श्री एकलिंग नाथ स्तुति |एकलिंग नाथ अष्टकम|Shree Ekling Nath | Eklingji Sanskrit Bhajan
नमः शिवाय ॥ Welcome to Rudranath Siddha Vani. प्रस्तुत है मेवाड़ के आराध्य देव, श्री एकलिंग नाथ जी और अरावली पर्वतमाला की सुंदरता का वर्णन करता एक नवीन संस्कृत गीत। महाकवि कालिदास की शैली से प्रेरित यह रचना भगवान शिव के उस स्वरूप को नमन करती है, जो उदयपुर के पास कैलाशपुरी में विराजित हैं। यह गीत बप्पा रावल की भक्ति और मेवाड़ के दीवान के रूप में एकलिंग जी की महिमा का गुणगान करता है। Lyrics & Composition: अश्विन जोशी Music: Classical Dhrupad Style Presented by: Dr. Ashwin Kumar Joshi (Rudranath Siddha Vani) 🙏 Like, Share & Subscribe: यदि आपको यह संस्कृत स्तुति पसंद आई हो, तो कृपया वीडियो को लाइक करें और हमारे चैनल Rudranath Siddha Vani को सब्सक्राइब करें। #EklingNath #ShivaStuti #SanskritSong #Udaipur #Mewad #Mahadev #RudranathSiddhaVani #Sanskrit #DevotionalMusic #BappaRawal #Aravalli #bhakti #rudranathsiddhavani #bhaktisagar #bhaktisangeet #newbhajan2026 #devotionalsong #shivratri #shivratrispecial #shivbhajan #shivshankar Ekling Nath Ji Song, Eklingji Udaipur Status, Sanskrit Stuti, Shiva Sanskrit Song, Mewad History, Bappa Rawal, Rudranath Siddha Vani, New Shiv Bhajan 2026, Indian ClassicalMusic, #udaipurtourism, #bhakti MahadevSong. ॥ श्री एकलिंग-अरावली-स्तवः ॥ (छंद: उपजाति/इंद्रवज्रा मिश्रण) अरावली-शैल-सुमेखलायाः, मध्ये लसत्-कांचन-भूमि-भागे। उदयपुरस्योपरि रम्य-देशे, कैलास-धाम्ना सदृशं विभाति॥ १॥ श्याम-प्रभं चारु-चतुर्मुखं तं, पाषाण-देहे शिव-तत्त्व-लीनम्। बप्पा-नरेन्द्रैः अर्चित-पाद-पद्मं, एकलिंगं शिरसा नमामि॥ २॥ यत्र द्रुमाः चामर-वात-लीलां, कुर्वन्ति नित्यं पवनेन मन्दम्। मेवाड़-नाथोऽपि च यत्र भृत्यः, दीवान-रूपेण भजति ईशम्॥ ३॥ गम्भीर-नादैः प्रति-कन्दरासु, ओंकार-शब्दः प्रतिगुञ्जते यः। तं मेदपाटेश्वर-राजरूपं, वन्दे महेशं कुलदेव-तुल्यम्॥ ४॥ हिन्दी भावार्थ: १. जो अरावली पर्वतमाला रूपी सुंदर करधनी (मेखला) के मध्य में स्थित सुवर्णमयी भूमि पर सुशोभित है, उदयपुर के समीप वह रमणीय स्थान साक्षात 'कैलास धाम' के समान देदीप्यमान हो रहा है। २. काले पत्थर (पाषाण) में साक्षात शिव-तत्त्व में लीन, सुंदर श्याम वर्ण और चार मुखों वाले, जिनके चरण कमलों की पूजा बप्पा रावल आदि राजाओं ने की है, उन श्री एकलिंग नाथ को मैं सिर झुकाकर नमन करता हूँ। ३. जहाँ (अरावली के) वृक्ष मंद-मंद हवा से हिलते हुए भगवान पर चंवर डुलाने की लीला करते प्रतीत होते हैं, और जहाँ मेवाड़ का राजा (महाराणा) भी शासक नहीं, अपितु 'दीवान' (सेवक) बनकर ईश्वर को भजता है। ४. (संध्या आरती के समय) जहाँ गंभीर शंख और घंटों का नाद अरावली की प्रत्येक गुफा (कंदरा) में गूंजकर ओंकार का स्वर बन जाता है, मेवाड़ के स्वामी और कुलदेवता स्वरूप उस महेश्वर (एकलिंग जी) की मैं वंदना करता हूँ। ॥ श्री एकलिंग नाथ: कैलासपुरी वर्णनम् ॥ मेदपाट (मेवाड़) मंडल के हृदय स्थल में, सरोवरों की नगरी उदयपुर से किंचित दूर, 'कैलासपुरी' नामक पावन धाम उसी प्रकार सुशोभित है, जैसे हिमालय की गोद में स्वयं अलकापुरी विद्यमान हो। प्रकृति-नटी जहाँ अरावली पर्वतमाला रूपी हरित मेखला (करधनी) धारण कर, अपने वन-वैभव से चहुँदिशि जिसकी आराधना करती प्रतीत होती है, वहीं देवाधिदेव श्री एकलिंग नाथ जी विराजमान हैं। श्याम वर्ण पाषाण से निर्मित, भगवान शिव का चतुर्मुखी विग्रह ऐसा प्रतीत होता है मानो चारों वेदों का साकार स्वरूप ही मूर्तमान हो गया हो। उनके मस्तक पर सुशोभित चंद्रकला और गले में लिपटे सर्पहार, अरावली की टेढ़ी-मेढ़ी घाटियों और उस पर छाए श्वेत मेघों का स्मरण कराते हैं। मंदिर का शिखर आकाश को ऐसे स्पर्श करता है, मानो वह पृथ्वी का जयघोष स्वर्ग तक पहुँचा रहा हो। अरावली की उपत्यकाओं (घाटियों) में बहने वाली शीतल वायु, वन-पुष्पों की सुगंध धारण कर जब मंदिर प्रांगण में प्रवेश करती है, तो लगता है कि प्रकृति स्वयं चंवर डुलाकर प्रभु की सेवा कर रही है। बप्पा रावल के तप से सिंचित यह भूमि, जहाँ मेवाड़ के महाराणा स्वयं को शासक नहीं, अपितु शिव का 'दीवान' मानकर नतमस्तक होते हैं, राजसत्ता और धर्मसत्ता के अद्वैत का अनुपम उदाहरण है। संध्याकाल में जब यहाँ शंखनाद और घंटा-ध्वनि गुंजायमान होती है, तब अरावली की कंदराएँ उस नाद को प्रतिध्वनित कर ओंकार का स्वरूप धारण कर लेती हैं। यह स्थान केवल पत्थरों का देवालय नहीं, अपितु भक्ति, प्रकृति और इतिहास का वह त्रिवेणी संगम है, जहाँ आकर मन 'शिवोहम' के नाद में लीन हो जाता है। ॥ ॐ नमः शिवाय ॥

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