गई। एक और जहां सरस्वती लुप्त हो गई, वहीं दृषद्वती के बहाव की दिशा बदल गई। इस दृषद्वती को ही आज यमुना कहा जाता है। इसका इतिहास 4,000 वर्ष पूर्व माना जाता है। भूचाल आने के कारण जब जमीन ऊपर उठी तो सरस्वती का आधा पानी यमुना (दृषद्वती) में गिर गया इसलिए यमुना में यमुना के साथ सरस्वती का जल भी प्रवाहित होने लगा। सिर्फ इसीलिए प्रयाग में 3 नदियों का संगम माना गया। वाल्मीकि रामायण में भरत के कैकय देश से अयोध्या आने के प्रसंग में सरस्वती और गंगा को पार करने का वर्णन है. जिसमें लिखा गया है, ‘सरस्वतीं च गंगा च युग्मेन प्रतिपद्य च, उत्तरान् वीरमत्स्यानां भारूण्डं प्राविशद्वनम्’ सरस्वती के निकट ही दृषद्वती नदी बहती थी। मनु ने सरस्वती और दृषद्वती नदियों के दोआब को 'ब्रह्मावर्त' प्रदेश की संज्ञा दी है। ब्रह्मावर्त का निकटवर्ती भू-भाग 'ब्रह्मर्षि प्रदेश' कहलाता था। उसके अंतर्गत कुरु, मत्स्य, पंचाल और शूरसेन जनपदों की स्थिति मानी गई है। पुराणों के अनुसार आदिम मनु स्वायंभुव का निवास स्थल सरस्वती नदी के तट पर था। कहा जाता है कि कार्तिकेय (शिव के पुत्र जिनका एक नाम स्कंद भी है) को सरस्वती के तट पर देवताओं की सेना का सेनापति (कमांडर) बनाया गया था। चंद्रवंशी राजकुमार पुरुरवा को उनकी भावी पत्नी उर्वशी भी यहीं मिली थी। पहले कुरुओं का स्थान सिंधु तट था बाद में सरस्वती तट हो गया। संसार में हैहयी वंशियों के आतंक का खात्मा करने के बाद परशुराम ने इसी नदी के पवित्र करने वाले जल में स्नान किया था। सरस्वती नदी से ही है हिन्दू धर्म के इतिहास की शुरुआत.. अधिकतर इतिहासकार भारत के इतिहास की पुख्ता शुरुआत सिंधु नदी की घाटी की मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यता से मानते थे लेकिन अब जबसे सरस्वती नदी की खोज हुई है भारत का इतिहास बदलने लगा है। अब माना जाता है कि यह सिंधु घाटी की सभ्यता से भी कई हजार वर्ष पुराना है। ऋग्वेद की ऋचाओं में कहा गया है कि यह एक ऐसी नदी है जिसने एक सभ्यता को जन्म दिया। इसे भाषा, ज्ञान, कलाओं और विज्ञान की देवी भी माना जाता है। हड़प्पा, सिंधु और मोहनजोदड़ों सभ्यता का प्रथम चरण 3300 से 2800 ईसा पूर्व, दूसरा चरण 2600 से 1900 ईसा पूर्व और तीसरा चरण 1900 से 1300 ईसा पूर्व तक रहा। इतिहासकार मानते हैं कि यह सभ्यता काल 800 ईस्वी पूर्व तक चलता रहा। लेकिन अभी सरस्वती की सभ्यता को खोजा जाना बाकी है। सदी की शुरुआत में एक हंगेरियाई पुरातत्वविद ऑरेल स्टीन ने हड़प्पाकालीन स्थलों की पहचान की है, जो कि भारत में हरियाणा से लेकर पाकिस्तान के पंजाब तक में स्थित हैं। सरस्वती के तल के पास बहुत अधिक पुरातात्विक महत्व के स्थल मौजूद हैं जिनकी संख्या करीब 360 है जबकि सिंधु के किनारे ऐसे स्थलों की संख्या मात्र 3 दर्जन है। सरस्वती के प्राचीन मार्ग के पास करीब 300 से अधिक स्थलों की मौजूदगी का पता लगाया जा चुका है। इस नई खोज से यह बात भी सिद्ध होती है कि हड़प्पाकालीन सभ्यता का पतन कैसे हुआ? हालांकि प्राचीन पुराविदों का मानना है कि यह सभ्यता उत्तर से आए भूरी चमड़ी वाले, रथों पर सवार, घोड़ों को अपने वश में रखने वाले और लोहे का इस्तेमाल करने वाले आर्यों के हमलों से नष्ट हो गई। लेकिन इस बात का दावा किया जा सकता है कि भारत की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप में क्षेत्र की भौगोलिक स्थितियों में बड़े पैमाने पर हुए बदलाव के कारण संभव हुआ। इसी बात का समर्थन करने वाला एक और अध्ययन 2003 से लेकर 2008 में किया गया। यह अध्ययन रोमानिया, पाकिस्तान, भारत, ब्रिटेन और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने किया था। अपनी अत्याधुनिक जियोसाइंस तकनीक के बल पर शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि हड़प्पाकालीन लोग अनुकूल और सहायक स्थितियों में रहा करते थे और उस समय पर्याप्त वर्षा होती थी लेकिन 4 हजार वर्ष पहले स्थितियों में बदलाव आना शुरू हुआ। #saraswatinadi #history #thelostriver #ancientindia Thanks for watching

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