Rahasyamaya Vanop Mantra(Guru Prapti- Episode 24) रहस्यमय वनोप मंत्र (गुरु प्राप्ति -प्रसंग २४)
तेजस्वी वनोप मन्त्र ॐ अस्य श्रीनवदुर्गामहामन्त्रस्य किरातरूपधर ईश्वर ऋषिः अनुष्टुप् छन्द अन्तर्यामी नारायण: किरातरूप धरेश्वरो नवदुर्गा गायत्री देवता ॐ बीजं स्वाहा शक्तिः क्लीं कीलकम मम धर्मार्थ काम मोक्षार्थे जपे विनियोगः ।। हंसनी ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः ।। शङ्खिनी ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।। चक्रिणी हूँ मध्यमाभ्यां नमः ।। गदिनी ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः ।। शरिणी ह्रैं कनिष्ठकाभ्यां नमः ॥ त्रिशूल- धारिणी ह्र: करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । अथ हृदयादि । हंसिनी ह्रां हृदयाय नमः ।। शङ्खिनी ह्रीं शिरसे स्वाहा ।। चक्रिणो ह्रूं शिखायै वषट् । गदिनी ह्रैं कवचाय हुम । शरिणी ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् । त्रिशूलधारिणी ह्र: अस्त्राय फट् । ॐ भूर्भुवः स्वरोम् इति दिग्बन्धः ॥ अथ ध्यानम् ॥ अरिशङ्ख कृपाण खेटबाणान्सु धनुष्क शूलमथ कर्तरी दधाना || भजतां महिषोत्तमांग संस्था नवदूर्वासदऋशी श्रियेस्तु दुर्गा | हेमप्रख्यामिन्दुखण्डान्तमोलिं शङ्खारिष्टाभीतिहस्तां त्रिनेत्राम् || हेमाब्जस्थां पीतवर्णां प्रसन्नां देवीं दुर्गा दिव्यरूपां नमामि ॥ ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि ॥ ॐ हं आकाशात्मने पुष्पं समर्पयामि । ॐ यं वाय्वात्मने धूपं समर्पयामि ।। ॐ रं अग्न्यात्मने दीपं समर्पयामि । ॐ वं अमृतात्मने अमृत नैवेद्यं समर्पयामि ।। ॐ ऐं ह्रीं श्रीं उत्तिष्ठ पुरुष किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् ।। यदिशक्य मशक्यं वा तन्मे भगवति शमय शमय स्वाहा । ॐ नमश्चण्डिकायै नमः ।। हेतुकं पूर्वपीठे तु आग्नेय्यां त्रिपुरान्तकम् । दक्षिणे चाग्निवैतालं निर्ऋत्यां यमजिह्वकम् ।। कालाख्यं वारूणे पीठे वायव्यां तु करालिनम् ॥ उत्तरे एकपादं तु ईशान्यां भीमरूपिणम् ।। आकाशे तु निरालम्बं पाताले बडवानलम। यथा ग्रामे तथाऽरण्ये रक्ष मां बटुकस्तथा । सर्वमंगलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ।। ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै नमः ।। प्रयोगविषये ब्राह्मण्यै नमः ।। वारूणि खल्वि माहेश्वर्यै नमः ।। कुल्यवासिन्यै कुमारिण्यै नमः । जयन्तीपुरलाहिवाराहिण्यै नमः ।। अष्टमहाकालि माहेश्वर्यै नमः ।। चित्रकूट इन्द्राण्यै नमः । त्रिपुरब्रह्मचारिण्यै नमः । एकवृक्षशुभिण्यं महालक्ष्म्यै नमः ।। त्रिपुरब्रह्माण्ड नायक्यै नमः । एतानि क्षं क्षं त्रैलोक्यवशंकराणि । बोजाक्षराणि ॐ ह्रीं कुरु कुरु हुंफट् स्वाहा । ॐ एं ह्रीं श्रीं सकलदेशमुख भ्रमरीम् ।। ॐ क्लीं ह्रीं सकलराजमुख भ्रमरीम् ।। ॐ क्रौं सौं सकलदेवतामुख भ्रमरोम् । ॐ क्लीं क्लीं सकलकामिनीमुख भ्रमरीम ॥ओम ईं सौं: सकलदेशमुखभ्रमरीम् ।। हं सं कं फ्रें त्रैलोक्यचित्तभ्रमरीम् ॥ ॐ क्षं क्षां क्षिं क्षीं क्षुं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः । अग्रभैरवादिभूतप्रेतपिशाच चित्तभ्रमरी हुं क्षु हुं क्लीं राजमन्त्रभ्रमरीं हुं क्षु क्ली' सिद्धमन्त्र यन्त्रतन्त्र भ्रमरीं हुं क्षु हुं क्लीं साध्यमन्त्रयन्त्रतन्त्र भ्रमरीं सकलसुरासुरसर्वमंत्रयंत्रतन्त्रभ्रमरीं सर्वक्षोभिणी सर्वक्लेदिनी सकलमनोन्मादकरी आं ह्रीं क्रौं परमकल्याणी महायोगिनी । ओम महाविद्यां प्रवक्ष्यामि महादेवेन निर्मिताम् । चिन्तितां किरातरूपेण मारणां हृदयनन्दिनीम् । उत्तमा सर्वविद्यानां सर्वभूतवशंकरी । सर्वपाप क्षयकरीसर्वशत्रुनिवारिणी । ॐ कुलकरी गोत्रकरी धनकरी धान्यकरी बलकरी यशकरी विद्याकरी उत्साहवर्धनी भूतानां विजृम्भिणी स्तम्भिनी मोहिनी द्राविणी सर्वमन्त्रप्रभन्जिनी सर्वविद्याप्रभेदिनी सर्वज्वरोत्सादकरी ऐकाहिकं द्वयाहिकं त्रयाहिकं चातुर्थिकमर्द्धमासिकं द्विमासिकं त्रिमासिकं षाण्मासिकं सांवत्सरिकं वातिकं पैत्तिकं श्लैष्मिकं सान्निपातिकं सन्तत- ज्वरं शीतज्वरम् उष्णज्वरं विषमज्वरं तापज्वरं च गण्डमालालूततालु वर्णानां त्रासिनी सर्पाणां त्रासिनी सर्वान् त्रासिनी शिरःशूलाक्षिशूल कर्णशूलदन्तशूलबाहु शूलहृदयशूल कुक्षिशूलपक्षशूलगुदशूल गुल्मशूल लिङ्गशूलयोनिशूलपादशूलसर्वाङ्गशूल विस्फोटकादि इति आत्मरक्षा परोक्षरक्षा प्रत्यक्षरक्षा अग्निरक्षा अघोररक्षा वायुरक्षा उदकरक्षा महान्धकारोल्का विद्युदनिलचरोशस्त्रास्त्रे मां रक्ष रक्ष स्वाहा || महादेवस्य तेजसां भयंकराविष्टदेवता बन्धयामि पन्था मुगतचौराद्रक्षते बन्धकस्य कण्टकं बन्धयामि महादेवस्य पंचशीर्षेण पाणिना महादेवस्य तेजसा सर्वशूलान् कहपिङ्गलेन कण्टक मयरुद्राङ्गी ॐ अं आं मातङ्गी इं ईं मातङ्गी उं ऊं मातङ्गी ऋं ॠं मातङ्गी ऌं ऌं मातङ्गी एं ऐं मातङ्गी ओं औं मातङ्गी अं अ: मातङ्गी स्वर स्वर ब्रह्मदण्ड विश्वररुद्रदण्ड प्रज्वल वायुदण्ड प्रहर प्रहर इन्द्रदण्ड भक्ष भक्ष निर्ऋ तिदण्ड हिलि हिलि यमदण्ड नित्योपवादिनि हंसिनी शङ्खिनी चक्रिरणी गदिनी शूलिनी त्रिशूलधारिणी हुं फट् स्वाहा ।। आयुर्विद्यां च सौभाग्यं धान्यं च धनमेव च ।। सदा शिवं पुत्रवृद्धिं देहि मे चण्डिके शुभे ॥

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कोई भी साधना करने से पूर्व अगर साधक यह गुप्त मंत्र प्रयोग करे.. तो निश्चित सफलता होगी ही...

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अहंब्रह्मास्मि का अर्थ क्या है ?–सदगुरुदेव जी डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली जी के श्री मुख से

