पदरत्नाकर पद संख्या -४५४ सौंप दिये मन प्राण padratnakar -454 की व्याख्या
#प्रवचन #bhaiji #padratnakar #gitavatika #hanumanprashad #poddar #pujya #radhababa #gita #geetapress #geetapressgorakhpur #sethji #भाईजी #bhajan #marvadi #ratangarh #marvadibhajan #sankirtan #Hareramhareram #kirtan सन् १९५६ में मुझे उन महान् आत्माके दर्शनका सौभाग्य मिला था। मेरा सम्पर्क अनेक व्यक्तियों एवं महापुरुषोंसे हुआ। अब अपने जीवनके उत्तरार्धकालमें मैं यह कह सकता हूँ कि श्रीपूज्य श्रीभाईजीसे मेरी भेंट अत्यन्त आवश्यक थी। भारतदेशके मेरे प्रवासके प्रारम्भिक दिनोंमें बम्बईमें एक भारतीयने मुझसे कहा था - श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार एक विलक्षण पुरुष हैं। मैंने अपने सम्पर्कमें उन्हें ऐसा ही पाया। मैंने उनके रूपमें एक विलक्षण पुरुषके ही दर्शन नहीं किये, अपितु मुझे उनके रूपमें एक संतकी प्राप्ति हुई। जो लोग उनसे एक बार भी मिले हैं, वे उस उदार आत्माको कभी भूल नहीं सकते। मेरे प्रति थे उनके ये शब्द-आप हमारे परिवारके एक सदस्य हैं। ~श्रीकार्ल जी० गेश (लार्ष जर्मनी) जसीडीहमें साक्षात् दर्शनोंवाली बातको लेकर स्थान-स्थानपर समाजमें चर्चा थी। लोग अपने-अपने भावानुसार आलोचना करते। भारतवर्षके प्रमुख उद्योगपति श्रीघनश्यामदासजी बिड़ला पोद्दारजीके बचपनसे मित्र थे। उन्होंने यह घटना सुनी तो सेठजीको पत्र लिखा कि ऐसी दिव्य बातोंका इस तरह प्रचार नहीं होना चाहिये। वे ऐसी बातें गुप्त रखना अच्छा मानते थे। श्रीसेठजीने उन्हें जो उत्तर दिया वह नीचे दिया जा रहा है- ॥ श्रीहरि: ॥ प्रिय श्रीमान् घनश्यामदासजी बिड़ला, सप्रेम राम राम। भाई हनुमानप्रसादके भगवद्दर्शन विषयक समाचार ज्ञात हुए। उसको साकार चतुर्भुज भगवान् के स्वरूपका दर्शन हुआ है। यह बात विश्वास करने योग्य ही है क्योंकि मुझे भाई हनुमानप्रसाद झूठ बोलनेवाला ज्ञात नहीं होता। आपने भाई हनुमानप्रसादकी स्थितिके विषयमें लिखा सो सबकी स्थिति सब समय समान नहीं रहती, और न किसीकी स्थितिका दूसरेको अच्छी तरह ज्ञान ही हो सकता है। इस विषयमें आपका मानना न मानना आपके विश्वासपर निर्भर है। आपने लिखा कि 'ऐसी बातोंके कहने तथा फैलानेमें प्रोत्साहन देना मुझे तो अयोग्य मालूम देता है।' सो ठीक है, पर इसमें भाई हनुमानप्रसादका दोष नहीं है। मैंने ही उसकी इच्छा न रहनेपर भी सब बातें पूछी थीं और लोगोंमें प्रकटकी थी। अतः वास्तवरमें मेरी भूल हुई। ~गीताप्रेस, गोरखपुर विनीत जयदयाल गोयन्दका पौष शुक्ल १९८४ (दिसम्बर १९२७) उपरोक्त अँश पुस्तक परिकर मालिका तृतीय भाग हनुमान प्रसाद पोद्दार स्मारक समिति गीतावाटिका, गोरखपुर से लिये गये हैं।

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