गुरु - वन्दना
गुरु - वन्दना ।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान् की जय ।। जय सद्गुरुदेवं, परमानन्दं, अमर शरीरं अविकारी। निर्गुण निर्मूलं, धरि स्थूलं, काटन शूलं भवभारी।। सूरत निज सोहं, कलिमल खोहं, जनमन मोहन छविभारी। अमरापुर वासी, सब सुख राशी, सदा एकरस निर्विकारी।। अनुभव गम्भीरा, मति के धीरा, अलख फकीरा अवतारी। योगी अद्वैष्टा, त्रिकाल द्रष्टा, केवल पद आनन्दकारी।। चित्रकूटहिं आयो, अद्वैत लखायो, अनुसुइया आसन मारी। श्री परमहंस स्वामी, अन्तर्यामी, हैं बड़नामी संसारी।। हंसन हितकारी, जग पगुधारी, गर्व प्रहारी उपकारी। सत्-पंथ चलायो, भरम मिटायो, रूप लखायो करतारी।। यह शिष्य है तेरो, करत निहोरो, मोपर हेरो प्रणधारी।। जय सद्गुरु.........भारी।। ।। ॐ ।। ---------------------- भगवान् श्रीकृष्णो यस्मिन् काले गीतायाः सदुपदेशं प्रादात्, तदानीं तस्य मनोभावाः कीदृशा आसन्? ते सर्वे मनोगता भावा वक्तुं न शक्यन्ते। केचन सन्ति भावा वर्णयितुं योग्याः केचन भावभङ्गिमयैव प्रकटयितुमर्हाः, अपरे शेषा भावाः क्रियात्मकाः सन्ति, तान् भावान् कोऽपि जनस्तत्पथमारुह्यैव ज्ञातुं शन्कोति। यस्मिन् स्तरे श्रीकृष्ण आसीत्, तदेव स्तरमात्मसात् कृत्वैव कश्चित् साधनाधनो महापुरुष एव जानाति, यत् गीता कीं कथयति? स महापुरुषो गीतायाः वाक्यमेव वारम्वारं नावत्र्तयति, प्रत्युत् गीतोक्तभावान् स्पष्टरूपेण दर्शयति। कुतोहि या स्थितिः कृष्णस्य समक्षमासीत् सैव स्थितिस्तस्य महापुरुषस्य पुरतश्चकास्ति। एतस्मादेव स महापुरुषः सन्निरीक्षते जनान् दर्शयिष्यति, जनेषु तत् सञ्जागरयिष्यति च तत्पथे चालयिष्यत्यपि। पूज्यश्रीपरमहंसजी महाराजा अपि तत् स्तरस्यैव महापुरुषा आसन्। तेषां वाणीभिरन्तः प्रेरणाभिश्च गीतायाः, योऽर्थः सम्प्राप्तः, तस्यैव संकलनं ‘यथार्थगीता’ अस्ति। - स्वामी अड़गड़ानन्द: ----------------------- Visit: http://yatharthgeeta.com/

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