रिझियो साजन सूरत में तुम्हरी/बेगम सार शब्द-30/एकान्तिक सत्संग-31/सतगुरु नाम निरुपण शाह दाता जी/16मई
रिझियो साजन सूरत में तुम्हारी/बेगम सार शब्द-30/एकान्तिक सत्संग-31/सतगुरु नाम निरुपण शाह दाता जी /16/05/2026 यह वीडियो "सद्गुरु सात साईं दाता भजन" चैनल का एक एकांतिक सत्संग है, जिसमें मोहन शाह दाता जी द्वारा रचित बेगम सार शब्द-30 "रिझियो साजन सूरत में तुम्हरी" की व्याख्या की गई है। इस सत्संग का मुख्य सारांश निम्नलिखित बिंदुओं में है: सद्गुरु के प्रति अनन्य प्रेम: वीडियो की शुरुआत में एक सुंदर भजन "रिझियो साजन सूरत में तुम्हरी" गाया गया है। [00:02] यह शब्द गहरे प्रेम, भाव और अटूट प्रीत का प्रतीक है। जब जीव का अपने सद्गुरु के प्रति अनन्य प्रेम जागृत होता है, तो उसकी सूरत (चित्त या ध्यान) पूरी तरह गुरु के चरणों में समर्पित हो जाती है। [05:35] सूरत और मूरत की महिमा: यहाँ 'सूरत' का अर्थ केवल बाहरी शक्ल से नहीं, बल्कि गुरु मुख से मिले ठोस सत्य ज्ञान और उनकी दयालुता से है। [06:15] शिष्य गुरु के ज्ञान, उनकी वाणी और आंतरिक सुमिरन के मार्ग पर पूरी तरह बलिहारी जाता है। [08:09] सद्गुरु की दया दृष्टि (नज़र): सत्संग में बताया गया है कि गुरु की एक दया दृष्टि या रहम की नज़र ही शिष्य के हृदय को आनंद से सराबोर कर देती है। संतों ने हमेशा अपने इष्ट (गुरु) को अपने हृदय और आज्ञा चक्र (तीसरे तिल) में बसाया है। [09:21] बाहरी भटकाव बनाम आंतरिक मार्ग: जीव सत्य की खोज में चारों धामों, तीर्थों, जंगलों और पहाड़ों में भटकता रहता है। [10:12] लेकिन जब उसे सच्चे सद्गुरु मिलते हैं, तो वे उसे बाहर भटकाने के बजाय सीधा भीतर का रास्ता यानी "गगन घट नगरी" (अंतःकरण) का मार्ग दिखा देते हैं, जहाँ शब्द स्वरूप में ईश्वर का वास है। [10:56] पिया का देश और प्रेम की चुनरी: परमात्मा या गुरु का देश बेहद दुर्लभ है जिसे कोई विरला साधक ही अपनी आंतरिक साधना से पा सकता है। [12:18] जो जीव अपने भीतर अनन्य प्रेम, अटूट विश्वास और दृढ़ता लाकर "प्रेम-प्रीत रूपी रस की चुनरी" ओढ़ लेता है, वही उस परम पद तक पहुँच पाता है। [13:24] साधना और वासनाओं का क्षय: जब साधक अंतर्मुखी होकर परमात्मा के वास्तविक और असीम सुख को समझ जाता है, तो उसकी संसार के प्रति चंचलता और शारीरिक वासनाएं पूरी तरह समाप्त (दुबली) हो जाती हैं। [15:35] वह सांसारिक कार्यों को करते हुए भी भीतर से हमेशा अपने 'पिया' (परमात्मा) के आनंद में मग्न और लीन रहता है। [18:17]

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satsang by Shri avdhut satyanand Sai (data)1mo.no. 8081800063

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