सभी संकल्प होते हैं पूर्ण ।श्री ताम्र वराह का अभिषेक पूजन तथा श्रृंगार।#kashi
वराहरूपिणं देवं भक्तानां अभयप्रदम्। काशीस्थं ताम्रवराहं नमामि भवतारणम्॥ #स्कन्दपुराण के काशीखण्ड एवं अन्य सनातन धर्मशास्त्रों के अनुसार, जब भगवान शिव माता पार्वती को काशीपुरी के विविध दिव्य देवविग्रहों एवं पावन तीर्थों का माहात्म्य सुना रहे थे, तब माता पार्वती ने जिज्ञासावश पूछा -हे कैलासशिखरवासी भक्तों पर अनुग्रह करने वाले प्रभो! आपने पूर्व में मुझे काशी का परम उत्तम माहात्म्य सुनाया था। अब मैं जानना चाहती हूँ कि भवतीर्थ के दक्षिण भाग में ताम्रवर्ण धारण किए हुए, अत्यन्त तेजस्वी और आश्चर्यजनक यह वराहरूप (सूकर) कौन हैं? ताम्रद्वीपमतिक्रम्य किमर्थं काशीमागतः। किं कारणं कुतश्चायं माहात्म्यं वद शङ्कर॥३ दुर्ज्ञेयं तस्य माहात्म्यं सूकरस्यामितौजसः। कृपां कृत्वा महेशान छिन्धि मे संशयं प्रभो॥४ #हे शङ्कर! वे ताम्रद्वीप को छोड़कर काशी क्यों आए? उनके यहाँ आगमन का कारण क्या है और उनका माहात्म्य क्या है? इस अमिततेजस्वी ताम्रवराह का महात्म्य अत्यन्त दुर्ज्ञेय है। अतः हे महेश्वर, मुझ पर कृपा कर मेरे इस संशय का निवारण कीजिए। #भगवान शिव बोले - हे प्रिये! मैं तुम्हें एक अत्यन्त गूढ़ रहस्य बताता हूँ। राजा दिवोदास के समय मुझे काशी छोड़कर मन्दराचल पर निवास करना पड़ा। अपनी प्रिय काशी के वियोग में मैं पुनः अविमुक्त क्षेत्र लौटने के लिए व्याकुल था। मैंने योगिनियों, सूर्य, ब्रह्मा और अपने गणों को काशी भेजा, किन्तु वे सब वहीं स्थित हो गए। तब मैंने गरुड़ध्वज भगवान विष्णु का स्मरण किया। मेरे आह्वान पर भगवान विष्णु अपने पार्षदों सहित मन्दराचल आए और प्रेमपूर्वक बोले -हे शिव! आपकी प्रिय पुरी काशी में मैं स्वयं जाकर आपके पुनः आगमन का मार्ग प्रशस्त करूँगा। #तब महाविष्णु अपने असंख्य स्वरूपों सहित काशी की ओर प्रस्थान कर गए। हिरण्याक्ष-वध के लिए प्रकट होकर ताम्रद्वीप में विराजमान हुए तप्त ताम्रवर्णधारी ताम्रवराह भगवान भी मेरे काशी-आगमन का मार्ग प्रशस्त करने और समस्त विघ्नों का नाश करने हेतु ताम्रद्वीप से काशी पधारे। मन्दरात्प्रस्थिते मयि काश्याभिमुखमीश्वरि। अग्रतोऽग्रे जगामासौ ताम्रक्रोड़ो महाबलिः॥१३ निष्कण्टकं पन्थानं मे कर्तुं विघ्नविनाशकः। आगत्य वाराणस्यां स भवत्तीर्थमुपस्थितः॥१४ #हे ईश्वरि! जब मैंने मन्दराचल से काशी के लिए प्रस्थान किया, तब मेरे मार्ग को निष्कण्टक (बाधारहित) बनाने हेतु वे विघ्नविनाशक महाबली ताम्र वराह मेरे आगे-आगे चले। उन्होंने वाराणसी में आकर भव तीर्थ के समीप अपना स्थान ग्रहण किया। #भगवान शिव बोले - संसार-बन्धन से मुक्ति हेतु मैंने भवतीर्थ की स्थापना कर उसके दक्षिण में ताम्रवराह भगवान को विराजमान किया। मेरे काशी-आगमन में श्रीहरि के महान उपकार से प्रसन्न होकर मैंने उन्हें इस अविमुक्त क्षेत्र में सदैव पूजित एवं क्षेत्रपाल रूप में स्थापित किया। तभी से ताम्रवराह भगवान शंख, चक्र, गदा और पद्मधारी, यज्ञस्वरूप तथा काशी के तेजस्वी रक्षक के रूप में विराजमान हैं। जो मनुष्य इनके दर्शन कर लेता है, उसे यमदूतों का भय कैसे हो सकता है? मन्दराचल से काशी आते समय मेरे साथ जिन देव, यक्ष, गंधर्व और किन्नरों ने यात्रा की थी, उनमें ये ताम्र वराह ही अग्रगण्य हैं। ये पश्यन्ति महादेवि भवत्तीर्थे कृतोदकाः। ताम्रवाराहमुत्तुङ्गं तेषां मुक्तिः करे स्थिता॥२२ वाराह्यां तिथौ यस्तु कुर्याज्जागरणं निशि। अर्चयेत्ताम्रवपुषं स गच्छेत्परमं पदम्॥२३ ब्रह्महत्यादिपापानि महापातकानि च। नश्यन्ति तस्य दंष्ट्राग्रे यथा तूलं हुताशने॥२४ ताम्रद्वीपात्समानीय स्वकीयां वैष्णवीं कलाम्। मत्कार्यार्थं स्थितो यत्र तत्र विघ्नो न बाधते॥२५ #हे महादेवि! जो मनुष्य भव तीर्थ में स्नान और तर्पण (कृतोदक) करके इन उत्तुंग ताम्र वराह का दर्शन करते हैं, मोक्ष उनके हाथों में आ जाता है। जो वराह जयंती (वाराही तिथि) की रात्रि में जागरण कर इन ताम्र वर्ण वाले भगवान की पूजा करता है, वह परम पद को प्राप्त होता है। जैसे अग्नि में रुई (तूल) भस्म हो जाती है, वैसे ही इनकी दाढ़ के अग्रभाग के प्रताप से ब्रह्महत्या आदि महापाप नष्ट हो जाते हैं। ताम्रद्वीप से अपनी वैष्णवी कला को लाकर, मेरे कार्य के लिए जहाँ ये स्थित हैं, वहाँ कोई भी विघ्न बाधा नहीं डाल सकता। सन्यासिनोऽपि ये काश्यां देहत्यागं प्रकुर्वते। तेषामन्तर्गतं मोहं ताम्रक्रोड़ो निकृन्तति॥२६ महामहिम्नः पूर्णोऽयं विष्णुः क्रोड़ाकृतिः स्वयम्। मन्त्राणां च पतिः साक्षान्मोक्षद्वारमुदाहृतः॥२७ #जो सन्यासी भी काशी में देह त्याग करते हैं, उनके अंतर्मन के मोह को ये ताम्र वराह ही काटते हैं (निकृन्तन करते हैं)। महामहिमा से पूर्ण साक्षात विष्णु ही यह वराह रूप हैं, जो सभी मंत्रों के अधिपति और मोक्ष के द्वार कहे गए हैं। #पता - श्री ताम्रवराह भगवान मंदिर ,CK 33/57 ब्रह्मनाल , नीलकंठ गेट नंबर 3 चौक वाराणसी #kashi

"दिव्य अभिषेक और पूजा: श्री असीसंगमेश्वर महादेव, काशी"।#kashi #varanasi ।

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