किस्सा राजा गोपीचंद (लेखराज चौहान) गायक सत्ते फरमाना 27 मन में नहीं जरै थी बिल्कुल तूं भाई न्यू भी
अपने खानदान व परिवार के बारे में सारी सही जानकारी मिलने पर भी चंद्रावळ के मन में संशय बना रहा कि ये बातें तो धौळागढ़ का हर निवासी जानता है । वह जोगी को बताती है कि उसके भाई गोपीचन्द के शरीर पर कई निशानियां हैं जैसे पैर में पदम , हाथ में चक्र, माथे पर मणि और चाँद शिखर यानि सिर में,वे निशानियाँ दिखादे, तो मैं मान जाऊँगी। तब गोपीचन्द ने अपने गुरु को याद किया तो शरीर पर सभी निशानियां प्रकट हो गई और सारी निशानियाँ चंद्रावळ को दिखा दी। जब चंद्रावळ को विश्वाश हो गया कि जोगी उसका भाई गोपीचन्द ही है तो वह भाई का विधिवत स्वागत/आरता करने के लिए आरते की थाली लेने महल के अंदर चली गई । थोड़ी देर के बाद जब चंद्रावळ महल से बाहर द्वार पर आई तो गोपीचन्द वहां से जा चुका था । उसे बहुत दुख हुआ और भाई का विधिवत स्वागत करने व उससे खुलकर बातें करने का मन में मलाल रह गया और पछताते हुये अपने भाई को संबोधित करती हुई क्या कहती है । गाणा न 27 चंद्रावळ भाई को याद करते हुये मन में नहीं जरै थी बिल्कुल तूं भाई न्यू भी करज्यागा इतना भारी बोझ मेरे तूं सिर कै ऊपर धरज्यागा (टेक) मैं बाँदी नै समझूँ थी झूठी खूब भकी मनै गाळी जब बड़े गौर से देखा पाई तेरी सूरत देखी भाळी बहन नै भाई प्यारा हो सै ये एक रूख की डाळी तेरा आरता करण की खातर मैं लेण गई थी थाळी यू के बेरा था भाई तूं मेरे इस मन की शांति हरज्यागा (1) इतना सयाणा होकै नै तूं था किसनै बता भकाया सोलह राणी घर में बैठी तनै कति तरस ना खाया तूँ कान पड़ा कै जोगी बणग्या भिक्षा मांगण आया दूर महल तै जावण खातिर तूँ तै बाँदी नै समझाया असल बात का पता चले बिन कैसे पेटा भरज्यागा (2) धौळागढ़ में राज करै था या खुश थी प्रजा सारी तेरे बिना बता क्यूकर जीवै मैना वन्ती महतारी सोलह राणी और बारह कन्या तनै संकट में डारी ईब मेरा भी के जीणा मैं भी मार कै मरूँ कटारी राजा होकै जोगी रूप में तूं क्यूकर खरा उतरज्यागा (3) शादी होज्या लड़की की ससुराल में नया ठिकाणा बार त्योहार और ब्याह शादी में हो सै पीहर आणा जिसके मात पिता मरज्यां उनै पड़ज्या सै दुख ठाणा भाई भी ना हो पीहर में फिर छुटज्या आणा जाणा लेखराज तेरा काम चालग्या यू मनै क्यूकर सरज्यागा (4) चंद्रावळ भाई की जुदाई सहन नहीं कर सकी और उसने गम में कटारी मार कर आत्महत्या कर ली। चंद्रावळ का पति राजा उग्रसेन जब महल में पहुंचा तो चंद्रावळ की लाश देखकर विलाप करने लगा । जब उसे बताया गया कि आपका साला गोपीचन्द जोगी के रूप में अपणी बहन से मिलने के लिए महल में आया था और वह बिना बताए वहां से चला गया तो वह भागा भागा गोपीचन्द को ढूँढने चला गया । गोपीचन्द को ढूंढकर उसने उसे उसकी बहन के बारे में बताया तो गोपीचन्द वापिस आया और गुरुजी का नाम लेकर अपणी बहन को छुआ तो वह जिंदा हो गई और गोपीचन्द अपने साथियों के साथ डेरे में चला गया । (किस्सा समाप्त)

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