संस्कार उपन्यास | U. R. Ananthamurthy | Hindi Novel review RCU BA 6th sem Hindi

‘संस्कार’ (उपन्यास) : यू. आर. अनंतमूर्ति 'संस्कार' कन्नड़ उपन्यास ज्ञानपीठ पुरस्कारप्राप्त कन्नड़ साहित्यकार डॉ. यू. आर. अनंतमूर्ति की सबसे प्रसिद्ध रचना है, जिसमें उन्होंने ब्राह्मणवादी मूल्यों और सामाजिक व्यवस्था का विरोध किया है। उपन्यास का हिंदी अनुवाद चन्द्रकान्त कुसनूर द्वारा किया गया है। 1965 में प्रकाशित 'संस्कार' उपन्यास के प्रमुख पात्र हैं, महातपस्वी प्राणेशाचार्य, सनातन व्यवस्था का विरोधी ब्राह्मण नारनप्पा (जिसकी मृत्यु होती है) और चन्द्री नामक वेश्या। इनके आलावा अन्य पात्र हैं - प्राणेशाचार्य की पत्नी भागीरथी, ब्राह्मण पुजारी गरुडाचार्य, लक्ष्मणाचार्य तथा दासाचार्य, पदमावती, मेलिंगा का रहिवासी पुट जो प्राणेशाचार्य को पद्मावती के पास ले जाता है, प्राणेशाचार्य का सखा महाबल, नारनप्पा का मित्र श्रीपति, लक्ष्मी देवम्मा तथा अन्य। उपन्यास की कथा दुर्वासापुर गाँव की है। एक वैष्णव ब्राह्मण नारनप्पा की चन्द्री नामक वैश्या के घर में मौत हो जाती है। चन्द्री महातपस्वी प्राणेशाचार्य के घर आकर उन्हें नारनप्पा की मौत के बारे में बताती है। नारनप्पा का संपूर्ण आचरण ब्राह्मणत्व के विरुद्ध था। वह मद्य-मांस सेवन करता था, अपनी पत्नी को छोड़ कर वेश्या चन्द्री के साथ रहता था, उसने भगवान शालिग्राम की मूर्ति को नदी में फैंक दिया था, ब्राह्मण युवकों को सनातन धर्म के विरुद्ध आचरण करने के लिए उकसाता था। उसके निधन से गांव में नैतिक संकट पैदा हो जाता है, क्योंकि दुर्वासापुर के ब्राह्मण उसका अंतिम संस्कार करना नहीं चाहते। कारन था उसका धर्मविरोधी आचरण, साथही सवाल यह भी था कि दाह संस्कार का खर्च कौन करेगा ? घर के आंगन में बैठी चन्द्री यह बात सुनती है और तुरंत अपने सोने के कंगन और गले का सोने का हार उतारकर प्राणेशाचार्य को देती है। चन्द्री के गहने देख गरुडाचार्य की पत्नी सीतादेवी और लक्ष्मणाचार्य की पत्नी अनसूया (नारनप्पा की साली) दोनों के मन में लालच पैदा होता है और वे अपने पति को नारनप्पा का दाहसंस्कार करने के लिए राज़ी करती हैं। गरुडाचार्य और लक्ष्मणाचार्य दोनों प्राणेशाचार्य से मिलकर कहते हैं कि दाहसंस्कार करने के लिए वे तैयार हैं, परंतु गहने उन्हें मिलने चाहिए, तब उनका लालच जानकर प्राणेशाचार्य क्रोधित होते हैं और कहते हैं कि धर्मशास्त्र में इसके बारे में क्या लिखा है, यह देखकर मैं बताऊंगा। जब धर्मशास्त्र के ग्रंथों में इस समस्या का समाधान नहीं मिलता, तब प्राणेशाचार्य चन्द्री के गहने उसे लौटाते हैं और इस समस्या का समाधान ढूंढने हनुमान के मंदिर में जाते हैं, परंतु वहाँ से भी कोई हल नहीं मिलता। प्राणेशाचार्य के पीछे -पीछे चन्द्री भी हनुमान मंदिर पहुंचती है। प्राणेशाचार्य का तेज, ज्ञान, करुणा आदि के कारन चन्द्री उनके प्रति आकर्षित हो गई है और वे हनुमान मंदिर से लौट रहे हैं, तब उनके चरणों पर झुक जाती है। उसकी माँ ने कहा था कि वेश्याओं को पावन-पूज्य तथा तेजस्वी लोगों से गर्भ धारना करनी चाहिए। जब प्राणेशाचार्य आशीर्वाद के लिए उसके सिर पर हाथ रखते हैं, चन्द्री उठकर उनसे लिपट जाती है। आजीवन स्त्री सुख से वंचित प्राणेशाचार्य भी खुद को रोक नहीं पाते और दोनों में प्रणय संबंध हो जाते हैं। जो कुछ हुआ उसे प्राणेशाचार्य छुपाना नहीं चाहते। वे चन्द्री को अपने साथ दुर्वासापुर चलने को कहते हैं। परंतु चन्द्री नहीं चाहती कि उसकी वजह से प्राणेशाचार्य को कलंकित होना पड़े, इसलिए उनके साथ न जाकर अपने घर जाती है, जहाँ नारनप्पा का शव रखा था, लेकिन अब वह शव बीभत्स और डरावना लग रहा था, बदबू फैली थी। घर में सब और मरे हुए सड़े हुए चूहे थे, अर्थात गांव में प्लेग की महामारी फैली है। चन्द्री एक व्यापारी अहमद बारी की सहायता से नारनप्पा को स्मशान में ले जाकर मुक्ति दिलाती है और खुद अपने गाँव कुन्दापुर चली जाती है। नारनप्पा का अंतिम संस्कार चन्द्री ने किया है, यह किसी को मालूम नहीं था। उसी समय गांव की एक बूढी औरत लक्ष्मी देवम्मा शोर मचाती है कि नारनप्पा भूत बन गया है। गाँव में प्लेग की महामारी फ़ैल जाती है, घर की छतों पर गिद्ध आकर बैठते हैं, परन्तु सभी ब्राह्मण इसे नारनप्पा के भूत का कार्य समझ रहे थे। इसी समय प्राणेशाचार्य की कई वर्षों से बीमार पत्नी भागीरथी की भी मृत्यु होती है और वे पत्नी की अधजली लाश को छोड़ निकल पड़ते हैं। उन्हें नारनप्पा और अपने मित्र महाबल की याद आती है। महाबल काशी में उनके साथ पढता था और उनसे अधिक प्रतिभावान था, परन्तु अचानक उसने पढ़ाई छोड़ दी और वेश्या के साथ रहने लगा था। आज परिस्थिति ने प्राणेशाचार्य को भी उसी मार्ग पर ला कर छोड़ दिया है। इतने वर्षों से स्त्री सहवास से दूर थे, पर आज उनका मन उसी में फँस रहा है। वे पुट के साथ उसके गाँव मेलिंगा जाते हैं, जहाँ पुट उन्हें पदमावती वेश्या के घर ले जाता है, और पदमावती भी हर्ष के साथ उनका स्वागत करती है। उसे देख प्राणेशाचार्य का मन काम भावना से भर जाता है। वे कहीं न कहीं अपने भीतर नारनप्पा और महाबल की प्रतिछवि का अनुभव करते हैं। उनका मन फिर से चन्द्री से मिलने के लिए मचलता है। अंत में वे निर्णय लेते हैं कि वे पहले दुर्वासापुर जाकर नारनप्पा का अंतिम संस्कार करेंगे, फिर कुन्दापुर जाकर आम गृहस्थ की तरह जीवनयापन करेंगे। अर्थात दमित भावना से मुक्त होकर एक नये प्राणेशाचार्य का जन्म होता है। ‘संस्कार’ के माध्यम से उपन्यासकार ने दो भिन्न विचारधाराओं तथा जीवनमूल्यों का संघर्ष चित्रित करते हुए, रूढ़िवादी समाज की गलत मान्यताओं और अंधविश्वासों पर तीव्र आघात किया है।

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