आपराधिक विचारण में अभियोजन के महत्वपूर्ण बिंदु complete procedure in criminal cases.
इस वीडियो में आपराधिक कार्यवाही में विचारण के दौरान अभियोजन की महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला जा रहा है । In crpc 1973 section2(g) inquiry word is defined as inquiry means every enquiry, other than a trial, conducted under this code by magistrate or court. section 2(h) CrPC investigation includes all the proceedings under this code for the collection of evidence conducted by police officer for any person who is authorised by magistrate in this behalf. the world trial is not defined in the CRPC. इंक्वायरी Dhara 2 ( g)CRPC अर्थात प्रत्येक जांच मजिस्ट्रेट के द्वारा विचारण के पूर्व इस अधिनियम के अंतर्गत जांच की जाती है। इन्वेस्टिगेशन के दौरान धारा 2( h )सीआरपीसी के अंतर्गत साक्ष्य एकत्रित करने के लिए विवेचना के दौरान की गई कार्यवाही विवेचना अधिकारी police या मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत किसी व्यक्ति के द्वारा मामलों में की जाती है। trialअर्थात विचारण का अर्थ है कि f.i.r. होने के बाद उससे संबंधित साक्ष्य विवेचना अधिकारी द्वारा एकत्रित करने के पश्चात धारा 173 सीआरपीसी के अंतर्गत न्यायालय में अभियुक्त के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत होता है। न्यायालय के द्वारा अभियुक्त से यह पूछा जाता है कि आपके विरुद्ध फलां फलां अपराध है, क्या आप इस अपराध को स्वीकार करते हैं, या अस्वीकार करते हैं ।यदि मामले में न्यायालय के मजिस्ट्रेट को ऐसा लगता है कि प्रथम दृष्टया कोई साक्ष्य आरोपों के संबंध में नहीं है, तो वह उसे अर्थात अभियुक्त को उसी स्टेज पर डिस्चार्ज करेगा जिसका प्रभाव दोष मुक्ति होता है।अन्यथा मजिस्ट्रेट , से शनद्वारा विचारणीय मामलों में चार्ज को उल्लेखित करेगा, और ट्रायल के दौरान आरोपों के संबंध में अभियोजन को साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर देगा। विचारण का मुख्य उद्देश्य, अभियुक्त को दोष मुक्त या दोष सिद्ध करना होता है ।और दोष सिद्धि के उपरांत अभियुक्त को दंड के प्रश्न पर सुना जा कर दंडित किया जाता है। ट्रायल की परिभाषा सीआरपीसी में कहीं नहीं दी गई है। चालान पेश करने के बाद न्यायालय द्वारा आरोपी पर आरोपित अपराधों के संबंध में आरोप लगाए जाते हैं। इस प्रकार अपराधिक विचारण का किसी भी आपराधिक कार्यवाही में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। उदाहरण के तौर पर पोक्सो एक्ट, तथा धारा 302 एवं धारा 307 आईपीसी के अंतर्गत गंभीर मामलों में आरोप लगाने के बाद उसका विचारण न्यायालय द्वारा प्रारंभ किया जाता है। जिसमें अभियोजन की साक्ष्य से मामला शुरू होता है। बचाव के अधिवक्ता द्वारा उस अभियोजन साक्षी पर जिरह की जाती है ,तथा उसके बाद धारा 311 सीआरपीसी के अंतर्गत मुलजिम बयान लिए जाते हैं, इसके पश्चात बचाव को बयान देने का अवसर दिया जाता है, तथा यदि अभियोजन अपना मामला संदेह से परे न्यायालय के समक्ष प्रमाणित कर देता है ,तो उसका परिणाम दोषसिद्धि( Conviction )होता है ,और यदि आरोपी के विरुद्ध प्रॉसीक्यूशन मामले में साक्ष्य सही ढंग से प्रमाणित नहीं कर पाता है ,तो उसका प्रभाव दोष मुक्ति अर्थात अभियुक्त को वरी (acquittal )किया जाता है। न्यायालय के द्वारा आरोपित अर्थात विवादित बिंदु जो आरोप के संबंध में होते हैं ,उनमें गुण दोष पर अभियोजन की साक्ष्य ली जाती है , अभियुक्त द्वारा कौन सा अपराध कार्य किया गया ,अपराध किसने कारित किया, इस बारे में साक्ष्य आने पर आरोपित अपराध के संबंध में यदि साक्ष्य से मामला प्रमाणित हुआ , गवाह सबूत, आर्टिकल पीएम रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष सारी प्रोसेस ट्रायल के दौरान ही आती है। जिसके आधार पर न्यायालय मामले को निणित करती है। विचारण या ट्रायल चार्ज लगने के बाद ही न्यायालय द्वारा प्रारंभ होती है। सत्र न्यायालय द्वारा विचारण धारा 228 सीआरपीसी के अंतर्गत होता है, जबकि मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस द्वारा प्रस्तुत वारंट केस में धारा 240 सीआरपीसी के अंतर्गत कार्यवाही होती है ।इसी प्रकार मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस रिपोर्ट से भिन्न वारंट केस में विचारण धारा 246 सीआरपीसी के अंतर्गत होता है । जबकि समरी केस के संबंध में विचारण धारा 251 सीआरपीसी के अंतर्गत होता है। उन मोचन या डिस्चार्ज विचारण का पार्ट नहीं है। चार्ज लगने के पहले डिस्चार्ज यदि किया जाता है तो उसका प्रभाव दोष मुक्ति होता है। यदि किसी मामले में अभियुक्त को दोषमुक्त किया जाता है, तो उसमें स्टेट गवर्नमेंट अपील या रिवीजन करती है, जो भी ट्रायल का ही पार्ट होता है । यदि उदाहरण के तौर पर यदि मर्डर के मामले में सत्र न्यायालय ने अभियुक्त को आजीवन कारावास का दंड दिया है और उसकी अपील या रिवीजन की गई है ,तो वह भी ट्रायल का पार्ट ही माना जाएगा। इस प्रकार संक्षेप में न्यायालय द्वारा अपराध का संज्ञान धारा 190 सीआरपीसी के अंतर्गत किया जाता है। अभियुक्त को चार्ज पढ़ कर सुनाया जाता है, उसके पश्चात अभियोजन के द्वारा मामले में अपनी साक्ष्य प्रस्तुत करती है, अभियोजन की साक्ष्य पर पर बचाव के अधिवक्ता द्वारा जिरह की जाती है, उसके पश्चात अभियोजन के साक्षियों के कथनों के जो बयान दिया हैं उसके आधार पर आधार पर धारा 313 सीआरपीसी के अंतर्गत मुलजिम कथन लिए जाते हैं। तथा बाद में अभियुक्त को बचाव का अवसर दिया जाता है। अभियुक्त अपना बचाव मामले में प्रस्तुत करता है, बचाव साक्षियों पर शासन की ओर से अभियोजन की ओर से जिरह की जाती है ,उसके पश्चात दोनों पक्षों की बहस, सुनी जाती है ।उसके पश्चात तफैसला न्यायालय के द्वारा पारित किया जाता है। इस प्रकारआपराधिक मामलों में विचारण अर्थात ट्रायल काअत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है। मेरी धर्मपत्नी अर्चना शर्मा का archanas arty hub है,जिसे कृपया सब्सक्राइब करें #आपराधिक कार्यवाही में विचारण में अभियोजन के महत्वपूर्ण बिंदु कौन-कौन से हैं। #क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में विचारण में अभियोजन की क्या भूमिका होती है #पैरामीटर ऑफ ला ं

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