सुनते ही बरसेगी जगन्नाथ जी की असीम कृपा | मन को शांति देने वाला दिव्य स्तोत्र।श्री जगन्नाथाष्टकम् |
🙏 श्री जगन्नाथाष्टकम् | मन को शांति देने वाला दिव्य संस्कृत स्तोत्र 🙏 जय जगन्नाथ! 🌼 इस वीडियो में श्री जगन्नाथाष्टकम् की शांत, भक्तिमय और पारंपरिक मंदिर-शैली की प्रस्तुति है। श्रद्धा से इसका श्रवण मन को शांति, भक्ति और भगवान श्री जगन्नाथ के चरणों में प्रेम उत्पन्न करता है। यह प्रस्तुति ध्यान, पूजा, जप, प्रातः एवं संध्या आरती के लिए उपयुक्त है। यदि वीडियो पसंद आए तो 👍 Like | 📤 Share | 🔔 Subscribe अवश्य करें। जय जगन्नाथ! 🙏 जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥ This is an original AI-generated devotional song. Any reference to Palak Muchhal is only to describe artistic inspiration and does not mean that Palak Muchhal performed, endorsed, collaborated on, or is affiliated with this song in any way. All vocals, lyrics, music, and artwork are AI-generated and independently created. #JagannathAshtakam #JaiJagannath #Jagannath #SanskritStotram #JagannathBhajan #Bhakti #SanatanDharma #TempleBhajan #Devotional #IndianClassical १. कदाचित् कालिन्दी-तट-विपिन-सङ्गीत-करवो मुदा गोपी-नारी-वदन-कमलास्वाद-मधुपः। रमा-शम्भु-ब्रह्मामर-पति-गणेशार्चित-पदो जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥ अर्थ: जो भगवान कभी यमुना (कालिन्दी) के तट पर वन में मधुर संगीत करते हुए विहार करते हैं, जो आनंदपूर्वक गोपियों के कमल समान मुख की मधुरता का रस लेने वाले भौंरे के समान हैं, जिनके चरणों की लक्ष्मीजी, भगवान शिव, ब्रह्माजी, इन्द्र और श्रीगणेश भी पूजा करते हैं—वे प्रभु श्री जगन्नाथ सदैव मेरी आँखों के सामने विराजमान रहें। २. भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते। सदा श्रीमद्-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥ अर्थ: जिनके बाएँ हाथ में बाँसुरी है, सिर पर मोरपंख सुशोभित है, कमर में पीताम्बर धारण किए हुए हैं, जो अपने सखाओं पर प्रेमपूर्ण दृष्टि डालते हैं और जो सदा श्रीवृन्दावन की दिव्य लीलाओं में रमण करते हैं—वे श्री जगन्नाथ मेरे नेत्रों के मार्ग में सदैव बने रहें। महाम्भोधेस्तीरे कनक-रुचिरे नील-शिखरे वसन् प्रासादान्तः सहज-बलभद्रेण बलिना। सुभद्रा-मध्यस्थः सकल-सुर-सेवावसरदो जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥ अर्थ: जो विशाल समुद्र के तट पर स्थित स्वर्णमय शोभा वाले नीलाचल पर्वत के दिव्य मंदिर में अपने बड़े भाई बलभद्र जी और बहन सुभद्रा जी के साथ विराजमान हैं, तथा देवताओं को भी अपनी सेवा का अवसर प्रदान करते हैं—वे श्री जगन्नाथ सदैव मेरी आँखों के सामने रहें। ४. कृपापारावारः सजल-जलद-श्रेणि-रुचिरो रमा-वाणी-रामः स्फुरद्-अमल-पङ्केरुह-मुखः। सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुति-गण-शिखा-गीत-चरितो जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥ अर्थ: जो असीम करुणा के सागर हैं, जिनका श्यामल स्वरूप वर्षा के बादलों के समान मनोहर है, जिनका मुख निर्मल कमल के समान तेजस्वी है, जिनकी लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी तथा समस्त देवता आराधना करते हैं और जिनकी महिमा वेद भी गाते हैं—वे श्री जगन्नाथ सदैव मेरी दृष्टि में बने रहें। ५. रथारूढो गच्छन् पथि मिलित-भूदेव-पटलैः स्तुति-प्रादुर्भावं प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः। दयासिन्धुर्बन्धुः सकल-जगतां सिन्धु-सुतया जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥ अर्थ: जो रथयात्रा के समय रथ पर विराजमान होकर निकलते हैं, मार्ग में ब्राह्मणों और भक्तों द्वारा गाई जा रही स्तुतियों को करुणापूर्वक सुनते हैं, जो समस्त संसार के हितैषी और दया के सागर हैं तथा माता लक्ष्मी के साथ सभी पर कृपा बरसाते हैं—वे श्री जगन्नाथ मेरे नेत्रों के सामने सदैव रहें। ६. परब्रह्मापीडः कुवलय-दलोत्फुल्ल-नयनो निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि। रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥ अर्थ: जो स्वयं परब्रह्म हैं, जिनके नेत्र खिले हुए नीले कमल के समान सुंदर हैं, जो नीलाचल में निवास करते हैं, जिनके चरण अनन्त शेष के मस्तक पर प्रतिष्ठित हैं और जो श्रीराधा के दिव्य प्रेम-रस में आनंदित रहते हैं—वे श्री जगन्नाथ सदा मेरी दृष्टि में बने रहें। न वै याचे राज्यं न च कनक-माणिक्य-विभवं न याचेऽहं रम्यां सकल-जन-काम्यां वर-वधूम्। सदा काले काले प्रमथ-पतिना गीत-चरितो जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥ अर्थ: मैं न तो राज्य की इच्छा करता हूँ, न सोना, रत्न और धन-संपत्ति की कामना करता हूँ। न ही मैं ऐसी सुंदर पत्नी की याचना करता हूँ जिसे संसार का प्रत्येक व्यक्ति पाना चाहे। मेरी केवल एक ही प्रार्थना है कि जिन भगवान श्री जगन्नाथ की महिमा का स्वयं भगवान शिव भी सदा गान करते हैं, वे मेरे नेत्रों के सम्मुख सदैव विराजमान रहें। ८. हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते। अहो दीनानाथं निहितमचलं निश्चितपदं जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥ अर्थ: हे देवताओं के स्वामी! इस नश्वर और दुःखमय संसार के बंधनों को शीघ्र दूर कीजिए। हे यादवों के स्वामी! मेरे असंख्य पापों का भी नाश कीजिए। हे दीनों के नाथ! मुझे अपने श्रीचरणों में अटल स्थान प्रदान कीजिए। मेरी यही प्रार्थना है कि श्री जगन्नाथ सदैव मेरी आँखों के सामने विराजमान रहें। जगन्नाथाष्टकम् का सार इस स्तोत्र में भक्त भगवान श्री जगन्नाथ से किसी भौतिक सुख, धन, राज्य या वैभव की कामना नहीं करता। उसकी केवल एक ही प्रार्थना है कि भगवान श्री जगन्नाथ सदा उसके नेत्रों के सामने रहें, उसके हृदय में निवास करें और उसे अपनी भक्ति, कृपा तथा चरणों की शरण प्रदान करें। यही इस स्तोत्र का मुख्य संदेश है।

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