@Endpatriarchystartgenderequali ’औरत त्याग की देवी या सुविधा का विकल्प ’

"त्याग की देवी या सुविधा का विकल्प?" ✍️ प्रीती जायसवाल समाज में जब भी किसी महिला का ज़िक्र आता है, तो अक्सर एक वाक्य सुनाई देता है— "औरत त्याग की मूरत होती है।" यह वाक्य इतना बार-बार दोहराया गया है कि अब यह हमारी सामाजिक सोच का हिस्सा बन चुका है। पर क्या कभी किसी ने यह पूछा है कि क्या वह त्याग वास्तव में उसका अपना चुनाव था, या फिर उसे परिस्थितियों, संस्कारों और उम्मीदों के दबाव में वह भूमिका निभानी पड़ी? त्याग या विवशता? हर बार जब किसी लड़की की पढ़ाई छुड़ाई जाती है ताकि उसके भाई की फीस भरी जा सके, तब समाज उसे "त्याग की देवी" कहकर सम्मानित कर देता है। पर कोई यह नहीं सोचता कि उससे उसका अधिकार छीना गया है, उसकी इच्छाओं को दरकिनार कर दिया गया है। जब एक बहू अपने करियर के सपनों को किनारे रखकर घर और रसोई की जिम्मेदारी संभालती है, तो उसे "घर की शान" कह दिया जाता है। इस प्रशंसा के पीछे छिपा संदेश यही होता है— "अब तुम अपनी आवाज़ मत उठाओ, यही तुम्हारा धर्म है।" माँ के त्याग का मिथक एक माँ जब अपने शरीर, समय, नींद, और सपनों तक का त्याग करती है—तो समाज उसकी पूजा करता है, उसे आदर्श घोषित कर देता है। लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि उसने क्या खोया, क्यों खोया, और क्या उसे कभी अपने लिए कुछ चुनने की आज़ादी थी? सुविधा के नाम पर त्याग दरअसल, औरत को अक्सर "त्याग की देवी" नहीं, बल्कि दूसरों की सुविधा का विकल्प बनाया गया है। जब-जब परिवार या पुरुषों को अपनी सुविधा चाहिए होती है, वहीं एक औरत तैयार कर दी जाती है— "समझदार", "संस्कारी", "त्यागमयी"। उसकी समझदारी की परिभाषा यही होती है कि वह दूसरों की जरूरतों को अपने ऊपर प्राथमिकता दे। अब भ्रम टूटना चाहिए सच्चा त्याग वही है, जो स्वेच्छा से किया जाए, जिसमें व्यक्ति क�